पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
Preface
प्राक्कथन
पंचदशी से हमारे प्रथम परिचय को आज लगभग इक्कीस वर्ष बीत
चुके हैं। यह हमारा अहोभाग्य है कि परिचय कराने में मध्यस्थता का
काम प्रातःस्मरणीय श्री अच्युत मुनि जी ने किया था। उसी वर्ष उनके
मुख से इस ग्रन्थ को आद्योपान्त पढ़ लेने का सुअवसर भी हाथ लग
गया था। तब से अब तक इस पर बीसों बार मनन हुआ है। यह
विशेषता रही है कि मनन की प्रत्येक आवृत्ति में अन्य आध्यात्मिक ग्रन्थों
के समान यह ग्रन्थ भी गंभीर गंभीरतर और गंभीरतम ही होता चला
जा रहा है। और आगे को होने की आशा भी है। ऐसा मालूम होता है कि
जैसे हमारा एक तो यह स्थूल शरीर है, दूसरा सपने में या विचाररत
होने की अवस्था में काम आने वाला सूक्ष्म शरीर होता है, तीसरा इन
दोनों को इनके बाह्य रूप देने वाला कारण शरीर होता है, ठीक इसी
प्रकार प्रत्येक विचार के भी क्रम से स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर होते
हैं। ज्यों ज्यों प्राणी का अनुभव बल बढ़ता जाता है,त्यों त्यों विचारों के
अन्दर के शरीरों में प्रवेश करने का अधिकार उसे मिलता जाता है—विचारों
के अन्तरात्मा के दर्शन उसे मिलने लगते हैं। यों साधारण रूप से किसी
बात को सुन लेने पर उसका सार समझ में नहीं आता। अनुकूल
परिस्थिति आजाने पर, जब उस बात के प्राण तक—उसके सार तक—
दृष्टि जा पहुँचती है, तब वही साधारण सी बात विचारक के जीवन की
बहुमूल्य सम्पत्ति बन जाती है। विचारों का जो कारण शरीर है, वही तो
अनुभव है। जिन विचारों के पीछे अनुभव का बल नहीं होता, वे विचार
निस्तेज, अकार्यकारी और प्रभावहीन रह जाते हैं। विचारों में प्रभाव-
शालिता, तेजयुक्तता और कार्यकारिता आने के लिए यह आवश्यक
है कि उन की पीठ पर अनुभव का हाथ रक्खा हुआ हो। इसी बात
को दूसरे शब्दों कहें तो कोरे ज्ञानवृत्त होने से काम नहीं चलता
( ङ )
आनन्द नहीं आता—आनन्द आने के लिए तो विज्ञानतृप्त होना,
अनुभवसंपन्न होना अत्यन्त आवश्यक होता है। परन्तु ज्ञान का विज्ञान यों
ही नहीं बन जाता। उसके लिए कुछ तपस्यायें करनी पड़ती हैं। उस ढंग
का वातावरण बना कर रखना पड़ता है। अपनी चर्या को वैसा बनाना
पड़ता है कि हमारा पसन्द किया हुआ विषय बेरोकटोक हो कर हमारे
अनुभव का अभेद्य, अच्छेद्य, अत्याज्य और अविस्मरणीय अंग बन जाय।
ऐसा न करने से उसी विषय को सम्पूर्ण आयुष्य भर स्वयं देखते तथा
औरों को सुनाते रहने पर भी वह विषय हमारे जीवन का उपयोगी भाग
नहीं बन पाता है। यह हमने अपने ही ऊपर कई बार देखा है और देख
रहे हैं। ज्ञान का विज्ञान बनाने के लिए आवश्यक तपस्या जब की जाती
है और जब वह तपस्या पूरी उतर जाती है—जब ज्ञान को अनुभव
का बल मिलजाता है—यही तो वह अवसर होता है जब कि अनादि
काल से स्वच्छन्द दिशा में बहती रहने वाली प्राणी की विचारनदी का
प्रवाह अपने प्रवाह कोण को सदा के लिए बदल बैठता है—जीवन में
