पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६१
तृप्तिदीपप्रकरणम् २६१
परमात्मा को पूर्ण रूप से जान ले [ जिससे उसमें किसी प्रकार
का संशयादि न रह जाय] इतना कर चुकने पर फिर प्रज्ञा
किंवा एकाग्रता को करले [ अर्थात् ब्रह्मात्मैकता के ज्ञान की
एक निरन्तर धारा बहादे] अनात्मा को विषय करनेवाले
शब्दों का ध्यान [ और कथन दोनों ही] छोड़ दे। क्योंकि वह
ध्यान और वह कथन वाणी और मन की थकावट का ही तो
कारण होता है। [शब्दों का ध्यान करने से मन थकता है
तथा शब्दों को बोलने से वाणी को श्रम होता है। यों श्रुति
ने अपने मुख से इसी ब्रह्मनिष्ठता का वर्णन किया है।]
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥१०८॥
जो महापुरुष मुझसे अनन्य होकर मेरा चिन्तन करते
करते सदा मेरी ही उपासना किया करते हैं-[सदा मद्रूप ही
हुए रहते हैं] नित्य ही मुझमें लगे हुए [मेरे गम्भीर अन्तस्तल
तक पहुँचे हुए] उन उपासकों के भोजनाच्छादि का प्रबन्ध
और उनके धन की रक्षा का भार मेरे कन्धों पर रहता है।
क्योंकि उन्होंने तो मुझको ही अपना आत्मा समझ लिया
है। वे फिर अपने भोजनादि के प्रबन्ध की चिन्ता नहीं
करते । जिस प्रकार कोई ग्वाला किसी पशु को चराना छोड़
देता है तो उस पशु का स्वामी उसे नहीं छोड़ बैठता । फिर
तो वह स्वयं ही उसके खान पान की देखभाल किया करता
है। इसी प्रकार यदि कोई साधक ज्ञानावेश में आकर या
भक्ति के उद्रेक में फँस कर शरीर के निर्वाह की चिन्ता छोड़
देता है तो समष्टि का अभिमानी उसके निर्वाह को अपने जिम्मे
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ले लेता है। ईश्वर के संकल्प का ही दूसरा नाम प्रारब्ध है।
सो उस प्रारब्ध के प्रताप से किन्हीं भी लोगों के मन में ऐसी
प्रेरणायें हो जाती है कि अमुक को भोजनादि की आवश्य-
कता है चलो दे आवें। देखते हैं कि जब कोई अन्धा, जो अब
अपनी सहायता स्वयं नहीं कर सकता, हमारे सामने आकर
कुछ मांगता है तब हमारे मन में उसको भोजनाच्छादनादि
देने की अन्तः प्रेरणायें, जब तक उसे कुछ दे नहीं देते,तब तक
बार बार होती रहती हैं। यों इस मार्ग से असमर्थ की अपङ्ग
की, और भक्ति में गहरे डूवे हुए भक्तों की, चिन्ता ईश्वर [देने
लेने वाले दोनों के अन्तर्यामी ] स्वयं करते हैं। जो तो बहु-
र्मुख रहते हैं, अपना भार अपने ही ऊपर उठाये रहते हैं,
भगवान भी उनकी तरफ से निश्चिन्त बने बैठे रहते हैं।
इति श्रुतिस्मृती नित्यमात्मन्येकाग्रतां धियः ।
विधत्तो विपरीताया भावनायाः क्षयाय हि ॥१०९॥
ऊपर कही हुई ये श्रुति और स्मृतियें कहती हैं कि—विप-
रीत भावना की निवृत्ति करने के लिये आत्मा में सदा चित्त
को एकाग्र किये रहना चाहिये। [ऐसे लोग पेट कहाँ से पालें ?
