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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

प्रकरणगत बात तो यही हुई कि—घट की मिट्टी ने, घट बन जाने

१२० पञ्चदशी

बोध हो जाने पर ही अद्वैतवादी अपने को कृतकृत्य समझता है ।
प्रकरणगत बात तो यही हुई कि—घट की मिट्टी ने, घट बन जाने
पर भी, अपने मृद्रूप का परित्याग नहीं किया, इस कारण यह घट मिट्टी
का 'विवर्त' है । अब मिट्टी का ज्ञान हो जाने पर घट के सत्य होने
का विचार जाता रहेगा । विवर्त उपादानों में यही होता है कि घट
और कुण्डल के बन जाने पर भी उनका मृद्भाव या सुवर्णभाव बना
ही रहता है । आरुणि ने भी मिट्टी, सोना और लोहे के तीन दृष्टान्त
इसी अभिप्राय से दिये हैं कि बहुत से पदार्थों में कार्यों का अनृत
होना देखकर साधक लोग सभी भूतभौतिकपदार्थों के मिथ्यापन
की वासना अपने जी में दृढ़ता से बैठा लें। इन भूत भौतिक पदार्थों
में जितना अनृत भाग है उसके जानने का तो कुछ भी उपयोग
नहीं होता । क्योंकि तत्व का ज्ञान तो किसी काम आ सकता है,
अनृत का ज्ञान किसी भी उपयोग में नहीं आता । कार्य घटादियों
में जितना सच्चा भाग है उतना कारणस्वरूप ही है, ऐसा जो लोग
जान जाते हैं, उन लोगों को तो इस बात से कुछ विस्मय नहीं होता ।
परन्तु जो अज्ञ हैं—जिन्हें तत्व ज्ञान नहीं हो पाया है—उनको
ऐसी बात सुनकर बड़ा ही विस्मय हुआ करता है । जिन लोगों
को ऐसे संस्कार नहीं होते, वे जब यह सुनते हैं कि एक ऐसी
वस्तु भी है कि जिसे जानकर सभी पदार्थों का ज्ञान होजाता है
तब इनको बड़ा विस्मय होता है । परन्तु उन्हें गम्भीर होकर विचार
करने का निमन्त्रण हम देते हैं—वे समझें कि एक के ज्ञान से सर्व-
बोध की जो बात कही है, उसका यह मतलब नहीं है कि उसके
ज्ञान में व्यक्तिगत रूप से संसार के सभी पदार्थ आ जाते हैं। अद्वैत
ज्ञान की ओर उन्हें आकृष्ट करना ही इस का मुख्य भाव है । मिट्टी
के एक पिण्ड को यदि कोई जान लेता है उसके बाद जब वह

ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द १२१
मिट्टी के बने किसी भी पदार्थ को देखता है तब सभी को जान
लेता है कि यह भी मिट्टी का बना है और यह भी मिट्टी का ।
इसी प्रकार ब्रह्मनाम के सर्वानुगत एक-तत्व का परिज्ञान जब किसी
को हो जाता है, तब उसी से बने हुए इस सकल जगत् का ज्ञान
भी उसे हो ही जाता है । ब्रह्म सच्चिदानन्द स्वरूप है और यह
जगत् नामरूपात्मक है । यहं जगत् पहले अव्याकृत था, इसे व्यक्त
करते समय इसका कुछ 'नाम' और कुछ 'आकार' बना दिया गया
है। अव्याकृत से हमारा अभिप्राय ब्रह्म में रहने वाली इस अचिन्त्य-
शक्ति माया से ही है। अविक्रिय ब्रह्म में रहने वाली वह माया ही
अनेक रूप हो जाती है—सबसे पहले उसका आकाश बनता है,
वह भी 'अस्ति' 'भाति' और 'प्रिय' अर्थात् 'सत्' 'चित्' और
'आनन्द' स्वरूप ही होता है। उसका अपना खास रूप तो 'अव-
काश' ही है। वही बिचारा मिथ्या है, वे तीनों [ सच्चिदानन्द ]
मिथ्या नहीं हैं। इस अवकाश पर जरा विचार का प्रयोग करके
देखिये—यह अवकाश व्यक्त होने से पहले नहीं था, नष्ट हो जाने
के बाद भी यह अवकाश नहीं रहेगा। यह तो बीच में कुछ काल
के लिये पानी के बुलबुले की तरह व्यक्त हो गया है। आदि और
अन्त में न होने के कारण यह तो वर्तमान में भी नहीं है। परन्तु
यह बात बुद्धियोग से ही जानी जा सकती है। ऊपर जिन सच्चिदा-
नन्दों का वर्णन किया है वे घड़े आदि में मिट्टी की तरह सदा सब
कार्यों में ही अनुगत रहते हैं। बताओ, जब तुम अवकाश को भूल
जाते हो तब तुम्हें क्या भासा करता है। उस समय तुम्हें जो तत्व
भासता है, उस तत्व को कुछ न कुछ तो कहना ही होगा। ऐसे
समय उदासीनावस्था होने के कारण उस तत्व को 'सुख' ही कहना
चाहिये। जो अनुकूल भी प्रतीत न हो और प्रतिकूल भी न लगे

१२२ पञ्चदशी
वही तो निजसुख होता है। जब कोई अनुकूल पदार्थ दीखता है
तब हर्ष होता है, प्रतिकूल जान पड़े तब दुःख हो जाता है, जब
तो अनुकूल भी न हो और प्रतिकूल भी न हो तब तो 'निजानन्द'
का भान शुरू हो जाता है। यह निजानन्द एक स्थिर चीज है।
हर्ष और शोक तो क्षण क्षण में बदलने वाले पदार्थ हैं। इन दोनों
हर्ष शोकों को तो मानस ही मान लेना ठीक है। क्योंकि मन भी
क्षणिक है। उसके परिवर्तन से ही हर्ष और शोक होते हैं। इतने
विवेचन से आकाश में आनन्द होने की बात मन में बैठ गयी
होगी। सत्ता और भान को तो सभी मानते हैं, इस कारण उसका
वर्णन हम नहीं करेंगे। वायु से लेकर देहपर्यन्त पदार्थों में भी
यह बात समझ लेना। गति और स्पर्श वायु के,दाह और प्रकाश
अग्नि के, द्रवता जल का, और कठिनता भूमि का अपना निजी
आकार है। इन सब के नाम तो अवश्य अनेक या विभिन्न हो रहे
हैं, परन्तु इनमें सच्चिदानन्द तो एक रूप से ही रहते हैं। इनमें
जो अलग अलग नाम और रूप [आकार] हैं वे निस्तत्त्व हैं। क्यों-
कि इनके जन्म और नाश बराबर होते रहते हैं। अपने संस्कारी
मन की सहायता से इन नामरूपों को समुद्र के बुलबुले की तरह
समझा करो। ज्यों ही कोई अधिकारी इस सर्वत्र परिपूर्ण सच्चिदा-
नन्द ब्रह्म को [ चाम की आँखों से नहीं अपितु ] बुद्धियोग से
देख लेगा तब वह धीरे धीरे इन नामरूपों की अवहेलना स्वयमेव
करने लगेगा। ज्यों ज्यों यह अवहेलना बढ़ने लगेगी त्यों त्यों ब्रह्म
के दर्शन होने लगेंगे। और ज्यों ज्यों ब्रह्म के दर्शन होंगे त्यों त्यों
नामरूप छूटने लगेंगे। इस ब्रह्माभ्यास [द्वैतावहेलना और ब्रह्म-
दर्शन] से जब अधिकारी की 'विद्या' स्थिर हो जायगी तब वह इस
जीवन के रहते ही मुक्त हो जायगा। फिर उसका शरीर प्रारब्धा-

ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप १२३
नुकूल कैसे भी रहा करो उसकी जीवन्मुक्ति को कोई रोक नहीं
सकेगा। उसी का चिंतन, उसी का कथन, उसी की बातचीत और
उसी में तत्पर हो जाना 'ब्रह्माभ्यास' कहा जाता है। ऐसा ब्रह्मा-
भ्यास जब दीर्घकाल तक निरन्तर तथा श्रद्धापूर्वक किया जायगा
तब अनादिकाल से हृदय में घुसी हुई वासनायें नष्ट हो जायँगी ।
मिट्टी की शक्ति घट शराव आदि अनेक मिथ्या पदार्थों को बना
देती है,इसी प्रकार ब्रह्मशक्ति भी अनेक अनृत पदार्थों को बना डालती
है। अथवा इसे यों समझना चाहिये कि जीव की निद्राशक्ति अनेक
दुर्घट सुपनों को घड़ डालती है, इसी प्रकार ब्रह्म की मायाशक्ति सृष्टि
आदि अनेक कार्यों का सर्जन कर लेती है। निद्रा से तो यहां तक हो
जाता है कि—कभीआकाश में उड़ान मारना दीखता है,कभी अपना
सिर कटने की बात दीखती है,कभी क्षणमात्र में सैकड़ों वर्ष बीत जाते
हैं,कभी मरे हुए पुत्रादि देखने मिल जाते हैं। उस सुपने में 'यह ठीक
है और यह ठीक नहीं' यह व्यवस्था नहीं की जा सकती। वहां तो जो
जैसा दीखे, वह वैसा ही ठीक होता है। ध्यान देने की बात है कि—
जब जीव की निद्राशक्ति की ऐसी अद्भुत महिमा है कि वह अपने में
तर्क शास्त्र को चलने नहीं देती है, तब फिर ब्रह्म की मायाशक्ति
की महिमा अचिन्त्य हो तो इसमें अचम्भा क्यों करते हो ? पुरुष
सोया पड़ा होता है उधर निद्राशक्ति अपना काम जारी रखती है—
वह अनेक प्रकार के सुपनों को बना बना कर तैयार करती रहती
है उससे पूछती तक नहीं कि क्या मैं यह सब कर डालूँ ? ठीक
इसी प्रकार ब्रह्मदेव निर्विकार भाव से विराज रहे हैं, यह श्रीमती
माया शक्ति अनेक आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ब्रह्माण्डलोक,
प्राणी और पर्वत समुद्र आदि को घड़ घड़ कर खड़ा करती जाती
है। यों तो ये सभी विकार मायाशक्ति ने उत्पन्न किये हैं,परन्तु प्राणियों

