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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 726 में से

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पृष्ठ 22

४ पञ्चदशी
सोकर उठे हुए पुरुष को जो सुषुप्ति काल के अज्ञान का ज्ञान
है जिससे वह कहता है कि 'मैंने सोते समय कुछ भी जाना नहीं'
वह उसका एक स्मरण ही है । वह स्मरण तो अनुभव किये हुए
विषय का ही होता है । जो भी कोई स्मृति होती है उससे प्रथम
अनुभव का होना सर्वमान्य सिद्धान्त है । इससे यही सिद्ध होता
है कि सुषुप्ति में रहने वाले उस तम को अर्थात् अज्ञान को तत
उसने अनुभव किया था।
स बोधो विषयाद्भिन्नो न बोधात् स्वप्नबोधवत् ।
एवं स्थानत्रयेऽप्येका संवित् तद्वद्दिनान्तरे ॥६॥
मासाब्दयुगकल्पेषु गतागम्येष्वनेकधा ।
नोदेति नास्तमेत्येका संविदेषा स्वयंप्रभा ॥७॥
सुषुप्ति समय का वह ज्ञान अपने विषय [सुषुप्तिकाल के
अज्ञान] से तो भिन्न होता है परन्तु वह (स्वप्नबोध) के समान् ही
बोध से भिन्न कदापि नहीं होता । इस प्रकार एक दिन की जाग्र-
दादि तीनों अवस्थाओं में, दूसरे दिनों में, मास, वर्ष, युग तथा
कल्पों तक में, जो बीत चुके या आगे आयेंगे, एक ही ज्ञान बना
रहता है । इसका कभी उदय या विनाश नहीं होता । यह ज्ञान
एक स्वयंप्रकाश तत्व है ।
सुषुप्ति काल के अज्ञान का वह बोध [अनुभव] भी अपने
अज्ञान नाम के विषय से भिन्न तो होना ही चाहिये। परन्तु स्वप्नबोध
के समान दूसरे बोध से [उसके] भिन्न होने का कोई कारण ही
नहीं है । इस प्रकार एक दिन की जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं में
एक ही ज्ञान रहता है । इसी रीति से दूसरे दिन में भी ज्ञान की
अभिन्नता को समझ लेना चाहिये । जैसे एक दिन की तीनों अव-