पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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से 'तैजस' हो जाता है तथा जब वह ईश्वर उस लिंग देह में
अभिमान करता है तब वह 'हिरण्यगर्भ' हो जाता है । उन दोनों
में भेद केवल इतना ही है कि तैजस 'व्यष्टि' है और हिरण्यगर्भ
'समष्टि' है ) इसके अतिरिक्त और कोई भेद नहीं है ।
मलिनसत्वप्रधान अविद्यारूपी उपाधि वाला जीव जब लिंग
शरीर में अभिमान करता है, जब वह उसी को अपना आत्मा
मान लेता है तब उसे 'तैजस' कहने लगते हैं । विशुद्ध सत्व प्रधान
मायारूपी उपाधिवाला परमेश्वर उसी लिंग शरीर में जब 'मैंपने'
का अभिमान करता है तब उसका नाम 'हिरण्यगर्भ' हो जाता
है । तैजस और हिरण्यगर्भ दोनों ही यद्यपि लिंग शरीर पर अभि-
मान करने वाले हैं परन्तु उनमें से एक 'व्यष्टि' है दूसरा 'समष्टि'
है । इसी से दोनों में भेद हो गया है ।
समष्टीशः सर्वेषां स्वात्मतादात्म्यवेदनात् ।
तदभावात् ततोऽन्ये तु कथ्यन्ते व्यष्टिसंज्ञया ॥२५॥
वह ईश्वर–जिसे हिरण्यगर्भ कहा गया है–लिंगशरीर
उपाधि वाले सभी तैजसों के साथ अपने आत्मा की एकता को
समझता रहता है । वह समझता है कि ये सब मिलकर 'मैं' हूँ ।
इसी से वह 'समष्टि' होता है । उस ईश्वर से अन्य जो जीव हैं
वे तो उस तादात्म्यवेदन के अभाव से [उन सब के साथ
एकत्व ज्ञान के न होने से] 'व्यष्टि' नाम से कहे जाते हैं ।
तद्भोगाय पुनर्भोग्यभोगायतनजन्मने ।
पञ्चीकरोति भगवान् प्रत्येकं वियदादिकम् ॥२६॥
भगवान् परमेश्वर उसके बाद उन जीवों के भोग के लिये ही
भोग्य [ अन्नपानादि ] तथा भोगमन्दिरों