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में इतनी विशेषता होती है कि उनमें चैतन्य की छाया प्रतिबिम्बित
हो गयी है और वे चेतन हो गये हैं, जिन में चैतन्य का प्रतिबिम्ब
नहीं पड़ संका वे जड रह गये हैं । क्या चेतन और क्या अचेतन
सभी में ब्रह्म का सच्चिदानन्द रूप समान ही होता है । भेद केवल
इतनाही होता है कि उनके नाम और रूप (शकल) अलग अलग हो
गये हैं। ये नाम रूप ब्रह्म में ऐसे हैं जैसे कपड़े पर कोई चित्र बना
दिया गया हो। जब कोई उन नामरूपों की अपेक्षा कर सके तभी
उसे सच्चिदानन्द रूप ब्रह्म तत्व के दर्शन हों। पानी में अपना देह
अधोमुख दीख रहा हो तो उस देह को छोड़ कर अपने तीरस्थ देह
में ही ममता होती है, इसी प्रकार जगत् के दीखने वाले नामरूपों
का परित्याग कर देने पर सच्चिदानन्द में ही ज्ञानी की ममतां हो
जाती है। मनोराज्य हज़ारों होते रहते हैं तो भी जैसे उनकी सदा ही
उपेक्षा करदी जाती है इसी प्रकार विवेकी लोग हज़ारों प्रकार से दीख
पड़ने वाले नामरूपों की उपेक्षा करते रहते हैं । मनोराज्य जिस
प्रकार क्षण क्षण में बदलता जाता है, इसी प्रकार वह बाह्य व्यवहार
भी क्षण क्षण में बदलता है और जो बीत जाता है वह लौटकर कभी
भी नहीं आता। देखते हैं कि जवानी में बचपन ढूंढे भी हाथ नहीं
लगता, बुढ़ापे में जवानी की भी यही गति हो जाती है। मरा हुआ
पिता फिर देखने को नहीं मिलता । बीता हुआ दिन लौटकर नहीं
आता । जो लौकिक पदार्थ क्षणध्वंसी है उन में और मनोराज्य में
फ़र्क क्या है वही तो हमारी समझ में नहीं आता । इस लिये, हम तो
यही कहेंगे कि लौकिक पदार्थ भले ही भासा करें.उनके सत्य होने
का वृथा विचार सर्वथा छोड़ दो। जब लौकिक पदार्थों की उपेक्षा
कर दीजायगी तब ब्रह्मचिन्तन का कांटा जाता रहेगा । फिर तो वह
बुद्धि ब्रह्मचिन्तन में ही जुट जायगी। इस पर प्रश्न हो सकता है कि

ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप १२५
फिर ज्ञानी लोग व्यवहार कैसे करें ? इसका उत्तर यह है कि नाटक
करने वाले नट लोग जैसे बनावटी आस्था से अपना काम कर गुज़-
रते हैं, इसी प्रकार ज्ञानी लोग भी लौकिक कामों को बनावटी आस्था
से निभा लेजाते हैं । ऊपर पानी बहता रहता है परन्तु नीचे बैठी
हुई बड़ी शिला जैसे शान्त भाव से पड़ी रहती है इसी प्रकार नाम-
रूपी रूपी जल ऊपर बहता भी रहो परन्तु कूटस्थ ब्रह्मरूपी शिला
ज्यों की त्यों बनी रहती है । ज्ञानी लोग संसार के साथ वह नहीं
जाते । दर्पण के अन्दर कोई छेद नहीं होता, जिसमें कोई वस्तु
छिप रही हो परन्तु ऐसा मालूम हुआ करता है मानो दर्पण में अन-
गिनत वस्तु से परिपूर्ण बड़ा लम्बा चौड़ा आकाश ही हो । ठीक
इसी प्रकार नाना जगत् से परिपूर्ण यह आकाश उस सच्चिद्धन
अखण्ड ब्रह्मरूपी दर्पण में प्रतीत हो रहा है । पहले दर्पण दीख लेता
है तब उसके अन्दरकी वस्तु देखी जा सकती है । इसी प्रकार पहले
सच्चिदानन्द वस्तु दीख चुकती है उसके बाद नामरूपात्मक जगत्
का भास होता है । अब होशियार साधकों को चाहिये कि ज्यों ही
उन्हें सच्चिदानन्द वस्तु का भान हो चुके त्यों ही अपनी बुद्धि को
रोक कर खड़े होजांय और वार वार उसी का भान होते रहने दें ।
यदि उनकी मति आगे नामरूप की तरफ को चलने का प्रयत्न करती
हो तो उसे वैसा न करने दें । जानते हो ये साधक अब कहां पहुंच
चुके हैं ? इन्होंने कितना रास्ता तै कर लिया है ? सुनो ! ये लोग
चलते चलते जगत् से हीन सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्मधाम में खड़े
हुए हैं । इसी को तो 'अद्वैतानन्द' कहा जाता है । मुमुक्षु लोग इस
'अद्वैतानन्द' में चिरकाल तक विश्राम करें यही हमारी अभिलाषा है।
जगत् के मिथ्या भाव का चिन्तन करने से जो आनन्द जाग
उठता है वही 'अद्वैतानन्द' होता है ।