पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
[Header] द्वैतविवेकप्रकरणम् ९७
[Header] द्वैतविवेकप्रकरणम् ९७
ज्ञानों से और अपने कर्मों से जीव ने इन को अपना अन्न बना
लिया है।
ईशकार्यं जीवभोग्यं जगद् द्वाभ्यां समन्वितम् ।
पितृजन्या भर्तृभोग्या यथा योषित् तथेष्यताम् ॥१८॥
[ समानरूप में वर्णन किया हुआ ] जगत् ईश्वर का
उत्पन्न किया हुआ है और जीव का भोग्य है । यों यह जगत्
ईश्वर और जीव दो से सम्बद्ध है । एक तो इस जगत् का
बनाने वाला है और दूसरा इसको भोगने वाला है [ एक चीज़
दो से सम्बद्ध रहती है इसके लिये दृष्टान्त यह है कि ] जैसे
स्त्री अपने पिता से तो उत्पन्न होती है और पति की भोग्य
होती है । इसी तरह इस जगत् को भी दो से सम्बद्ध समझ
लेना चाहिये ।
मायावृत्त्यात्मको हीशसंकल्पः साधनं जनौ ।
मनोवृत्त्यात्मको जीवसंकल्पो भोगसाधनम् ॥१९॥
जब ईश्वर मायावृत्त्यात्मक संकल्प करता है, तब तो यह
जगत् उत्पन्न हुआ करता है । जब यह जीव मनोवृत्ति नाम
का संकल्प करता है, तब यह जगत् उस का भोग्य बन जाता
है [ यों ईश्वर और जीव के संकल्प से ही इस जगत् का
सर्जन और भोग होता है । अज्ञान से यह जगत् बनता है
और मन से यह जगत् भोगा जाता है ] ।
ईशनिर्मितमण्यादौ वस्तुन्येकविधे स्थिते ।
भोक्तृधीवृत्तिनानात्वात् तद्भोगो बहुधेष्यते ॥२०॥
हृष्यत्येको मणिं लब्ध्वा क्रुध्यत्यन्यो ह्यलाभतः ।
पश्यत्येव विरक्तोऽत्र न हृष्यति न कुप्यति ॥२१॥
९८ पञ्चदशी
[ईश्वर के बनाये हुए वस्तुस्वरूप से भिन्न भी कोई भोग्यत्व
आकार होता है इसे निश्चय करना हो तो यों समझना
चाहिये कि ] जभी तो ईश्वर की बनायी हुई मणि आदि वस्तु,
भले ही एक प्रकार की रहो, परन्तु भोक्ता लोगों की बुद्धि-
वृत्तियों के नाना प्रकार की होने पर, उस एक ही मणि का
नाना प्रकार का भोग होजाता है ॥२०॥ देखते हैं कि मणि का
लालची तो उसे पाकर हृष्ट होता है, दूसरे लालची को जब
वह मणि नहीं मिलती तब उसे क्रोध आता है, मणि के विषय
में जो लापरवाह है वह तीसरा उदास मनुष्य तो उस मणि
को देखता ही देखता है [ मणि मिलने से ] न उसे हर्ष होता
है और [ मणि के न मिलने से] उसे क्रोध भी नहीं आता है ।
प्रियोऽप्रिय उपेक्ष्यश्चेत्याकारा मणिगास्त्रयः ।
सृष्टा जीवै रीशसृष्टं रूपं साधारणं त्रिषु ॥२२॥
[ जीव के बनाये हुए आकारभेदों का वर्णन इस श्लोक
में किया गया है ] प्रिय, अप्रिय तथा उपेक्ष्य ये तीन आकार
मणि में पाये जाते हैं । ये तीनों ही आकार जीवों के बनाये
हुए हैं। इन तीनों में साधारण रीति से अनुस्यूत जो मणि
का स्वरूप है वही ईश्वर का बनाया हुआ रूप कहाता है।
भार्या स्नुषा ननान्दा च याता मातेत्यनेकधा ।
प्रतियोगिधिया योषिद्भिद्यते न स्वरूपतः ॥२३॥
[ एक ही वस्तु में जीव के बनाये हुए आकार किस प्रकार
भिन्न भिन्न होते हैं, यही बात इस श्लोक में दूसरा उदाहरण
देकर समझायी गयी है ] देखा जाता है कि सम्बन्धियों की
भिन्न भिन्न बुद्धि के कारण एक ही स्त्रीशरीर 'भार्या' भी