पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 29, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्त्वविवेकप्रकरणम् ११
पक्षी आदि अनेक भेद हो जाते हैं । वह अविद्या ही 'कारण शरीर'
कहाती है, क्योंकि स्थूल सूक्ष्म शरीर तथा स्थूल सूक्ष्म भूतों का
वही कारण मानी गयी है । उस कारण शरीर में अभिमान करने
वाले अथवा उसी में 'मैं' भावना करने वाले जीव को 'प्राज्ञ' नाम
से कहा जाता है ।
तमःप्रधानप्रकृते स्तद्भोगायेश्वराज्ञया ।
वियत्पवनतेजोऽम्बुभुवो भूतानि जज्ञिरे ॥१८॥
उन [प्राज्ञों] के भोग के लिये ईश्वर की आज्ञा से तमःप्रधान
प्रकृति में से आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा भूमि नाम के पांच
महाभूत उत्पन्न हुए।
उन प्राज्ञ नामक जीवों के सुख-दुःख-साक्षात्काररूपी भोग
के लिये उस प्रकृति में से [जिस में कि तमोगुण की प्रधानता है]
ईशान आदि शक्ति वाले जगत् के अधिष्ठाता की आज्ञा से
[ जिसको उसका ईक्षण भी कहा जाता है ] आकाश आदि पांच
भूत उत्पन्न होगये ।
सत्त्वांशैः पञ्चभिस्तेषां क्रमाद्धीन्द्रियपञ्चकम् ।
श्रोत्रत्वगक्षिरसनघ्राणाख्यमुपजायते ॥ १९ ॥
उन आकाश आदि पांच भूतों के पृथक् पृथक् पांच सत्त्व
भागों से क्रमानुसार श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना तथा घ्राण नाम
की पांच ज्ञानेन्द्रियां उत्पन्न हो जाती हैं। [अर्थात् एक एक भूत
के पृथक् पृथक् सत्त्वांश से एक एक इन्द्रिय की उत्पत्ति होती है]
तैरन्तःकरणं सर्वै र्वृत्तिभेदेन तद् द्विधा ।
मनो विमर्शरूपं स्याद् बुद्धिः स्यान्निश्चयात्मिका॥२०॥
उन पांचों भूतों के पांचों सत्त्वांशों से मिलकर एक अन्तः-