पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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कल्पना अर्थात् आरोप [उस आकाश के रूप को न जानने वाले
लोग ] कर ही लेते हैं।
ततो निरंश आनन्दे विवर्तो जगदिष्यताम् ।
मायाशक्तिः कल्पिका स्यादैन्द्रजालिकशक्तिवत् ॥१०॥
ऊपर के दृष्टान्त से जब कि निरंश में भी विवर्त होना
सम्भव है तब यह भी मान ही लेना चाहिए कि—निरवयव
आनन्द में यह जगत् कल्पित कर लिया गया है। कल्पना
करने वाले की तलाश हो तो मायाशक्ति को ही कल्पना करने
वाली मान लो। इसका दृष्टान्त देखना चाहो तो ऐन्द्रजालिक
की शक्ति को देख लो [ऐन्द्रजालिक में रहने वाली जो मणि-
मन्त्रादिरूपी माया शक्ति होती है, वह गन्धर्वनगर आदि की
कल्पना कर डाला करती है। क्या यह बात हम लोक में नहीं
देखते हैं?]
शक्तिः शक्तात् पृथङ् नास्ति तद्वद् दृष्टे, र्न चाभिदा ।
प्रतिबन्धस्य दृष्टत्वाच्छक्त्यभावे तु कस्य सः ॥११॥
शक्ति शक्ति वाले से भिन्न नहीं है क्योंकि ऐसा ही [अभिन्न
होना ही] देखा जाता है। शक्ति शक्ति वाले से अभिन्न भी नहीं
है क्योंकि [अकेली] शक्ति का प्रतिबन्ध देखने में आता है।
यदि शक्ति [उससे पृथक्] कोई चीज नहीं है तो बताओ कि
यह प्रतिबन्ध किस वस्तु का होता है ?
प्रश्न यह है कि—आनन्दात्मा से भिन्न माया को मानें तो
द्वैत मानना पड़ता है। इसका उत्तर हमें यह देना है कि वह
माया तो अनिर्वचनीय होने से अनृत है। इसीसे द्वैत नहीं बनता।
देखलो कि लौकिक अग्नि आदि की शक्तियों को भी भिन्न या
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अभिन्न कुछ भी बताया नहीं जा सकता। क्योंकि अग्नि आदि की
शक्ति अग्नि आदि के स्वरूप से भिन्न नहीं होती है। क्योंकि अग्नि
आदि के स्वरूप से पृथक् वह दीख ही नहीं पड़ती है। शक्ति
और शक्तिमान् का अभेद भी नहीं माना जा सकता। क्योंकि
मणिमन्त्रादि से शक्ति का प्रतिबन्ध होता पाया जाता है। इस
कारण अग्नि आदि के स्वरूप से भिन्न शक्ति माननी चाहिए।
यदि अग्न्यादि से भिन्न शक्ति न मानोगे तो बताना होगा कि
वह प्रतिबन्ध किस का होता है ?
शक्तेः कार्यानुमेयत्वादकार्ये प्रतिबन्धनम् ।
ज्वलतोग्नेरदाहे स्यान्मन्त्रादिप्रतिबन्धता ॥१२॥
शक्ति वैसे तो किसी को भी आंखों से नहीं दीखती। उसे
तो केवल कार्य से ही अनुमान कर सकते हैं। फिर जब कारण
होने पर भी कार्य न होता हो तब प्रतिबन्ध को मानना पड़ता
है। दृष्टान्त देख लो कि—जब आग जल रही हो और दाह न
होता हो तब यह मानना होता है कि मन्त्रादि ने शक्ति का प्रति-
बन्ध, कर दिया है।
देवात्मशक्तिं स्वगुणै र्निगूढां मुनयोऽविदुन् ।
परास्य शक्ति र्विविधा क्रियाज्ञानबलात्मिका ॥१३॥
[ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् (श्वे०
१-३) इस श्रुति में कहा गया है कि] मुनि लोग जगत् के कारण
को जानने की इच्छा से, जब ध्यान योग में बैठे, तब उन्होंने
देव अर्थात् स्वयं प्रकाशस्वरूप आत्मा की मायारूपी शक्ति को
देख पाया, जो शक्ति अपने गुणों [अर्थात् अपने कार्य स्थूल-
सूक्ष्म शरीरों ] से छिपी बैठी थी ये