पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
तृप्तिदीपप्रकरणम् २१७
तृप्तिदीपप्रकरणम् २१७
जिस प्रकार वैदिक लोग, स्वर्ग आदि की इच्छा को लेकर
उसके साधन जप याग या उपासना आदि को श्रद्धापूर्वक किया
करते हैं, इसी प्रकार मुमुक्षु लोग भी, केवल मोक्ष की अभि-
लाषा को लेकर, अपने आत्मा पर ही विश्वास करें [विषयों पर
श्रद्धा करना छोड़ दें]।
चित्तैकाग्र्यं यथा योगी महायासेन साधयेत् ।
अणिमादिप्रेप्सयैवं विविच्यात् स्वं मुमुक्षया ॥२०८॥
जिस प्रकार योगी लोग, अणिमा आदि ऐश्वर्य पाने के
लिए, बड़े भारी प्रयत्न से चित्त को एकाग्र किया करते हैं, इसी
प्रकार प्रत्येक समझदार आदमी मोक्ष की इच्छा को लेकर,
सदा ही अपने आत्मा का विवेक किया करे [इस अपने आत्मा
को देहादियों से पृथक् पहचान ले। इसको देहादियों में रिला
मिला न रहने दे]।
कौशलानि विवर्धन्ते तेषामभ्यासपाटवात् ।
यथा तद्वद्विवेकोऽस्याप्यभ्यासाद् विशदायते ॥२०९॥
अभ्यास की पटुता से जैसे इन काव्यादि का अभ्यास
करने वाले लोगों की चतुरता उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है, इसी
प्रकार अभ्यास करते करते इस मुमुक्षु का विवेक [देहादियों से
आत्मा का भेदज्ञान] भी निखरने लगता है।
विविञ्चता भोक्तृतत्त्वं जाग्रदादिष्वसंगता ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां साक्षिण्यध्यवसीयते ॥२१०॥
अन्वयव्यतिरेक नाम की युक्ति के सहारे से, जब कोई
पुरुष भोक्ता के पारमार्थिक स्वरूप को, भोग्य पदार्थों से पृथक्
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पहचान लेता है, तब फिर उस पुरुष को जाग्रदादि सभी अव-
स्थाओं में साक्षी तत्व के असंगपने का निश्चय हो जाता है।
यत्र यद् दृश्यते द्रष्ट्रा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु ।
तत्रैव तन्नेतरत्रेत्यनुभूतिर्हि संमता ॥२११॥
यह द्रष्टा, जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्ति में क्रम से जिन [स्थूल
सूक्ष्म और आनन्द नाम के] भोग्यों को अनुभव किया करता
है, वे भोग्य पदार्थ केवल उन ही अवस्थाओं में हुआ करते हैं।
[दूसरी अवस्थाओं के आजाने पर वे भोग्य पदार्थ नहीं रहते]
परन्तु इन तीनों अवस्थाओं में अनुगत रहने वाला जो इनका
द्रष्टा है, वह तो इन सब से पृथक् ही है यह अनुभव तो सभी
को सम्मत है।
स यत्तत्रेक्षते किंचित्तेनानन्वागतो भवेत् ।
दृष्ट्वैव पुण्यं पापं चेत्येवं श्रुतिषु डिण्डिमः ॥२१२॥
‘स यत्तत्र किंचित् पश्यति अनन्वागतस्तेन भवति, असंगोह्ययं पुरुषः
सवाएष एतस्मिन् संप्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं पापं च पुनः प्रति-
न्यायं प्रतियोन्याद्रवति’ (वृ० ४-३-१५) इस श्रुति में डंके की चोट
कहा गया है कि—वह आत्मा उस अवस्था में, जिस किसी
भी भोग्य को देखता है, उसके साथ अनुगत नहीं होता—किंवा
उससे सम्बद्ध नहीं हो जाता [किन्तु वह वहां के दृश्यों को वहीं
छोड़ कर, अकेला ही दूसरी अवस्था में पहुँचता है। वह वहां
के पुण्य पाप किंवा सुख दुःखों को देखकर ही चला जाता है।
उन्हें अपने साथ नहीं ले जाता।]
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादि प्रपंचं यत् प्रकाशते ।
तद् ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्वबन्धैः प्रमुच्यते ॥२१३॥