सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

चित्रदीपप्रकरणम् १७१

चित्रदीपप्रकरणम् १७१
प्रारम्भ करते हैं तो कुछ कक्षा चलने पर, उनके सामने अज्ञान
दीखने लगता है। [वाद कथा की दो तीन श्रेणी चल चुकने पर
अन्त में उन्हें अज्ञान की शरण लेनी पड़ जाती है। उन्हें कहना
पड़ जाता है 'यह तो हमें मालूम ही नहीं है कि ऐसा क्यों होता
है' इत्यादि ।]
देहेन्द्रियादयो भावा वीर्येणोत्पादिताः कथम् ।
कथं वा तत्र चैतन्य मित्यक्ते ते किमुत्तरम् ॥१४४॥
देखो इस संसार का निरूपण यों नहीं हो सकता—कि वीर्य
[जैसी द्रव तथा एक वस्तु] से देह इन्द्रिय आदि नाना पदार्थ
क्योंकर उत्पन्न हो जाते हैं ? तथा इन देह इन्द्रिय आदि में
चेतनता क्योंकर आ जाती हैं ? इन प्रश्नों का तुम्हारे पास क्या
समाधान है ?
वीर्यस्यैष स्वभावश्चेत् कथं तद् विदितं त्वया ।
अन्वयव्यतिरेकौ यौ भग्नौ तौ वन्ध्यवीर्यतः ॥१४५॥
यदि वीर्य का यह सब स्वभाव ही मानो तो बताओ कि उसे
तुमने कैसे पहचाना ? यदि कहो कि अन्वय व्यतिरेक से यह
सब पहचानता हूँ तो तुम्हारे वे अन्वय व्यतिरेक तो बन्ध्यवीर्य
से भग्न हो चुके हैं [ वन्ध्या स्त्री में जो वीर्य पड़ता है या जो वीर्य
स्वयं ही वन्ध्य होता है, वह व्यर्थ हो जाता है । जहां जहां वीर्य
हो वहां वहां देहादि हों ऐसा नहीं होता । ]
न जानामि किमप्येतदित्यन्ते शरणं तव ।
अत एव महान्तोऽस्य प्रवदन्तीन्द्रजालताम् ॥१४६॥
यों बार बार पूछते जाने पर अन्त में तुम्हें यही कहना पड़

जायगा कि यह तो मुझे कुछ भी मालूम नहीं है। यही कारण
है कि महापुरुष इसको [पहली बार ही] इन्द्रजाल कह देते हैं।
एतस्मात् किमिवेन्द्रजालमपरं यद् गर्भवासस्थितं ।
रेतश्चेतति हस्तमस्तकपदप्रोग्भूतनानाङ्कुरम् ।
पर्यायेण शिशुत्व-यौवन-जरोवैपैरनेकैर्वृतं ।
पश्यत्यत्तिशृणोतिजिघ्रति तथा गच्छत्यथागच्छति।१४७
गर्भपात्र में पड़ा हुआ वीर्य, चेतन होजाता है। उसमें हाथ,
मस्तक, पैर आदि नाना अङ्कुर फूट आते हैं। वह फिर क्रम से कभी
बालपन, कभी यौवन, तथा कभी वार्धक्य नाम के अनेक वेषों
को ओढ़ा करता है और देखता, खाता, सुनता, सूंघता, तथा आने
जाने लगता है। बताओ तो इससे बड़ा इन्द्रजाल और क्या होगा ?
देहवद् वटधानादौ सुविचार्य विलोक्यताम् ।
क्व धाना कुत्र वा वृक्षस्तस्मान्मायेति निश्चिनु ॥१४८॥
देह के समान ही बढ़ आदि वृक्षों के क्षुद्र बीजों पर भी
भले प्रकार विचार कर देख लो कि—कहां तो वह विचारा क्षुद्र
सा बीज और कहां वह विशाल वृक्ष ? यह सब देखकर निश्चय
कर लो कि यह सब माया ही तो है।
निरुक्तावभिमानं ये दधते तार्किकादयः ।
हर्षमिश्रादिभिस्ते तु खण्डनादौ सुशिक्षिताः ॥१४९॥
तुम्हें ही नहीं और भी जो बड़े बड़े तार्किक इस संसार की
निरुक्ति का दम भरते हैं, खण्डन आदि ग्रन्थों में हर्षमिश्र आदि
ने उनकी खूब खबर ली है [ उनके उस अभिमान को प्रबल
युक्तियों से चूर्ण चूर्ण कर दिया है।]

अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्।
अचिन्त्यरचनारूपं मनसापि जगत् खलु ॥१५०॥
जो भाव अचिन्त्य हैं, उन्हें तर्क की कसौटी पर कभी न
कसना चाहिये। क्योंकि इस जगत् की रचना तो ऐसी हैं कि मन
से भी उसका चिन्तन नहीं हो सकता।
अचिन्त्यरचनाशक्तिर्बीजं मायेति निश्चिनु ।
मायाबीजं तदेकैकं सुषुप्तावनुभूयते ॥ १५१ ॥
जिस कारण में अचिन्त्य रचनाशक्ति भरी हुई है, जिस
कारण की रचनाशक्ति का विचार भी नहीं कर सकते हैं, उसे ही
'माया' समझ लेना चाहिये। सुषुप्ति के समय उसी एक माया
रूपी कारण का अनुभव प्रत्येक को हुआ करता है।
जाग्रत्स्वप्नजगत् तत्र लीनं बीज इव द्रुमः ।
तस्मादशेषजगतो वासना स्तत्र संस्थिताः ॥१५२॥
छोटे से बीज में जैसे बड़े बड़े पेड़ छिपे रहते हैं, इसी प्रकार
इस माया बीज में जाग्रत तथा स्वप्न नाम का जगत् छिपा रहता
है। जगत् का कारण होने से इस सम्पूर्ण जगत् की वासनायें
उसी माया में छिपी बैठी रहती हैं।
या बुद्धिवासनास्तासु चैतन्यं प्रतिबिम्बति ।
मेघाकाशवदस्पष्टचिदाभासोऽनुमीयताम् ॥१५३॥
उस माया में जो बुद्धि की वासनायें छिपी पड़ी हैं, उनमें
चैतन्य का प्रतिबिम्ब पड़ता रहता है। मेघाकाश के समान उन
[ बुद्धियों ] में जो अस्पष्ट चिदाभास पड़ रहा है, उसका अनु-
मान करलो [ क्योंकि वह किसी के अनुभव में नहीं आता है
इस कारण अनुमान से ही उसे जानते हैं।]

१७४ पञ्चदशी
साभासमेव तद् बीजं धीरूपेण प्ररोहति ।
अतो बुद्धौ चिदाभासो विस्पष्टं प्रतिभासते ॥१५४॥
चिदाभास से युक्त वह बीज [ अज्ञान ] ही बुद्धिरूप से
परिणत हो जाता है इस कारण तब तो वह चिदाभास बुद्धि में स्पष्ट
ही प्रतीत होने लगता है । [ तात्पर्य यह कि चिदाभासयुक्त
वह अज्ञान, जब बुद्धिरूप को धारण कर लेता है तब तो उसमें
स्पष्ट ही चिदाभास दीखने लगता है,परन्तु बुद्धि की वासनाओं
में चिदाभास प्रतीत नहीं होता है । ]
मायाभासेन जीवेशौ करोतीति श्रुतौ श्रुतम् ।
मेघाकाशजलाकाशाविव तौ सुव्यवस्थितौ ॥१५५॥
वह माया आभास के द्वारा जीव और ईश्वर को बना देती
है यह श्रुति में कहा गया है । वे जीव और ईश्वर, मेघाकाश
तथा जलाकाश के समान पृथक् पृथक् व्यवस्थित हो जाते हैं
[ ऐसी अवस्था में यद्यपि जीव और ईश्वर दोनों मायिक हैं,
परन्तु अस्पष्ट और स्पष्ट उपाधि वाला होने से, क्रम से मेघाकाश
और जलाकाश के समान, इन दोनों का अवान्तर भेद सिद्ध हो
जाता है । ]
मेघवद् वर्तते माया मेघस्थिततुषारवत् ।
धीवासनाश्चिदाभासस्तुषारस्थखवत् स्थितः ॥१५६॥
माया तो मेघ के समान है । मेघ में जो तुषार होते हैं बुद्धि-
वासनायें उनके समान होती हैं । उन तुषारों में जो आकाश
होता है उसके समान वह चिदाभास है ।
मायाधीनश्चिदाभासः श्रुतो मायी महेश्वरः ।
अन्तर्यामी च सर्वज्ञो जगद्योनिः स एव हि ॥१५७॥