बाल बच्चों को कहाँ से खिलायें ? इसी का उत्तर पहले श्लोक में
जिम्मेदारी की दस्तावेज लिखकर गीता में दिया है।
यद्यथा वर्तते तस्य तत्वं हित्वाऽन्यथात्वधीः ।
विपरीता भावना स्यात् पित्रादावरिधीर्यथा ॥११०॥
जो [शुक्ति आदि]पदार्थ जिस रूप का है, उसके उस रूप
को तो छोड़ दिया जाय और उसको अन्यथा [रजत आदि
रूप का] समझ लिया जाय, बस यही 'विपरीत भावना,कहाती
है [इसी को 'अतत्' को 'तत्' समझ लेना भी कहा जाता है]
जैसे कि पिता आदि हितैषियों को शत्रु समझ लिया जाता है
तो इसको भी विपरीत भावना ही कहते हैं ।
आत्मा देहादिभिन्नोयं मिथ्या चेदं जगत् तयोः ।
देहाद्यात्मत्वसत्यत्वधी र्विपर्ययभावना ।।१११।।
यह आत्मा वस्तुतः देहादियों से भिन्न ही है और यह
जगत् भी मिथ्या ही है । ऐसा होने पर भी आत्मा को तो
देहादि रूप मान लेना, तथा जगत् को सत्य समझ लेना, यही
इस प्रकरण की 'विपरीत भावना' है ।
तत्त्वभावनया नश्येत् सातो देहातिरिक्तताम् ।
आत्मनो भावयेत् तद्वन्मिथ्यात्वं जगतोऽनिशम्।।११२।।
[देहादि की आत्मता और जगत् की सत्यता बुद्धि वाली]
वह विपरीत भावना, तत्व भावना से [या यों समझना चाहिये
कि आत्मा तो देहादि से भिन्न है तथा यह जगत् मिथ्या है
ऐसा निरन्तर ध्यान करते रहने से ] नष्ट हो जाती है । इस
कारण आत्मा की देहादि से भिन्नता तथा देहादि जगत् के
मिथ्यापन की भावना सदा ही किया करे ।
किं मन्त्रजपवन्मूर्तिध्यानवद् वात्मभेदधीः ।
जगन्मिथ्यात्वधीश्चात्र व्यावत्र्या स्यादुतान्यथा ।।११३।।
आत्मा के देहादि से भिन्न होने के ज्ञान को, तथा जगत् के
मिथ्या होने के विचार को, मन्त्र के जप की तरह, या देवता के
ध्यानादि की तरह नियम से करें ? या लौकिक कामों की तरह
नियम के बिना भी कर सकते हैं ? यह एक साधन मार्ग का प्रश्न है।
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अन्यथेति विजानीहि दृष्टार्थत्वेन भुक्तिवत् ।
बुभुक्षुर्जपवद् भुङ्क्ते न कश्चिन्नियतः क्वचित् ॥११४॥
यह तो बिना नियम ही करना चाहिये। क्योंकि यह मामला
तो भोजन आदि की तरह दृष्टार्थ ही है । भूख को हटाने के
लिये खाना चाहने वाला पुरुष जप करने वाले की तरह नियम
से नहीं खाता [किन्तु जिस तरह भी उसकी भूख शान्त हो
जाय उसी तरह भोजन करता है ।]
अश्नाति च नवाश्नाति भुङ्क्ते वा स्वेच्छयाऽन्यथा ।
येन केन प्रकारेण क्षुधामपनिनीषति ॥११५॥
भूख की शान्ति चाहने वाला पुरुष अन्न हो तो खाता है,
नहीं हो तो नहीं खाता, [बिना खाये ही दिन काट देता है]
आसन पर बैठकर चलते चलते मूढ़े या कुर्सी पर बैठकर अथवा
लेटे लेटे ही स्वेच्छा से खाया करता है । जिस किसी तरह
भूख को ही हटा देना चाहता है । [भाव यह है कि भोजन
तो भूख की शान्तिरुपी दृष्ट फल के लिये ही करना चाहिये।
उस में जो विशेष विशेष नियम लगा दिये गये हैं वे नियम
परलोक के लिये होते हैं ।]
नियमेन जपं कुर्यादकृतौ प्रत्यवायतः ।
अन्यथाकरणेऽनर्थः स्वरवर्णविपर्ययात् ॥११६॥
जप को तो नियम से ही करना चाहिये । जप को न करें,
तो पाप चढ़ता है । उस जप को यदि अविधिपूर्वक करें तो
स्वर और वर्ण के उलट पुलट हो जाने से अनर्थ हो जाता है ।
क्षुधेव दृष्टबाधाकृद् विपरीता च भावना ।
जेया केनाप्युपायेन नास्त्यत्रानुष्ठितेः क्रमः ॥११७॥