अकल्पित परिवर्तन हो जाते हैं—मनुष्य कुछ का कुछ हो जाता है। ऐसे ही
रहस्यमय विचारों को अपने अन्दर रखने वाले, अनुभव का साथ कभी भी
न छोड़ने वाले, प्रत्युत उत्तरोत्तर गंभीर होते जाने वाले, ऐसे उत्तम ग्रन्थ
के टीकाकार होने के लोभ से प्रेरित होकर ही हमने इसकी टीका करने का
साहस किया है। इस टीका को लिखते समय मनन को ही अपना
प्रधान लक्ष्य रक्खा है—सोचा है टीका लिखने से इसका पूरा पूरा मनन
भी हो जायगा और यों हमारे विचारकोष में इन विचारों को एक
विशेष स्थान भी प्राप्त हो जायगा। साथ ही जो विचार आगे पहुँचाने के
लिये ऋषि ऋण नाम की धरोहर के रूप में हमें परम्परा से मिले हैं, यह
टीका उनके संक्रमण का एक द्वार बन जायगी और इससे हम अंशतः ऋण-
मुक्त भी होंगे।
( च )
यह तो हमें भली प्रकार मालूम है कि हमारी तपस्या में जिस अनुपात
से त्रुटियें हैं उसी अनुपात से हमारे मनन में और इसी अनुपात से मनन
के द्वारा इस टीका में भी उन त्रुटियों का रहना अनिवार्य तो है ही, फिर
भी अपनी ओर से तो यह ध्यान रक्खा ही है कि अनुभवानुमोदित बातें ही
टीका में रक्खी जांय । परन्तु अनुवाद में तो ऐसी बहुत सी बातें रह ही
गयी हैं कि जिनको कोरा ज्ञान ही ज्ञान कहा जा सकता है । विज्ञान किंवा
अनुभव नहीं कहा जा सकता । लगन जब होती है तब मनुष्य की अवस्था
और परिस्थितियें स्वयमेव ज्ञान का विज्ञान बनाती जाती हैं । इसके सिवाय
इनका और काम ही क्या है ? कहना चाहिये कि यह संपूर्ण संसार ज्ञान का
विज्ञान बनाने के लिये ही तो है । परन्तु सब ज्ञानों को अनुभवानुमोदित
कराने में जितना लम्बा समय अपेक्षित है उतना लम्बा धैर्य न रख सकने
के कारण शीघ्र ही इस टीका को प्रकाशनार्थ आना पड़ रहा है ।
पूज्य श्री अच्युतमुनि जी के शब्दों में "यह ग्रन्थ वेदान्त का प्रारम्भिक
ग्रन्थ भी है और सर्वमान्य होने से अन्तिम ग्रन्थ भी है । अद्वैत वेदान्त पर
अद्वैत सिद्धि नाम का जो प्रसिद्ध ग्रन्थ है उसको समग्र पढ़ लेने पर भी
उतना आनन्द नहीं आता जितना इसके एक एक श्लोक को पढ़ लेने से
आ जाता है ।" इसकी टीका को लिखते समय मूल ग्रन्थ के संस्कृत
टीकाकार रामकृष्ण विद्वान् की टीका से हमने बहुत सहायता ली है ।
इस ग्रन्थ की आवृत्ति करते समय जो जो सूक्ष्म विचार समझ में आये
हैं, उनको या तो टीका ही में या फिर संक्षेपों में जहाँ तहाँ लिख ही डाला
है । फिर भी हमारे समझे हुए सम्पूर्ण ग्रन्थ के तात्पर्य को थोड़े से थोड़े
शब्दों वाले एक वाक्य में, यहां भूमिका के रूप में कह देना इस लिये
आवश्यक प्रतीत होता है कि इससे पाठकों को इस ग्रन्थ को पढ़ने का दृष्टि-
कोण हाथ आ जायगा और इस बहाने भूमिका लिखने के सदाचार का
पालन भी हो जायगा ।
( छ )
गंभीर विचार जिस समय तक नहीं किया जाता, तब तक तो ऐसा
प्रतीत होता है कि संसार में ये जितने भी उद्योग किये जा रहे हैं, ये सब
