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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

10. Natakadipa

नाटकदीपप्रकरणम्
परमात्माद्वयानन्दपूर्णः पूर्वं स्वमायया ।
स्वयमेव जगद् भूत्वा प्राविशज्जीवरूपतः ॥१॥
सृष्टि से पहले वह परमात्मा परमानन्द से परिपूर्ण था,
वह अपनी माया शक्ति से अपने आप ही जगद्रूप हो गया
और फिर वही जीवरूप से उसी में प्रवेश कर बैठा ।
विष्ण्वाद्युत्तमदेहेषु प्रविष्टो देवता भवेत् ।
मर्त्याद्यधमदेहेषु स्थितो भजति मर्त्यताम् ॥२॥
वह परमात्मा जब विष्णु आदि उत्तम देहों में प्रविष्ट हुआ
तब देवता बन गया । वह जब मर्त्य आदि अधम देहों में
घुसा तब मर्त्यभाव को प्राप्त हो गया । [भाव यह है कि यह
दीखने वाला उत्तमाधम भाव स्वाभाविक नहीं है । किन्तु शरीर
रूपी उपाधि के कारण से है । ऐसी अवस्था में जब एक ही
परमात्मा सब शरीरों में प्रविष्ट हुआ है तब फिर पूज्यपूजक
भाव या उत्तमाधम भाव क्यों है ? इस प्रश्न का समाधान हो
जाता है । ]
अनेकजन्मभजनात्-स्वविचारं चिकीर्षति ।
विचारेण विनष्टायां मायायां शिष्यते स्वयम् ॥३॥
अनेक जन्मों के भजन से [अनेक जन्मों में किये हुए कर्मों
को ब्रह्म में समर्पण करने से ] यह प्राणी आत्मविचार करना

४०६ पञ्चदशी
चाहा करता है। आत्मविचार के प्रभाव से जब [अपने अद्व-
यानन्द रूप को ढकने वाली] माया नष्ट हो जाती है तब वह
फिर पहले की तरह स्वयं [परमानन्दपूर्ण परमात्मा] ही शेष
रह जाता है।
अद्वयानन्दरूपस्य सद्वयत्वं च दुःखिता ।
बन्धः प्रोक्तः,स्वरूपेण स्थितिर्मुक्ति रितीर्यते ॥४॥
अद्वितीय ब्रह्म [के सच्चे बन्ध या मोक्ष का निरूपण तो
कोई कर ही नहीं सकता। इस कारण जब उस अद्वयानन्द]
को दुःखी होने का भ्रम हो जाता है तब बस यही उसका
'सद्वयपना' और यही उसका 'बन्ध' कहाता है। [उस दुःखी-
पने का हट जाना किंवा] अपने स्वरूप में पहुँच जाना ही मोक्ष
कहा जाता है।
अविचारकृतो बन्धो विचारेण निवर्तते ।
तस्माज्जीवपरात्मानौ सर्वदैव विचारयेत् ॥५॥
यह बन्धन अविचार का किया हुआ है। विचार से ही
इसकी निवृत्ति हो सकती है। इस कारण [तत्वसाक्षात्कार
होने तक] सदा ही जीव और परमात्मा का विचार करता रहे।
अहमित्यभिमन्ता यः कर्ताऽसौ, तस्य साधनम् ।
मनस्तस्य क्रिये अन्तर्बहिर्वृत्ती क्रमोत्थिते ॥६॥
[चिदाभास से युक्त] जो अहंकार देहादि में मैंपने का
अभिमान किया करता है, उसी को 'कर्ता' या जीव कहते हैं।
उस जीव [के अभिमान करने] का साधन मन कहाता है।
वह क्रमानुसार कभी अन्तर्वृत्ति और कभी 'बहिर्वृत्ति' नाम की
दो प्रकार की क्रियायें किया करता है।

