पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
गन्धर्वानन्द आशास्ति राज्ञो, नास्ति विवेकिनः ॥२७॥
५५६ पञ्चदशी
हो ही जायँगे' इस विचार के आने पर तो राजा को बड़ा ही
भय होता रहता है ।
नोभयं श्रोत्रियस्यात स्तदानन्दोऽधिकोऽन्यतः ।
गन्धर्वानन्द आशास्ति राज्ञो, नास्ति विवेकिनः ॥२७॥
श्रोत्रिय को तो ये दोनों ही नहीं होते—न तो उसे साधन
संचय करने का दुःख ही होता है और न आगामी में उनके
नाश होने का डर ही रहता है। इस कारण श्रोत्रिय का आनन्द
सार्वभौम राजा से अधिक होता है । [श्रोत्रिय में एक और
भी अधिकता होती है कि] राजा तो अपने से ऊपरले गन्धर्वा-
नन्द के पाने की आशा किया करता है । विवेकी को तो ऐसी
कोई भी दुराशा नहीं होती ।
अस्मिन् कल्पे मनुष्यः सन् पुण्यपाकविशेषतः ।
गन्धर्वत्वं समापन्नो मर्त्यगन्धर्व उच्यते ॥२८॥
इस कल्प में पहले मनुष्य था, किन्तु किसी पुण्य के फल
से उसे गन्धर्वभाव मिल गया तो उसको 'मर्त्यगन्धर्व'कहते हैं ।
पूर्वकल्पे कृतात् पुण्यात् कल्पादावेव चेद् भवेत् ।
गन्धर्वत्वं तादृशोऽत्र देवगन्धर्व उच्यते ॥२९॥
पूर्व कल्प में किये हुए पुण्यों से कल्प के प्रारम्भ में ही
जो गन्धर्व बन जाते हैं उनको 'देवगन्धर्व' कहा जाता है।
अग्निष्वात्तादयो लोके पितरश्चिरवासिनः ।
कल्पादावेव देवत्वं गता आजानदेवताः ॥३०॥
अस्मिन् कल्पेऽश्वमेधादि कर्म कृत्वा महत्पदम् ।
अवाप्याजानदेवैर्याः पूज्यास्ताः कर्मदेवताः ॥३१॥
'अग्निष्वात्ता' आदि को लोक में 'चिरवासी पितर' माना