पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
चित्रदीपप्रकरणम् १५७
चित्रदीपप्रकरणम् १५७
एक जडता का स्मरण सोकर उठे हुए पुरुषों को होता है । सो
यह स्मरण तब तक नहीं हो सकता जब तक कि सुषुप्ति काल
की जडता को उसने अनुभव न किया हो [ बस इसी से उस
समय की जड़ता का अनुभव मान लिया जाता है । ]
द्रष्टुर्दृष्टेरलोपश्च श्रुतः सुप्तौ ततस्त्वयम् ।
अप्रकाशप्रकाशाभ्यामात्मा खद्योतवद् युतः ॥९७॥
नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते अविनाशित्वात् [बृह० ४-३-२३]
इस श्रुति में कहा है कि द्रष्टा आत्मा की जो स्वरूपभूत दृष्टि
है उसका लोप कभी नहीं होता । क्योंकि वह दृष्टि विनाश-
रहित स्वभाव वाली है । इस प्रमाण से भी यही सिद्ध होता
है कि यह आत्मा खद्योत के समान प्रकाश और अप्रकाश
[ स्फुरण और अस्फुरण ] दोनों ही से युक्त है ।
निरंशस्योभयात्मत्वं न कथंचिद्घटिष्यते ।
तेन चिद्रूप एवात्मेत्याहुः सांख्यविवेकिनः ॥९८॥
निरंश [ निरवयव ] पदार्थ किसी प्रकार भी उभय रूप
नहीं हो सकता । इस कारण सांख्यविवेकी यह मानते हैं कि
आत्मा तो केवल चिद्रूप ही है ।
जाड्यांशः प्रकृते रूपं विकारि त्रिगुणं च तत् ।
चितो भोगापवर्गार्थं प्रकृतिः सा प्रवर्तते ॥९९॥
[जाड्य का जो स्मरण उठे हुए पुरुषों को होता है उस
स्मरण में] जो जाड्य भाग है वह तो प्रकृति का रूप है । वह
विकारी है । वह सत्व रज तम इन त्रिगुणात्मक है । चेतन
पुरुष को भोग और अपवर्ग दिलाने के लिये वह प्रकृति प्रवृत्त
हुआ करती है ।