के सब जीवन को चालू रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। यदि ये उद्योग
चालू न रक्खे जायंगे तो जीवनतत्व की समाप्ति ही हो जायगी। क्योंकि
जीवन को स्थिर बनाये रखने वाला जो कि आनन्द नाम का तत्व है, इन
उद्योगों के बिना, उसके मिलने का दूसरा कोई मार्ग है ही नहीं। हम
प्राणियों के हृदय पर इसी एक अविचारित भावना ने अपना अखण्ड आधिपत्य
जमा कर रक्खा है। परन्तु जो लोग धीरज धर कर इन्द्रियजन्य अनुभूतियों
से ऊपर उठकर शुद्ध अनुभूति में पहुँच चुके हैं, जो लोग साहस करके
पंचभूतमिश्रित अनुभूतियों की परिधि से बाहर निकल गये हैं, उनके कहने
से तो मालूम होता है कि बात इससे सर्वथा विपरीत है। जीवनतत्व को
शरीर मात्र में स मत मान लेना ही, और यों जीवनतत्व को सर्वथा न
समझना ही, इस भावना का सबसे बड़ा दोष है। संसार के ये जितने भी
अहर्निश उद्योग हैं ये तो सबके सब ही जीवन को शरीरमात्र में बन्दी
बनाये रखने वाले हैं, और उसी बन्दी जीवन के कारण आनन्द के व्यापक
साम्राज्य को भोगना छुड़ा कर, उसी आनन्द के सैकड़ों बाधाओं से आक्रान्त
और क्षुद्र से भी क्षुद्र कणों को चाट चाट कर, जीवन के दिन जिस किसी
भी प्रकार काट देने के लिये हैं। यह सब उद्योग तो जीवन का जो सच्चा
आनन्द है उससे—अपने ही घातक प्रयत्नों से—वंचित रह जाने के लिए हैं।
परन्तु असल बात तो यह है कि हमारा प्यारे से भी प्यारा यह जीवनतत्व
हमारे ही इस पंचभौतिक शरीर में सीमित नहीं है। औरों के शरीर में भी
सर्वथा हमारे ही जैसा, प्यारों से भी प्यारा, यह जीवनतत्व रह रहा है।
इतना ही क्यों जहां कोई भी शरीर नहीं है, ऐसा जो खाली स्थान हमें दीख
पड़ता है, वहाँ भी तो यह जीवनतत्व ठसाठस भरा पड़ा ही है। यह तत्व
तो शिला की तरह ठोस है—इसमें दूसरे तत्व के समाने की गुंजाइश ही
( ज )
नहीं है। सारे संसार में से खोज कर तिल भर स्थान भी तो ऐसा नहीं
निकाला जा सकता, जहाँ कि यह जीवनतत्व भरा न पड़ा हो—जहाँ सत्य
न हो, जहाँ ज्ञान न हो, या जहाँ आनन्द न हो ऐसा कोई स्थान है ही नहीं।
ऐसे स्थान का होना संभव है ही नहीं। सम्पूर्ण स्थान इसी आस्वान् ज्ञान-
रूप जीवनतत्व से लिपटे पड़े हैं और इसीकी ज्ञानमयी गोद में बैठ जाने
के कारण ही तो प्रकाशित हो रहे हैं। यह जीवनतत्व तो संसार भर में परि-
पूर्ण हो रहा है। कहना तो यों चाहिये कि सम्पूर्ण संसार पारावाररहित
इसी जीवनतत्व के एक क्षुद्र अज्ञात कोण में रह रहा है। यह लम्बा चौड़ा
संसार इसी देदीप्यमान जीवनतत्व का एक क्षुद्र बुद्बुद है। प्राणियों की
ओर से जितने भी अहर्निश उद्योग किये जा रहे हैं ये सब के सब तो इस
जीवनतत्व की व्यापकता को भुला डालने के लिये हैं और उसको अपने ही
शरीर में बन्दी बना डालने के लिये हैं तथा इसके परिणामस्वरूप अनन्त
आधियों और व्याधियों को अपने में निमन्त्रण दे देने के लिये हैं। यह प्राणी
जब तक अपने को उस व्यापक जीवन तत्व से पृथक् समझता रहेगा, तब
