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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३३

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३३
इन्द्रियों तथा अन्तःकरण की वृत्तियों से जिस चैतन्य किंवा जिस
प्रज्ञान की सूचना जब-तब मननशील पुरुष को मिला करती है
उसी को हम 'प्रज्ञान' कह रहे हैं। ब्रह्मा इन्द्र देवता मनुष्य तथा
पशु पक्षियों तक में यही ऊपर कहा हुआ प्रज्ञान व्याप्त हो रहा
है। वेदादि सब इसी प्रज्ञान सूर्य की बिखरी हुई किरणें हैं। इसी
के सहारे से जगत् के जन्म स्थिति और प्रलय हो रहे हैं—इस
कारण कहना पड़ता है कि सर्वान्तर्यामी यह 'प्रज्ञान' ही ब्रह्मतत्व
है। क्योंकि सर्वत्र व्याप्त यह 'प्रज्ञान' ही ब्रह्म है, इसी से मैं मुमुक्षु
अब यह बात बेधड़क होकर कह सकता हूँ कि मुझ में जो 'प्रज्ञान'
है वह भी ब्रह्मतत्व ही है। आज से मैं इस महामहिम 'प्रज्ञान'
पर झूठा अहंकार ( क्षुद्र अहंकार ) करना छोड़ देता हूँ। इतना
जान चुकने पर भी यदि मैं इस सर्वत्र व्याप्त 'प्रज्ञान' पर क्षुद्र
अहंकार करूँगा तो मैं ब्रह्मद्रोही हो जाऊँगा। व्यापक ब्रह्म को
क्षुद्र अहम् में परिच्छिन्न करने का घोर पातक मुझे लगेगा।
अहं ब्रह्मास्मि
यों सिद्धान्तरूप से तो सभी देहों में वह परात्मतत्व परिपूर्ण
हो रहा है और सभी की बुद्धियों का साक्षी भी है। सभी प्राणी
अपने को सबसे बड़ा और सब से अधिक गुणी मान कर 'अहं
ब्रह्मास्मि' की रटन अज्ञानपूर्वक करते ही रहते हैं। परन्तु इतने मात्र
से साधक का कुछ भी उपकार नहीं हो पाता। जब तो किसी
साधक को उसके साथ ही यह स्फूर्ति [प्रतीति] भी हो जाय कि वह
सर्वत्र परिपूर्ण परात्मतत्व ही मेरी बुद्धि का साक्षी है, तो वैसे स्फूर्ति-
युक्त आत्मा के विषय में ही हम 'अहम्' [मैं] शब्द कह रहे हैं।
जब कोई साधक अपने ऊपर पड़ी हुई अविद्या की चादर को बार
बार उतार कर फेंकने लगता है, जब कोई साधक मांस के झोंपड़े

३४ पंचदशी
में से निकल कर बार बार बाहर बैठने लगता है, तब उस
साधक को ही हम अहम् ['मैं'] कहना चाहते हैं। देश काल
या वस्तु के परिच्छेद में न आने वाली स्वभाव से ही परिपूर्ण जो
वस्तु है वह 'ब्रह्म' कही जाती है। इस 'मैं' को और उस 'ब्रह्म'
को परस्पर एक बता देना 'अस्मि' इस तीसरे पद का काम है।
जिसका भाव यही होता है कि मैं (साधक) ब्रह्मतत्व ही हूँ अथवा
मैं साधक ही तो ब्रह्म हूँ। अविद्या के प्रताप से जो मैं अपने आप
को संसारी आदि मान बैठा था वह कुछ भी मैं नहीं हूँ। देहेन्द्रि-
यादि की क्षुद्र और संकीर्ण दृष्टि में उलझा रह जाने वाला,
देहेन्द्रियादि के साथ जल मरने वाला क्षुद्र प्राणी मैं कदापि नहीं
हूँ। अथवा अविद्या के प्रताप से जो मैं ब्रह्मतत्व को अपने से
पृथक्—सातवें आसमान पर रहने वाला—तत्त्व मान बैठा था
वह ब्रह्मतत्व मुझ से पृथक् पदार्थ नहीं है।
तत्त्वमसि
जो अभी तक वृथा ही [नामालूम क्यों] शरीरों के वेष्टनों से
लिपटा पड़ा था, जो शरीरों के साथ वृथा ही बार बार मर और
जी रहा था, श्रवणादि का अनुष्ठान करके महावाक्य के समझने
की योग्यता अब जिसमें आ गयी है, जो तीनों देहों से अलग
रहने लगा है, जो तीनों देहों के साक्षी की हैसियत में आ गया
है, उसी को हम लक्षणावृत्ति से 'त्वं' अर्थात् 'तू' कह रहे हैं। सृष्टि
बनने से पहले सम्पूर्ण भेदों से रहित जो एक नामरूप रहित
वस्तु थी, सृष्टि बन जाने के बाद अब भी जो वस्तु वैसी की वैसी
ही है, जिस सद्वस्तु में अब भी कोई विकार नहीं आया है, उसी
निर्विकार सद्वस्तु को हम लक्षणावृत्ति से 'तत्' अर्थात् 'वह' कह
रहे हैं। इन दोनों शब्दों के लक्ष्यार्थों की जो छिपी हुई एकता है