पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् २९९
तृप्तिदीपप्रकरणम् २९९
सत्य ज्ञान आनन्द रूप जो महान् तत्व, जाग्रदादि प्रपंच
को प्रकाशित किया करता है, वही ब्रह्मनामक तत्व मैं हूँ।
[जन्म, जरा, मृत्यु आदि के बस में आने वाला क्षुद्र प्राणी मैं
नहीं हूँ]। श्रुति और अनुभव के कहने से, जब कोई, इस बात
को जान या मान लेता है तब फिर वह [कर्ता भोक्ता आदि]
सभी बन्धनों से पूर्ण रूप से छुट जाता है।
एक एवात्मा मन्तव्यो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ।
स्थानत्रयव्यतीतस्य पुनर्जन्म न विद्यते ॥२१४॥
जाग्रत् स्वप्न या सुषुप्ति तीनों में एक ही आत्मतत्व है,
ऐसा जान लेना चाहिये। जब किसी का आत्मा, ज्ञान के प्रताप
से इन तीनों अवस्थाओं से ऊपर उठ जाता है, तब फिर उसका
पुनर्जन्म कभी भी नहीं हो पाता। [इस शरीर के गिर जाने
पर उसे दूसरा शरीर नहीं मिलता।]
त्रिषु धामसु यद् भोग्यं भोक्ता भोगश्च यद् भवेत् ।
तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः ॥२१५॥
जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति नाम के तीनों धामों में, जो तीन तरह
के [स्थूल सूक्ष्म तथा आनन्दरूपी] भोग्य हैं, जो तीन तरह
के [विश्व तैजस तथा प्राज्ञ नाम के] भोक्ता हैं, तथा इनमें जो
नानाविध भोग [अनुभव] होता है, इन सभी से विलक्षण
जो एक चिन्मात्र रूप सदा कल्याणस्वरूप साक्षी परमात्मा
है, वही तो मैं हूँ।
एवं विवेचिते तत्वे विज्ञानमयशब्दितः ।
चिदाभासो विकारी यो भोक्तृत्वं तस्य शिष्यते ॥२१६॥
·इस प्रकार आत्मतत्व की विवेचना कर चुकने के बाद
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[जब कि उसको असंग जान लिया जाता है तब] विकारी
होने के कारण विज्ञानमय कहानेवाला जो चिदाभास है वह ही
भोक्ता रह जाता है ।
मायिकोयं चिदाभासः श्रुतेरनुभवादपि ।
इन्द्रजालं जगत् प्रोक्तं तदन्तःपात्ययं यतः ॥२१७॥
श्रुति और अनुभव इन दोनों का कहना मानें तो यह चिदा-
भास तो मायिक [किंवा मिथ्या] है । विद्वान् लोग तो इस
सभी जगत् को इन्द्रजाल की तरह मिथ्या मानते हैं । वे कहते
हैं कि—क्योंकि यह चिदाभास भी उस जगत् के अन्तर्भूत ही
है, इस कारण यह भी मिथ्या ही है ।
बिलयोप्यस्य सुप्त्यादौ साक्षिणा ह्यनुभूयते ।
एतादृशं स्वस्वभावं विविनक्ति पुनः पुनः ॥२१८॥
सुषुप्ति या मूर्छा जब आजाती है, तब यह साक्षी [आत्मा]
इस चिदाभास के विलय किंवा नाश को अनुभव किया करता
है । यों कूटस्थ से अलगाये हुए चिदाभास को मायिक समझ
लेने पर यह होता है कि यह चिदाभास अपने ऐसे मिथ्या
स्वभाव का स्वयं ही बार बार विवेक करने लगता है । [यह
अपनी कमी को—अपने नश्वरपने को पहचान कर अपने मन में
इस बात को अनन्त बार दोहराता है, उसको इस जगद्व्यवहार
को देख कर हँसी और आश्चर्य दोनों होते हैं] ।
विविच्य नाशं निश्चित्य पुनर्भोगं न वाञ्छति ।
मुमूर्षुः शायितो भूमौ विवाहं कोऽभिवाञ्छति ॥२१९॥
विवेक करते करते, अपने नाश का निश्चय जब कर लेता
है, तब वह भोगों की इच्छा करना ही छोड़ बैठता है । क्या
भला जिस मुमूर्षु को खाट से भूमि पर उतार लिया गया हो
वह कभी भी अपना विवाह कराना चाहेगा ?
