पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पञ्चकोशविवेकप्रकरणम् ८५
पञ्चकोशविवेकप्रकरणम् ८५
भाषा ही भिन्न भिन्न हो गई हैं। बाधरहित साक्षिचैतन्य तो
एक ही है। यह और बात है कि उस चैतन्य का वर्णन हम
भले ही 'न किंचित्' इस अभाववाचक शब्द से कर डालें।
बाध का साक्षी तो हमें प्रत्येक अवस्था में मानना ही पड़ेगा।
उस के वाचक शब्दों में झगड़ा हो सकता है। वाच्य आत्मतत्व
में तो किसी प्रकार की भी विप्रतिपत्ति नहीं हो सकती।
अत एव श्रुतिर्बाध्यं बाधित्वा शेषयत्यदः ।
स एष नेति नेत्यात्मेत्यतद्व्यावृत्तिरूपतः ॥३२॥
क्योंकि यह साक्षिचैतन्य एक अबाध्य वस्तु है इसलिये
'स एष नेति नेत्यात्मा' (बृ० ३-९-२६) इस श्रुति ने, अनात्म
पदार्थों का निषेध करते करते, निषेध करने योग्य सब अनात्म
पदार्थों की बाधा करके, निराकरण के अयोग्य, इस प्रत्यक्
स्वरूप को शेष रख लिया है।
इदं रूपं तु यद्यावत् त्यक्तुं शक्यतेऽखिलम् ।
अशक्यो ह्यनिदंरूपः स आत्मा बाधवर्जितः ॥३३॥
जो 'इदं' है [जो दृश्य रूप से हमारे अनुभव में आता
है] वह जितना भी [देहेन्द्रियादि सम्पूर्ण दृश्य जगत्] है वह
तो सब का सब ही त्याग किया जा सकता है। परन्तु प्रत्यग्रूप
होने से जिस को 'इदं' नहीं कह सकते, उस साक्षी आत्मा
का त्याग तो हो ही नहीं सकता [क्योंकि वह तो त्याग करने
वाले का अपना स्वरूप ही है, फिर उस का त्याग कैसे किया
जा सकता है ?] निष्कर्ष यही निकलता है कि वह बाधरहित
[सत्य] साक्षी ही आत्मा है [अहंकारादि दृश्य पदार्थ आत्मा
नहीं हैं]।
८६ पंचदशी
सिद्धं ब्रह्मणि सत्यत्वं, ज्ञानत्वं तु पुरेरितम् ।
स्वयमेवानुभूतित्वादित्यादिवचनै स्फुटम् ॥३४॥
ब्रह्म के लक्षण में जिस सत्यता का वर्णन आया है वही
सत्यता आत्मा में भी है यह यहां तक सिद्ध हो गया । इसी
प्रकरण के 'स्वयमेवानुभूतित्वाद्विद्यते नानुभाव्यता' इत्यादि तेरहवें
श्लोक में आत्मा की ज्ञानरूपता भी पहले भले प्रकार कही जा
चुकी है ।
न व्यापित्वाद्देशतोऽन्तो नित्यत्वान्नापि कालतः ।
न वस्तुतोऽपि सर्वात्म्या दानन्त्यं ब्रह्मणि त्रिधा ॥३५॥
व्यापक होने से देशकृत अन्त नहीं, नित्य होने से काल-
कृत अन्त नहीं, सर्वात्मा होने से वस्तुकृत अन्त नहीं, यों
ब्रह्म में तीन प्रकार की अनन्तता होती है ।
'नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्' (मुण्ड० १-१-६) 'आकाशवत्
सर्वगतश्च नित्यः' 'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्' (कठ०
२-४-१३) 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृ० २-४-६) 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्म'
(माण्डू० २) 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' इत्यादि श्रुतियों में ब्रह्म की
व्यापकता नित्यता और सर्वात्मकता का उल्लेख किया गया है ।
इस से ब्रह्म में तीन प्रकार की अनन्तता माननी चाहिये कि
यह ब्रह्म देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है ।
व्यापक होने के कारण उस का देशकृत अन्त कहीं नहीं
होता---'कि यहां वा यहां ब्रह्म नहीं है' । नित्य होने के कारण
उस का कालकृत अन्त कभी नहीं होता कि—'तब ब्रह्म नहीं
था, अब ब्रह्म नहीं है, तब ब्रह्म नहीं रहेगा इत्यादि' । सब
का आत्मा होने के कारण उस का वस्तुकृत अन्त भी नहीं