चिदाभास तो माया के अधीन होता है। महेश्वर को श्रुतियों
में मायी अर्थात् माया का स्वामी कहा है। वह महेश्वर ही अन्त-
र्यामी है, वही सर्वज्ञ है, तथा वही इस जगत् का मूल कारण भी है।
सौषुप्तमानन्दमयं प्रक्रम्यैवं श्रुतिर्जगौ ।
एष सर्वेश्वर इति सोयं वेदोक्त ईश्वरः ॥१५८॥
सुषुप्ति के समय, अपने शुद्धरूप में प्रकट होनेवाले, आनन्द
मय के विषय में सुषुप्तस्थाने एकीभूतः प्रज्ञानघनः मा. ५ इत्यादि श्रुति
ने कहा है कि यही 'सर्वेश्वर' है। यों यह कहा जा सकता है
कि बुद्धिवासनाओं में प्रतिबिम्ब रूप यह आनन्दमय ही वेदोक्त
ईश्वर तत्व है।
सर्वज्ञत्वादिके तस्य नैव विप्रतिपद्यताम् ।
श्रौतार्थस्यावितर्क्यत्वान्मायायां सर्वसंभवात् ॥१५९॥
इस आनन्दमय की सर्वज्ञता आदि [ यद्यपि अनुभव में
आने वाली बात नहीं है, तो भी उस ] में शंका नहीं करनी
चाहिये। क्योंकि श्रुति का बताया हुआ पदार्थ अवितर्क्य होता
है। इसके अतिरिक्त माया में तो इतना सामर्थ्य है ही कि
उसमें सब कुछ संभव हो जाता है।
अयं यत् सृजते विश्वं तदन्यथयितुं पुमान् ।
न कोपि शक्तस्तेनायं 'सर्वेश्वर' इतीरितः ॥१६०॥
देखो यह 'आनन्दमय' जिस [ मानस सृष्टि किंवा जिस
जाग्रदादि] जगत् को उत्पन्न कर लेता है, उसको कोई भी पुरुष
अन्यथा नहीं कर सकता। यही कारण है कि उसको 'सर्वे-
श्वर' कहा गया है। [उस आनन्दमय की सर्वेश्वरता का यही
अभिप्राय समझना चाहिये।]

Here is the accurate transcription of the text in Devanagari with line markers:

१७६ पञ्चदशी
अशेषप्राणिबुद्धीनां वासनास्तत्र संस्थिताः ।
ताभिः क्रोडीकृतं सर्वं तेन सर्वज्ञ ईरितः ॥१६१॥
सुषुप्ति काल के उस अज्ञान में [ जो कि सब का कारण
है ] सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों की वासनायें निवास किये
रहती हैं। उन सूक्ष्म वासनाओं ने इस सब जगत् को ही अपना
विषय बना रक्खा है, इस कारण से उसको सर्वज्ञ कह दिया
जाता है । [तात्पर्य यह है,कि सम्पूर्ण बुद्धियों की वासना वाला
अज्ञान उस आनन्दमय की उपाधि है इसी से उसको सर्वज्ञ
कहते हैं। ऐसा सर्वज्ञ यदि उसको समझें तो फिर उसकी सर्व-
ज्ञता पर आक्षेप करने की कोई बात ही नहीं रह जाती । ]
वासनानां परोक्षत्वात् सर्वज्ञत्वं न हीक्ष्यते ।
सर्वबुद्धिषु तद् दृष्ट्वा वासनास्वनुमीयताम् ॥१६२॥
उसकी उपाधि रूपी जो वासनायें हैं, वे तो सदा परोक्ष ही
रहती हैं। इसी कारण उसकी सर्वज्ञता का अनुभव किसी को
भी नहीं होता । परन्तु सम्पूर्ण बुद्धियों [ को मिला कर फिर
उन] में सर्वज्ञता को देखकर, वासनाओं में भी सर्वज्ञता को अनु-
मान से ही जान लेना चाहिये ।
विज्ञानमयमुख्येषु कोशेष्वन्यत्र चैव हि ।
अन्तस्तिष्ठन् यमयति तेनान्तर्यामितां व्रजेत् ॥१६३॥
विज्ञानमय आदि कोशों के तथा पृथिव्यादि भूतों के अन्दर
बैठकर, इन सब को नियम में रखता रहता है, इसी से उसको
'अन्तर्यामी' [अन्दर रहकर नियमन करने वाला] कहा जाता है।
यही अन्तर्यामी प्राणियों के पूर्व कर्मों के अनुसार चोर से,