जिहेति व्यवहर्तुं च भोक्ताहमिति पूर्ववत् ।
छिन्ननास इव हीतः क्लिश्यन्नारब्धमश्नुते ॥२२०॥
उसकी कुछ ऐसी विचित्र अवस्था हो जाती है कि-यह तो
अब पहले की तरह, अपने को भोक्ता कहता हुआ भी शरमाता
है। 'अभी तक मेरे प्रारब्ध कर्म समाप्त नहीं हुए' इस दुःख
को लिये हुए ही, नाक कटे आदमी के समान लज्जित रह कर
अपने प्रारब्ध को भोगा करता है।
यदा स्वस्यापि भोक्तृत्वं मन्तुं जिह्वेत्ययं तदा ।
साक्षिण्यारोपयेदेतदिति कैव कथा वृथा ॥२२१॥
यह चिदाभास जब अपने आपको भी भोक्ता मानता हुआ
शरमाने लगता है तब यह बिचारा अपने भोक्तापने के दोष को
साक्षी पर लादेगा, ऐसी वृथा शंका तो करनी ही नहीं चाहिए।
इत्यभिप्रेत्य भोक्तार माक्षिपत्यविशङ्कया ।
कस्य कामायेति ततः शरीरानुज्वरो न हि ॥२२२॥
[कूटस्थ या चिदाभास कोई भी पारमार्थिक भोक्ता नहीं
है] इसी अभिप्राय को लेकर 'कस्य कामाय' इस श्रुति ने निःशंक
होकर भोक्ता का निषेध कर दिया है। ऐसा हो जाने पर फिर
उसे इस शरीर के साथ कभी भी सन्तप्त होना नहीं पड़ता ।
[ऐसा ज्ञानी जब ज्वर से पीड़ित होता है तब उसका विश्लेषण यों
करना चाहिए कि-उसके शरीर को ज्वर आता है, वह तटस्थ
होकर उस ज्वरित शरीर को देखा करता है। उस दुःखी शरीर
के साथ वह दुःखी कभी नहीं होता । कैसा भी कष्ट आ पड़ने
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पर वह अपनी तटस्थता को टूटने नहीं देता । यह तटस्थता
ही ज्ञानियों का गुप्त धन माना जाता है ] ।
स्थूलं सूक्ष्मं कारणं च शरीरं त्रिविधं स्मृतम् ।
अवशं त्रिविधोऽस्त्येव तत्र तत्रोचितो ज्वरः ॥२२३॥
स्थूल सूक्ष्म और कारण तीन प्रकार का शरीर होता है।
उन उन शरीरों में तीनों तरह का संताप भी हुआ ही करता
है। [उसमें किसी का बस नहीं है कि उस सन्ताप को हटा सके।]
वातपित्तश्लेष्मजन्यव्याधयः कोटिशस्तनौ ।
दुर्गन्धित्वकुरूपत्वदाहभङ्गादयस्तथा ॥२२४॥
इस स्थूल शरीर में वात, पित्त, कफ से उत्पन्न होने वाली,
अनन्त बीमारियां, दुर्गन्धि किंवा कुरूप होना, जल जाना, या
चोट लग जाना, आदि अनेक ज्वर [उपद्रव] रहते ही हैं।
कामक्रोधादयः शान्तिदान्त्याद्या लिङ्गदेहगाः
ज्वरा, द्वयेऽपि बाधन्ते प्राप्त्याप्राप्त्या नरं क्रमात्॥२२५॥
काम क्रोधादि तथा शान्ति दान्ति आदि लिङ्ग शरीर के
ज्वर हैं। जब काम क्रोधादि आते हैं तब वे सूक्ष्म शरीर को
दुःखी करते हैं तथा जब शान्ति आदि नहीं आते तब भी लिङ्ग
देह दुःखी होता है। यों ये दोनों, क्रम से पाने और न पाने से
दुःखी किया करते हैं।
स्वं परं च न वेत्त्यात्मा विनष्ट इव कारणे ।
आगामिदुःखबीजं चेत्येतदिन्द्रेण दर्शितम् ॥२२६॥
‘नहि खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति, नो एवेमानि
भूतानि,विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्रभोग्यं पश्यामि’ (छा० ८-११-२)
इस श्रुति में इन्द्र ने अपने प्रजापति गुरु से यह कहा है कि—