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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ८९

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ८९
कोशोपाधिविवक्षायां याति ब्रह्मैव जीवताम् ।
पिता पितामहश्चैकः पुत्रपौत्रौ यथा प्रति ॥४१॥
कोश रूपी उपाधि की पर्यालोचना जब की जाती है, तब
सत्यादिलक्षण 'ब्रह्म' ही 'जीव' बन जाता है । जैसे कि एक
ही देवदत्त एक ही समय पुत्र के प्रति तो पिता तथा पौत्र के
प्रति पितामह हो जाता है [ इसी प्रकार ब्रह्म भी कोशरूपी
उपाधि की विवक्षा में तो 'जीव' होजाता है तथा उसी समय
शक्तिरूपी उपाधि की विवक्षा में 'ईश्वर' बन जाता है ] ।
पुत्रादेरविवक्षायां न पिता न पितामहः ।
तद्वन्नेशो नापि जीवः शक्तिकोशाविवक्षणे ॥४२॥
पुत्रादि की जब विवक्षा नहीं रहती, तब न तो यह देवदत्त
पिता ही होता है और न पितामह ही कहाता है । ठीक इसी
प्रकार जब शक्ति और कोश की विवक्षा किसी चतुर साधक
को नहीं रह जाती [ जब वह इन उपाधियों की ओर को दृष्टि
ही नहीं डालता ] तब वह ब्रह्म, 'ईश्वर' या 'जीव' कुछ भी
नहीं रहता ।
य एवं ब्रह्म वेदैष ब्रह्मैव भवति स्वयम् ।
ब्रह्मणो नास्ति जन्मातः पुनरेष न जायते ॥४३॥
जो ब्रह्म को इस तरह जान लेता है वह स्वयं ब्रह्म ही
हो जाता है । ब्रह्म का जन्म नहीं होता इससे फिर वह भी
उत्पन्न नहीं होता । चारों साधनों से युक्त जो कोई महा-
पुरुष इस प्रकार पांचों कोशों का विवेक करलेने के पश्चात्
सत्यादिस्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है, वह स्वयं ब्रह्म
ही हो जाता है । 'स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'(मु० ३-
६

९० पञ्चदशी
२–९) ब्रह्मविदाप्नोति परम् (तै० २–१) ये श्रुतियां भी इसी
अर्थ को कह रही हैं। 'न जायते म्रियते वा विपश्चित्' (कां० १–
२–१८) यह श्रुति कह रही है कि ब्रह्म का जन्म नहीं होता।
यही कारण है कि विद्वान् पुरुष भी अपने आत्मा को ब्रह्मरूप
समझ लेने से फिर कभी जन्मता नहीं। यही बात 'न स पुनरा-
वर्तते' (छा० ८–१५–१) इस श्रुति ने भी कही है।
इति श्री मद्विद्यारण्यमुनिविरचितं पंचकोशविवेकप्रकरणं समाप्तम्।