नाटकदीपप्रकरणम् ४०७

नाटकदीपप्रकरणम् ४०७

अन्तर्मुखाहमित्येषा वृत्तिः कर्तारमुल्लिखेत् ।
बहिर्मुखेदमित्येषा वाह्यं वस्त्विदमुल्लिखेत् ॥७॥
उस मन की 'मैं' यह अन्तर्मुख वृत्ति तो कर्ता का उल्लेख
किया करती है। उसी मनकी बहिर्मुख रहने वाली 'इदं' यह
वृत्ति देह से बाहर के पदार्थों को 'यह' रूप में विषय
किया करती है।
इदमो ये विशेषाः स्युर्गन्धरूपरसादयः ।
असांकर्येण तान् भिन्द्याद् घ्राणादीन्द्रियपंचकम् ॥८॥
[मन तो सामान्यतया 'इदं' को विषय करता है परन्तु]
उस इदं के जो विशेष विशेष धर्म [गन्ध, रूप, रस आदि]
हैं, उन को तो पृथक् पृथक् घ्राण आदि पाँच इन्द्रियां ही प्रकट
किया करती हैं। [यों मन का भी उपयोग हो जाता और घ्राण
आदि इन्द्रियें भी व्यर्थ नहीं होतीं]।
कर्तारं च क्रियां तद्वद् व्यावृत्तविषयानपि ।
स्फोरयेदेकयत्नेन योऽसौ साक्ष्यत्र चिद्वपुः ॥९॥
जो तो केवल चिद्रूप होकर कर्ता को भी, क्रिया ['मैं'
'यह' की मनोवृत्तिरूपी] को भी, तथा एक दूसरे से अत्यन्त
विलक्षण गन्धादि विषयों को भी, एक ही यत्न से प्रकाशित
किया करता है, उसी चिद्रूप को यहां [वेदान्त में] साक्षी
कहते हैं।
नृत्यशालास्थितो दीपः प्रभुं सभ्यांश्च नर्तकीम् ।
दीपयेदविशेषेण तदभावेऽपि दीप्यते ॥१०॥
नृत्यशाला में रक्खा हुआ दीपक प्रभु [नृत्यशाला के मालिक]
को, सभ्यों को, तथा नर्तकी को, समान रूप से प्रकाशित किया

४०८ पञ्चदशी
करता है [वह किसी के प्रकाश के लिए घटता बढ़ता नहीं है
और जब नृत्यशाला में से ये सब लोग चले जाते हैं] जब वहां
कोई भी नहीं रहता तब भी वह वहां दीप्त हुआ रहता है।
अहंकारं धियं साक्षीं विषयानपि भासयेत् ।
अहंकाराद्यभावेऽपि स्वयं भात्येव पूर्ववत् ॥११॥
ऊपर के दृष्टान्त की तरह ही यह साक्षी तत्व अहंकार को,
बुद्धि को और विषयों को, प्रकाशित किया करता है। [सुषुप्ति
आदि के समय] जब तो अहंकार आदि कोई भी नहीं रहता,
तब भी वह [साक्षी] पहले ही की तरह जगमगाता रहता है।
निरन्तरं भासमाने कूटस्थे ज्ञप्तिरूपतः ।
तद्भासा भास्यमानेयं बुद्धिर्नृत्यत्यनेकधा ॥१२॥
वह कूटस्थ साक्षी तो ज्ञप्ति [किंवा स्वप्रकाश चैतन्य] रूप
से सदा ही भासता रहता है। यह बिचारी बुद्धि उसी [सदा-
विभात] साक्षी की प्रभा से प्रकाश्यमान होकर, अनेक रूप से
नाचा करती है। ['यह घट है' 'यह पट है' इत्यादि अनेक रूपों
में विकृत होती रहती है।]
अहंकारः प्रभुः, सभ्या विषया, नर्तकी मतिः ।
तालादिधारीण्यक्षाणि दीपः साक्ष्यवभासकः ॥१३॥
अहंकार ही इस [जगतरूपी] नाटक का प्रभु है [क्योंकि
नाटक के मालिक की तरह विषय भोग-की सफलता और विफ-
लता से हर्ष और विषाद् इसी अहंकार को होते हैं] विषय ही
इस नाटक के सभ्य हैं [नाटक के दर्शकों को सुख दुःखमयी
घटना देखने पर भी जैसे सुख दुःख कुछ नहीं होता, इसी प्रकार
इन विषयों को भी सुख दुःख कुछ नहीं होता] बुद्धि ही इस

