पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 25, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वविवेकप्रकरणम् ७
इस प्रकार युक्ति से आत्मा सच्चित् तथा परानन्दरूप सिद्ध
हो गया। वेदान्तों में परब्रह्म को भी सच्चिदानन्द स्वरूप ही बताया
गया है तथा उन वेदान्तों ने उन दोनों की एकता का उपदेश भी
कर दिया है।
इस प्रकार आत्मा की सत् चित् तथा परमानन्दता का सम-
र्थन युक्ति से हो गया। परब्रह्म भी वैसा ही सच्चिदानन्द स्वरूप है
वेदान्तों में आत्मा और ब्रह्म की [जिनको 'त्वं और तत्' भी कहते
हैं] एकता [किंवा अखण्ड एकरसता] का ही प्रतिपादन किया
गया है। इस एकता का प्रतिपादन करके ही वेदान्तों पर प्रामाण्य
आया है। आत्मा की सच्चिदानन्दरूपता का ज्ञान तो युक्ति से भी
हो जाता है, परन्तु आत्मा और ब्रह्म एक है इस बात का ज्ञान
वेदान्तों के सिवाय किसी और से होना संभव नहीं है।
अभाने न परं प्रेम, भाने न विषये स्पृहा।
अतो भानेऽप्यभातासौ परमानन्दतात्मनः ॥११॥
आत्मा की परमानन्दरूपता का अभान होने पर तो आत्मा
से परम प्रेम नहीं होना चाहिये, तथा भान होने पर विषयों की
इच्छा क्यों होनी चाहिये ? इस कारण यह मानना पड़ता है कि
परमानन्दरूपता, ज्ञात होने पर भी अज्ञात ही बनी हुई है।
आत्मा की परमानन्दरूपता के विषय में यह आक्षेप है किं
उसकी परमानन्दरूपता की उसे प्रतीति नहीं होती है अथवा हो
जाती है? यदि प्रतीति का होना नहीं मानते तो आत्मा से परम प्रेम
नहीं होना चाहिये। क्योंकि प्रेम तो विषय की सुन्दरता के ज्ञान से
उत्पन्न होने वाला एक पदार्थ है। यदि तो परमानन्दरूपता की
प्रतीति मानी जाय तो सुख के साधन स्रक्, चन्दन, वनिता आदि