पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८७
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८७
होता। जैसे यह कहा जाता है कि घट पट नहीं है तो यह
घट का वस्तुकृत अन्त हो गया। ऐसे ब्रह्म को यह नहीं कह
सकते कि ब्रह्म घट नहीं है ब्रह्म पट नहीं है। वह तो सर्वात्मा
होने से घट भी है और पट भी है। यों ब्रह्म में तीन प्रकार
की अनन्तता रहती है।
देशकालान्यवस्तूनां कल्पितत्वाच्च मायया।
न देशादिकृतोऽन्तोस्ति ब्रह्मानन्त्यं स्फुटं ततः ॥३६॥
देश काल तथा अन्य वस्तुओं की कल्पना माया ही ने तो
कर डाली है। इससे ब्रह्म में उन [ देश कालादि ] का किया
हुआ अन्त नहीं हो सकता। यों ब्रह्म की अनन्तता समझ में
आ सकती है।
परिच्छेद कर डालने वाले देश, काल तथा अन्य पदार्थ
सब माया ही ने तो कल्पित कर लिये हैं। सो जैसे गन्धर्व
नगर से आकाश में जब देशादिकृत अन्त प्रतीत होने लगता
है; वह अन्त जैसे पारमार्थिक नहीं होता, इसी प्रकार माया
के बनाये देशादि का किया हुआ परिच्छेद [ खण्ड ] ब्रह्म में
नहीं होता। इससे ब्रह्म की अनन्तता सब को स्पष्ट हो जाती
है। उस ब्रह्म तथा आत्मा को 'अयमात्मा ब्रह्म' [बृ० २-५-१९]
इत्यादि श्रुतियें एक बता रही हैं, इस कारण आत्मा की अनन्तता
तो स्वतः ही सिद्ध हो जाती है।
सत्यं ज्ञानमनन्तं यद् ब्रह्म तद्वस्तु, तस्य तत्।
ईश्वरत्वं च जीवत्व मुपाधिद्वयकल्पितम् ॥३७॥
जो ब्रह्म नाम की वस्तु सत्य, ज्ञान तथा अनन्त है, वही
एक पारमार्थिक वस्तु इस संसार में है। उस ब्रह्म को जब
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'ईश्वर' वा 'जीव' कहा जाता है, वह आगे कही दो उपाधियों
से कल्पित किया हुआ होता है [ कल्पित होने से ही ये जीवे-
श्वर भी उस ब्रह्म के परिच्छेदक नहीं बन सकते हैं ]
शक्तिरस्त्यैश्वरी काचित् सर्ववस्तुनियामिका ।
आनन्दमयमारभ्य गूढा सर्वेषु वस्तुषु ॥३८॥
ऐश्वरी अर्थात् ईश्वर से सम्बन्ध रखने वाली [ ईश्वर की
उपाधि बनी हुई] कोई एक ऐसी शक्ति है [जिसका सत् या असत्
किसी भी रूप से निर्वचन नहीं हो सकता] जो [पृथिवी आदि]
सम्पूर्ण नियम्य वस्तुओं को नियम में रख रही है। वह शक्ति
आनन्दमय से लेकर [ब्रह्माण्ड पर्यन्त] सभी वस्तुओं में गूढ भाव
से छिपी बैठी है [यही कारण है कि वह दीख नहीं पड़ रही है]।
वस्तुधर्मा नियम्येरन् शक्त्या नैव यदा तदा ।
अन्योऽन्यधर्मसांकर्याद् विप्लवेत जगत् खलु ॥३९॥
यदि यह शक्ति, पृथिवी आदि वस्तुओं के [काठिन्य द्रवत्व
आदि ] धर्मों को नियम में न रखती होती तो अन्योऽन्य धर्म
की संकरता किंवा मिश्रण हो जाने से [ किसी एक जगह
नियत भाव से न रहने से ] जगत् में विप्लव मच जाता ।
चिच्छायावेशतः शक्तिश्चेतनेव विभाति सा।
तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत् ॥४०॥
चिच्छायावेश [ किंवा चिदाभासके प्रवेश ] से यह शक्ति
चेतन सी प्रतीत हुआ करती है [ इसी से वह नियामक हो
सकती है ] उस शक्ति रूपी उपाधि के सम्बन्ध से [ सत्यादि
रूप ] ब्रह्म ही ईश्वरभाव को प्राप्त हो जाता है [किंवा सर्वज्ञत्व
आदि धर्मों से युक्त हो जाता है ]।