नाटकदीपप्रकरणम् ४०९

नाटकदीपप्रकरणम् ४०९
नाटक की नर्तकी है [क्योंकि नर्तकी की तरह नाना तरह के
विकार इसी में होते हैं]। ताल आदि को धारण करने वाली
तो इन्द्रियां ही हैं [क्योंकि ये इन्द्रियां बुद्धि के विकारों के अनु-
कूल व्यापार करने लगती हैं]। यह साक्षी ही इन सब का
अवभासक दीपक है [क्योंकि यही इन सब को प्रकाशित किया
करता है।]
स्वस्थानसंस्थितो दीपः सर्वतो भासयेद् यथा ।
स्थिरस्थायी तथा साक्षी बहिरन्तः प्रकाशयेत् ॥१४॥
दीपक जैसे अपने स्थान पर ही रक्खा हुआ अपने चारों
ओर [के सम्पूर्ण पदार्थों को] प्रकाशित किया करता है, इसी
प्रकार स्थिर रूप से स्थायी यह साक्षी भी (विकारी न होकर
ही) बाहर और अन्दर प्रकाश किया करता है।
बहिरन्तर्विभागोऽयं देहापेक्षो न साक्षिणि ।
विषया बाह्यदेशस्था देहस्यान्तरहंकृतिः ॥१५॥
['अनन्तरमबाह्यम्' (बृ० ३-८-८) इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति
के अनुसार साक्षी में तो अन्दर और बाहर का कोई भी विभाग
नहीं होता] यह सब बाहर अन्दर का विभाग तो देह [रूपी पैमाने]
के कारण ही हो जाता है। विषय तो शरीर से बाहर रहते हैं।
अहंकार तो शरीर के अन्दर होता है। [इसीसे अन्दर बाहर
यह व्यवहार होने लगा है। आत्मा में अन्दर बाहर कहते
नहीं बनता।]
अन्तःस्था धीः सहैवाक्षै र्बहिर्याति पुनः पुनः ।
भास्यबुद्धिस्थचाञ्चल्यं साक्षिण्यारोप्यते वृथा ॥१६॥
शरीर के अन्दर बैठी हुई वह बुद्धि

४१० पंचदशी
करने के लिए ] इन्द्रियों के साथ साथ [अथवा इन्द्रियों के द्वारा]
बार बार बाहर निकला करती है। बस बुद्धि की इसी चंचलता
को [बुद्धि के भासक] साक्षी में वृथा ही आरोपित कर लिया
जाता है। [ उस साक्षी में वास्तविक चंचलता नहीं है।]
गृहान्तरगतः खल्पो गवाक्षादातपोऽचलः ।
तत्र हस्ते नर्त्यमाने नृत्यतीवातपो यथा ॥१७॥
निजस्थानस्थितः साक्षी बहिरन्तर्गमागमौ ।
अकुर्वन् बुद्धिचाञ्चल्यात् करोतीव तथा तथा ॥१८॥
झरोखे में होकर घर में गया हुआ नन्हा सा सूर्यप्रकाश,
अचल ही होता है। [वह हिलता जुलता नहीं है] उस आतप के
बीच में जब कोई पुरुष अपना हाथ हिलाने लगता है, तब जिस
प्रकार वह आतप भी हिलने सा लगता है, ठीक इसी प्रकार
साक्षी तो अपने ही स्थान में [किंवा अपनी अचल मर्यादा में ]
बैठा रहता है, वह कभी बाहर अन्दर आता जाता नहीं है।
परन्तु फिर भी बुद्धि की चंचलता के कारण, वैसा वैसा करता
हुआ सा [ व्यर्थ ही] प्रतीत होने लगता है।
न बाह्यो नान्तरः साक्षी बुद्धेर्देशौ हि तावुभौ ।
बुद्ध्याद्यशेषसंशान्तौ यत्र भात्यस्ति तत्र सः ॥१९॥
[ पहिले श्लोक में जो साक्षी को अपने स्थान पर स्थित
बताया है उसका अभिप्राय सुन लो ] वह साक्षी बाह्य या आन्तर
कभी नहीं होता। ये तो दोनों बुद्धि के ही देश कहाते हैं। बुद्धि
तथा इन्द्रिय आदि की प्रतीति के बन्द होने पर यह भाव अथवा
यह प्रकाश, जहाँ [ स्वतन्त्र रूप से ] जगमगाता रहता है, उसी
को इस साक्षी का स्थान समझ लो।

