पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
[Header: द्वैतविवेकप्रकरणम् १०९]
[Header: द्वैतविवेकप्रकरणम् १०९]
'तमेवैकं जानथ आत्मान मन्या वाचो विमुञ्चथ अमृतस्यैष सेतुः' [मुण्ड.
२-२-५] इस श्रुति में कहा गया है कि उसी एक तत्व को जान लो।
उससे भिन्न समस्त वाणियों का परित्याग कर डालो। 'यच्छेद्वाङ्
मनसी प्राज्ञः' (कठ १-३-१३) ज्ञानी पुरुष वाणियों को रोककर मन
में बन्द कर दे [फिर निरर्थक हो चुके हुए वाग्व्यापार में फँसा न
रह जाय]। इत्यादि श्रुतियों में इसी बात का प्रतिपादन स्पष्ट रीति
से किया गया है।
अशास्त्रीयमपि द्वैतं तीव्रं मन्दमिति द्विधा।
कामक्रोधादिकं तीव्रं मनोराज्यं तथेतरत् ॥४९॥
उभयं तत्वबोधात् प्राङ् निवार्यं बोधसिद्धये।
शमः समाहितत्वं च साधनेषु श्रुतं यतः ॥५०॥
अशास्त्रीय द्वैत भी 'तीव्र' और 'मन्द' दो प्रकार का होता है।
कामक्रोधादि 'तीव्र द्वैत' कहाता है। मनोराज्य को 'मन्दद्वैत' कहते
हैं ॥४९॥ ज्ञान की सिद्धि के लिये यह आवश्यक है कि—इन
दोनों ही प्रकार के द्वैत का निवारण कर दिया जाय। क्योंकि ब्रह्म-
ज्ञान के साधन जो नित्यानित्यवस्तुविवेक आदि हैं, उनमें शान्ति
और समाधि दोनों ही सुने जाते हैं। [इसका अभिप्राय यही है
कि जब तक शान्ति और समाधान नहीं होगा, तब तक तत्वज्ञान
उत्पन्न ही नहीं हो सकेगा। इस कारण तत्वज्ञान से प्रथम प्रथम
ही तीव्र और मन्द दोनों प्रकार के द्वैत का परित्याग कर देना
चाहिये।]
बोधादूर्ध्वं च तद्ध्येयं जीवन्मुक्तिप्रसिद्धये।
कामादिक्लेशबन्धेन युक्तस्य नहि मुक्तता ॥५१॥
जब बोध हो चुके तब भी, इन दोनों प्रकार के द्वैतों का, परि-
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त्याग ही रखना चाहिये। नहीं तो जीवन्मुक्ति का मजा हाथ ही
नहीं आयगा। क्योंकि कामादि रूपी जो महाक्लेशकारक बन्धन
है, जो पुरुष उससे युक्त हो रहा है वह पुरुष मुक्त कैसे हो सकेगा ?
[बोध का इतना प्रताप तो होना ही चाहिये कि गीतोक्त दैवी
संपत्ति का ज्ञानी में विकास हो जाय। ज्ञान के बाद यदि दैवी-
संपत्ति नहीं आयी है तो वह ज्ञान ज्ञान नहीं है ज्ञानाभास है।
“नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैन-
माप्नुयात्”। जो दुश्चरितों से हटा नहीं है, जो शान्त नहीं है, जो
समाधि नहीं करता है, जिसका मन शान्त नहीं हुआ है, वह पुरुष
सूखे तत्वज्ञान से इस तत्व को पा नहीं सकता है। कोरे तत्वज्ञान
से तो तत्व ज्ञानी स्वयं ही आत्मवंचन करता रहता है और परमार्थ
पद को पाने से वंचित रह जाता है।]
जीवन्मुक्तिरियं मा भूज्जन्माभावे त्वहं कृती।
तर्हि जन्मापि तेऽस्त्वेव स्वर्गमात्रात् कृती भवान्॥५२।
“यह जीवन्मुक्ति न मिले तो पड़ी मत मिलो, मैं तो केवल
आगामी जन्म न मिलने से ही धन्य हो जाऊँगा” यह विचार दोष-
युक्त है, क्योंकि स्वर्ग अर्थात् वैषयिक सुख से धन्यता मान लेने
वाले तुम जन्म के बन्धन से छुट नहीं सकोगे। जन्म भी तुम्हारा
होगा ही।
“जो मैं जन्म-मरण लक्षण संसार से घबरा उठा हूँ, उस मुझे
तो विदेह मुक्ति ही चाहिये। मुझे बार बार जन्म लेना न पड़े
उसी से मैं कृतकृत्य हो जाऊंगा। इस, बीच की जीवन्मुक्ति से मुझे
क्या लेना है? यह मुझे न मिले तो न सही।” ऐसा जिसको भ्रम
हो गया हो उससे कहो कि—ऐहिक तुच्छ भोगों के छूटने के डर