तक दूसरों को भी उस व्यापक तत्व से पृथक् ही समझा करेगा। जब यह
प्राणी जीवनतत्व को अपने ही शरीर में सीमित समझ लेता है, तब उसका
दुष्परिणाम यह होता है कि वह दूसरों के जीवन से और परिणाम में तो
अपने ही व्यापक जीवन से, प्रेमरहित बर्ताव खटकके कर पड़ता है। फिर
तो वह जो कुछ भी करता है, उसका कर्तव्याकर्तव्य, उसकी प्रवृत्ति निवृत्ति,
उसका आचार आदि सभी कुछ शरीर के लाभालाभ पर निर्भर हो जाते हैं।
यों इस विचार के परिणामस्वरूप प्राणी में आसुरी प्रवृत्ति बढ़ने लगती
है। संसार में जो बड़ी मार धाड़ जब तब होती रहती हैं वे ऐसे ही लोगों
के कारण होती हैं। ऐसे लोग किसी भी वहम में फँस जाने पर फिर उल्टा
सीधा कुछ भी नहीं देखते हैं; यह तो किसी भी प्रकार अपना काम बना
लेना चाहते हैं भले ही उसके लिये दूसरों के कितने ही प्राणों और स्वार्थों
( झ )
की आहुति दे देनी पड़ जाय। ये प्रलय तक के प्रबन्ध करते हैं, मानो यहां से
कभी जाना ही नहीं है। ये अगले संसार के अस्तित्व को निर्भीकता से
निषेध करते हैं। सैकड़ों आशाओं से वद्ध होकर और काम क्रोध के दास
होकर कामभोग के लिये अन्यायपूर्वक धनोपार्जन करने में थोड़ा सा भी
संकोच इनको नहीं होता। इनकी दृष्टि में इनसे बड़ा कुलीन, बुद्धिमान,
बलवान् कोई दूसरा होता ही नहीं। दूसरों की प्रतिष्ठा का तो ये कुछ भी
मूल्य समझते ही नहीं।
ऐसे जीवन में बस एक ही काम रह जाता है कि अपनी बेसमझी से
प्रेरित होकर पहले तो कुछ इच्छा कर ली और पीछे उस इच्छा को पूरी
करने में प्राणों तक की बाजी लगा बैठे और इच्छित विषय मिल गया तो
उसे भोगने लगे। संक्षेप में ऐसों का जीवन कामोपभोगतत्पर जीवन बन
जाता है। किसी भी भ्रान्त इच्छा के दास बन जाना और उसके पीछे सैकड़ों
उपद्रव खड़े कर देना बस इसी बात में इनके अनन्त आयुष्य समाप्त हो
जाते हैं। इनकी इस प्रवृत्ति का पूरा पूरा दुष्परिणाम जब तक नहीं निकल
आता और जब तक कि अन्दर से इस प्रवृत्ति की अस्वीकृति नहीं आजाती,
तब तक यह आसुरी प्रवृत्ति बढ़ती ही जाती है। इसके विपरीत जब तो जीवन
तत्व की सर्वव्यापकता समझ में आती है—जब जीवन तत्व का शरीर
मात्र में सीमित होना किसी तरह समझ में आता ही नहीं—तब मनुष्य
में स्वभाव से दैवी गुणों का प्रवेश होने लगता है। फिर किसी से भय नहीं
लगता । संसार के रहस्य पर दृष्टि जम जाती है। अब वह क्षुद्र अहं का
दास न रह कर पूर्ण अहं का उपासक बन जाता है। व्यापक जगदात्मा का
मैं भी एक क्षुद्र अवयव हूँ इस भाव से प्रभावित होकर व्यापक जगदात्मा
की सेवा के भाव से—उसको प्रसन्न करके इस का दर्शन लेने की भावना
से—दूसरों की सहायता करता है। क्षुद्र अहं में बांध रखने वाली इन्द्रियों
को तो दम की भारी बेड़ी में बांध कर रख देता है। जो काम करता है
( ञ )
उसी को व्यापक जगदात्मा की सेवा समझ कर करता है। सदा शुभ विचारों