नाटकदीपप्रकरणम् ४११

नाटकदीपप्रकरणम् ४११
देशः कोऽपि न भासेत यदि तर्हस्त्वदेशभाक् ।
सर्वदेशप्रक्लप्त्यैव सर्वगत्वं न तु स्वतः ॥२०॥
यदि कहो कि-सम्पूर्ण व्यवहार के बन्द हो जाने पर तो
कोई भी देश भासा नहीं करता फिर उसको वहाँ कैसे पहचानें ?
तो हम कहेंगे कि तुम उसको बिना ही देश [स्थान] का समझ
लो [भाव यह है कि देश आदि की जितनी भी कल्पनायें हैं
उन सब कल्पनाओं का जो अधिष्ठान है उसे तो अपने से भिन्न
किसी देश की कुछ अपेक्षा ही नहीं होती ।] शास्त्र में भी उसको
कहीं कहीं सर्वगत आदि कहा गया है, वह भी सर्वदेश की कल्पना
के कारण ही कहा है। वह साक्षी आत्मा स्वभाव से सर्वगत
कदापि नहीं है [स्वभाव से तो वह अद्वितीय और असंग ही है]
अन्तर्बहिर्वा सर्वं वा यं देशं परिकल्पयेत् ।
बुद्धिस्तद्देशगः साक्षी तथा वस्तुषु योजयेत् ॥२१॥
अन्दर या बाहर या जिस किसी भी देश की कल्पना यह
बुद्धि कर लेती है उस देश का यह आत्मा 'साक्षी' कहाने लगता
है [वास्तव में तो सर्वगतपन की तरह सर्वसाक्षिपना भी कोई
पदार्थ नहीं है] इसी प्रकार अन्य वस्तुओं में भी साक्षी को समझ
लेना चाहिए ।
यद्यद् रूपादि कल्प्येत बुद्ध्या तत्तत् प्रकाशयन् ।
तस्य तस्य भवेत् साक्षी स्वतो वाग्बुद्ध्यगोचरः॥२२॥
बुद्धि से जिस जिस रूपादि की कल्पना की जाती है, उस
उस [कल्पित पदार्थ] को प्रकाशित रखने वाला यह आत्मा उस
उसका 'साक्षी' कहाने लगता है

४१२ पञ्चदशी
को पूछो तो हम कहेंगे कि ] वह स्वयं तो वाणी और बुद्धि का
अविषय ही है [ फिर उसे साक्षी भी कैसे कह दें ? ]
कथं तादृङ् मया ग्राह्य इति चेन्मैव गृह्यताम् ।
सर्वग्रहोपसंशान्तौ स्वयमेवावशिष्यते ॥२३॥
यदि वह साक्षी अवाङ् मनोगोचर है तो फिर मैं मुमुक्षु
ऐसे उसको कैसे ग्रहण करूँ ? इसका उत्तर यही है कि—उसे
तुम ग्रहण ही मत करो ! [तुम ग्रहण करने के झगड़े में ही मत
फंसो] जब सर्वग्रह शान्त हो जायगा [जब इस सब कुछ कहाने
वाले द्वैत की प्रतीति बन्द हो जायगी ] तब समझते हो क्या
शेष रह जायगा ? देखो उस समय यह स्वयं ही शेष रह गया
होगा [इसी को हम साक्षी कहते हैं । इसी को हम वाणी और
बुद्धि का अगोचर बताते हैं ।]
न तत्र मानापेक्षास्ति स्वप्रकाशस्वरूपतः ।
तादृग्व्युत्पत्यपेक्षा चेच्छ्रुतिं पठ गुरोर्मुखात् ॥२४॥
सर्वग्रह की शान्ति हो जाने पर जो स्वात्मा शेष रहता है,
उसके प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण की कुछ भी आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि वह तो स्वयं प्रकाश-स्वरूप ही है । वह आत्मा स्वयं
प्रकाशस्वरूप कैसे है ? यह जानना हो तो गुरु के मुख से
वेदान्त का अध्यन करो । [ इस गहन तत्व का ज्ञान तुम्हारे
स्वतन्त्र स्वाध्याय से या किसी ग्रन्थ का अनुवाद पढ़ने से नहीं
हो सकेगा । यह बात तो अनुभव वाला ही समझा सकेगा ]
यदि सर्वग्रहत्यागोऽशक्यस्तर्हि धियं व्रज ।
शरणं, तदधीनोऽन्तर्बहिष्वैषोऽनुभूयताम् ॥२५॥

नाटकदीपप्रकरणम् ४१३

नाटकदीपप्रकरणम् ४१३
यदि मन्दाधिकारी लोग सर्वग्रह का त्याग न कर सकते
हों तो वे बुद्धि की शरण ले लें। अन्दर या बाहर सब जगह
बुद्धि के अधीन हुए हुए इस साक्षी का वे लोग अनुभव करें
[ वे लोग यह विचारें कि-यह बुद्धि जिस जिस बाह्य या
आभ्यन्तर पदार्थ की कल्पना करती है, उस उस पदार्थ का
साक्षी होकर यह परमात्मा उसके अधीन सा रहता है। वे लोग
इसी मार्ग से परमात्मा का अनुभव प्राप्त करें। ]
इतिश्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां नाटकदीपप्रकरणम्