में रत रहता है। अपने में कभी भी किसी अपूर्णता को आने नहीं देता।
अपने उदार विचारों के अनुकूल अपनी जीवनचर्या बनाकर रखता है।
घटघटवासी नारायण के दर्शन सब जीवों में करने के कारण सब के साथ
निष्कपट बर्ताव करता है। अपने उदात्त विचारों को कभी भी काम क्रोध
आदि विकारों से दबने नहीं देता। सत्य की रक्षा में सर्वात्मना तत्पर
रहता है। अपकारक पर क्रोध करके कर्त्तव्यभ्रष्ट नहीं हो जाता है। अपनी
जीवनयात्रा के उपकरणों से स्नेहपाश में बँध कर नहीं रहता। दिव्यता का
आह्वान करने वाले इत्यादि सभी गुण उसमें आ बसते हैं। जब उसे मालूम
हो जाता है कि ये सम्पूर्ण उद्योग इसी व्यापक जीवनतत्व को खोज
निकालने के लिये हैं। अब तो वह जीवन के प्रत्येक अनुभव में सत्य के
दर्शन करने लगता है। उसके जीवन की प्रत्येक घटना उसे सत्य और ज्ञान
का पवित्र सन्देश ला ला कर सुनाने वाली बन जाती है। जब कोई प्राणी
अपने यज्ञिय उद्योगों से, किंवा यज्ञमय जीवन से, अथवा व्यापक जगदात्मा
को सर्वसाक्षी मान कर दिये गये कर्मों से जीवनतत्व को खोज चुकता है,
तब उसके उद्योग समाप्त हो जाते हैं। फिर तो देश और काल के अनन्त मैदान
पर अखण्ड शासन करने वाला जीवन ही जीवन शेष रह जाता है। जीवन
के लिये फिर कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रहजाता। कर्तव्य तो जीवनतत्व के
अज्ञान को जीवित रखने के लिए ही होते हैं या फिर जीवनतत्व का दर्शन
कराने के लिए ही होते हैं। फिर इस अनन्त जीवन को मैं की छोटी चादर
उड़ाने वाला कोई नहीं रह जाता। यह सत्य और ज्ञान रूप व्यापक जीवन-
तत्व हम किसी से भी भिन्न नहीं है। परन्तु इसका हमारे साथ कोई ऐसा
सम्बन्ध भी नहीं है कि इसे हम 'मैं' या 'मेरा' कह सकें। जैसा यह हमको
अपना आत्मा मालूम है, ऐसे ही यह औरों को भी अपना आत्मा-स्वरूप
मालूम होता है। हममें से कोई एक जैसे इस शरीर को 'मैं' कह देते हैं
वैसे इस व्यापक आत्मा को 'मैं' नहीं कह सकते । साथ ही हममें से कोई
भी अपने को इस से भिन्न कहने का उचित दावा भी नहीं कर सकता, तब
तो केवल इसका दर्शन कर करके प्रमुदित रहना आ जाता है और इसी प्रमोद
में 'मैं' का रहा सहा अस्तित्व भी सदा के लिये मिट जाता है। इस सत्य
ज्ञान रूप व्यापक जीवनतत्व की बात जब मन और बुद्धि की समझ में
आ जाती है और मन के समझे को जब अहंकार अपना लेता है और अहंकार
के अपनाय चित्त की अखण्ड स्मृति पर जब चढ़ जाते हैं, तब संसार के
सम्पूर्ण जीव और समस्त पदार्थ एकतत्व बन जाते हैं। परेऽव्यये सर्व एकी
भवन्ति की पहेली यहाँ आकर समझ में आने लगती है।
परन्तु व्यापक जीवनतत्व की बात समझ में आने में इस तत्व के
आधार से प्रतीत होने वाली विश्वरचना ही सब से बड़ा विघ्न है। जैसे
सांप रस्सी को दीखने नहीं देता और देखने वाले के तथा रस्सी के बीच
में आकर खड़ा हो जाता है, इसी प्रकार इस व्यापक ज्ञानरूप जीवनतत्व
के और हमारे बीच में आकर खड़ी हो गयी हुई विश्वरचना ने हमारा सम्पूर्ण
ध्यान अपनी ओर खींच कर, जो अतत्व है उसी का दर्शन हमें करा रक्खा है
और तत्व की प्रतीति को रोक दिया है। इस ग्रन्थ में उस तत्व के दर्शन के
विघ्नों को हटाने की विधि को बताते हुए तत्व दर्शन करने की विधि तत्वविवेक
नाम के प्रथम प्रकरण में वर्णित है। दूसरे तीसरे और चौथे प्रकरणों में
तत्व दर्शन के जो तीन प्रधान विघ्न हैं उनको ही तत्वदर्शन का सहायक
बना लेने की विधि पर विचार किया है। पांचवें महाकाव्यविवेक नाम
के प्रकरण में आगम किंवा अनुभवप्रधान हो जाने पर अनुभूति का जो-जो
व्यावहारिक रूप हो जाता है उसका वर्णन है। छठे चित्रदीप नाम के प्रकरण
में अपनी ही अज्ञानतूलिका से लिखे हुए जगच्चित्र को अपने सत्यान्वेषी
प्रयत्नों से मिटा कर स्वयं अकेला शेष रह जाने की विधि पर प्रकाश डाला
है। तृप्तिदीप नाम के प्रकरण में बताया है कि व्यापक जीवनतत्व के स्वरूप
( ऊ )
का परिज्ञान होने पर जब मन में किसी भी प्रकार के सुख की इच्छा शेष
नहीं रह जाती तभी सच्चे सुख का आविर्भाव होता है। कूटस्थदीप में
चेतनाकार बनी हुई बुद्धियों की संधियों को भी और बुद्धियों के अभावों
को भी प्रकाशित करती रहने वाली सामान्य कूटस्थ चेतना का दर्शन कराया
गया है। जो लोग ब्रह्मतत्त्व का विचार नहीं कर सकते परन्तु उसके दर्शन
पर श्रद्धा रखते हैं उनके लिये उपासना किंवा योग की विधि बताने के
लिये ध्यानदीप नाम का प्रकरण है। नाटकदीप प्रकरण में कुतूहल वश
खेले गये इस जगन्नाटक के पटक्षेप करने की विधि पर विचार किया है।
पिछले पांचों प्रकरणों में अनेक द्वारों से आनन्द रूप का दर्शन कराते हुए
ब्रह्मतत्त्व का वर्णन किया है। यों इस ग्रन्थ में एक ही व्यापक जीवनतत्त्व
को पन्द्रह प्रकार से दिखाया गया है।
अब संक्षेप में ग्रन्थकार का थोड़ा सा परिचय देना भी आवश्यक
प्रतीत होता है—
पंचदशी के रचयिता श्री विद्यारण्य महामुनि अत्यन्त त्यागी अत्यन्त
बुद्धिमान व्यवहारचतुर कर्त्तव्यदक्ष और महाविभूतियुक्त पुरुष थे। इन्होंने
दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य की स्थापना युक राजा के द्वारा करायी थी
और उस साम्राज्य का संचालन भी ये स्वयं ही करते थे। ई० सन् १३३५
में हुकराय और बुकराय भाइयों ने सेना आदि जुटाकर इनकी सलाह से
विजयनगर राज्य की स्थापना की थी। उसके बाद विजयनगर
का साम्राज्य बढ़ने लगा और बड़े ठाट बाट से चलता रहा। ऐसे महान्
राज्य की स्थापना और संचालना जिस महापुरुष के द्वारा हुई थी उन
श्री विद्यारण्य मुनि का जन्म लगभग १३०० शालिवाहन में हुआ था।
कम से कम १३९१ तक ये जीवित रहे हैं। अपने सम्बन्ध में अपने ग्रन्थों
में इन्होंने जो लिखा है उससे मालूम होता है कि इनका पूर्वाश्रम का नाम
'माधवाचार्य' था, ये माधव मन्त्री के नाम से उसी समय प्रसिद्धि पा चुके
( ङ )
थे । चतुर्थ आश्रम में इन का नाम 'विद्यारण्य' हो गया था । इनके पिता
का नाम 'मायण' और माता का नाम 'श्रीमती' था । 'सायण' और 'भोग-
नाथ' नामक दो छोटे भाई थे । 'सर्वज्ञविष्णु' तथा 'भारतीतीर्थ' नाम के
इनके दो गुरु थे । पूर्व आश्रम में राज्य के कार्य में परम प्रवीण रहते हुए
इन्होंने असाधारण योग्यता से उच्च कोटि के ग्रन्थ बनाकर वेद शास्त्रों की
प्रतिष्ठा भी बढ़ायी थी । फिर संसार से विरक्त होकर संन्यास दीक्षा लेकर
विद्यारण्य मुनि नाम से शृङ्गेरी मठ के शंकराचार्य बने थे ।
जिस कुटुम्ब में ये उत्पन्न हुए थे यह एक छोटा सा ब्राह्मणकुटुम्ब था ।
इस कुटुम्ब के सभी, बालक बड़े बुद्धिमान और कर्तृत्वशाली हुए । सायण
तो वेदभाष्यकार के नाते प्रसिद्ध ही हैं । भोगनाथ भी शीघ्र ही संन्यासी
हो गये थे । ये माधवाचार्य स्वयं पढ़ पढ़ाकर नयी अवस्था में ही तपस्या
के लिये वन चले गये थे । जब ये वन में तपस्या कर रहे थे तब हुक्क वुक्क
नाम के राजपुत्रों से भेंट होने के बाद सन् १३९१ तक इस महापुरुष का
सारा ही समय भारी राजनैतिक कारवार, अत्यन्त गहन और उपयुक्त ग्रन्थों
के निर्माण और शृंगेरी पीठ के स्वामी की हैसियत से धर्माधिकार चलाने में
बीता था। उन्होंने एक श्रेष्ठ कर्मयोगी की भाँति निष्काम बुद्धि से राज्यस्थापन
और धर्म रक्षण के कार्य करके आर्य संस्कृति को जीवित रक्खा था । वे
किस मनोभावना से अपना निष्काम कर्म करते थे यह इनके पंचदशी के---
"ज्ञानेनाचरितुं शक्य सम्यग् राज्यादि लौकिकम्"
"ज्ञानी लोग राज्य आदि लौकिक कामों को अच्छी तरह से चला सकते हैं ।
ज्ञानी का ज्ञान यदि परिष्कृत है सच्चा है तो राज्य के गहन कारबार भी
उसे दबा नहीं सकेंगे"इस वाक्य से बहुत ही स्पष्ट हो जाता है। इन्होंने उस
राज्य में किस प्रणाली से क्या क्या सुधार किये इसका ब्योरा अभी
तक भी इतिहासज्ञ लोग नहीं बता सके हैं।
( ढ )
निम्नलिखित ग्रन्थों से ग्रन्थकार के नाते श्रीविद्यारण्यमुनि का
सम्बन्ध जाना गया है—
१ ऋग्वेद भाष्य, २ यजुर्वेद भाष्य, ३ सामवेद भाष्य, ४ अथर्ववेद
भाष्य, ५ चारों वेदों के शतपथ ऐतरेय तैत्तिरीय ताण्य आदि ब्राह्मण ग्रन्थों
का विचार, ६ दशोपनिषद्दीपिका, ७ जैमिनीय न्यायमालाविस्तर, ८ पंचदशी,
९ अनुभूतिप्रकाश, १० ब्रह्मगीता, ११ पाराशर स्मृति भाष्य, १२ मनुस्मृति-
व्याख्यान, १३ सर्वदर्शनसंग्रह, १४ माधवीय धातुवृत्ति, १५ शंकरदिग्विजय,
१६ कालनिर्णय ।
कई लोगों के मत से वेदभाष्यकर्ता इनके छोटे भाई 'सायणाचार्य'
ही थे। इन ग्रन्थों को सायणमाधवीय कहने से यह मालूम होता है कि
वेदभाष्य से इनका रचयिता का सम्बन्ध न भी हो तौ भी उसमें इनका
हाथ अवश्य था।
विद्यारण्य स्वामी की पंचदशी जिस पर कि यह भाषा टीका लिखी
गई है सेतुबन्ध रामेश्वर से लेकर हिमालय तक अद्वैतवेदान्त पर सर्वमान्य
ग्रन्थ समझा जाता है।
निवेदक—
लेखन स्थान— रामावतार
श्रद्धेय श्री अच्युतमुनि जी का रतनगढ़ (जि० बिजनौर)
आश्रम, गंगातीर हिन्दप्रान्त