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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

तृप्तिदीपप्रकरणम् २२९

तृप्तिदीपप्रकरणम् २२९


तादृशेनापि बोधेन संसारो हि निवर्तते ।
यक्षानुरूपो हि बलिरित्याहु लौकिका जनाः ॥१७॥
यद्यपि वह बोध मिथ्या ही है तौ भी उससे मिथ्या संसार
तो निवृत्त हो ही जायगा [ जैसे कि सुपने के झूठे व्याघ्र
को देखकर चौकने से किसी की निद्रा टूट जाती है] लोक में
कहा भी जाता है कि—जैसा यक्ष वैसी बलि, [जैसी शीतला
देवी, वैसी ही उसकी गधे की सवारी । यह इस कारण कहते
हैं कि जब यह संसार मिथ्या ही है तो यह मिथ्या बोध से भी
मर जायगा ] ।
तत्सादाभासपुरुषः सकूटस्थो विविच्य तम् ।
कूटस्थोऽस्मीति विज्ञातुमर्हती त्यभ्यधाच्छ्रुतिः ॥१८॥
[ क्योंकि कूटस्थ ही चिदाभास का निज स्वरूप है ] इस
कारण कूटस्थ सहित जो चिदाभास है वह उस कूटस्थ को
अपने मिथ्या स्वरूप से पृथक् करके [ मुख्य वृत्ति से तो नहीं
किन्तु लक्षणा वृत्ति से तो ] यह जान ही सकता है कि 'मैं
कूटस्थ हूँ' [ मेरा असली रूप कूटस्थ है ] इसी अभिप्राय को
लेकर श्रुति ने 'अस्मि' यह पद कहा है ।
असन्दिग्धाविपर्यस्तबोधो देहात्मनीक्ष्यते ।
तद्वदत्रेति निर्णैतु मयमित्यभिधीयते ॥१९॥
[मूल श्रुति के 'पुरुष' तथा 'अस्मि' इन दो पदों का व्या-
ख्यान यहां तक हो चुका । अब 'अयम्' का व्याख्यान किया
जाता है] लौकिक लोगों को इस प्रसिद्ध देहरूपी आत्मा में
संशय और विपर्यय से रहित बोध पाया जाता है [वे बिना
सन्देह और बिना विपर्यय के इस देह को मैं हूँ कहते हैं । वे

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जब बड़े मेलों में घुसते हैं तब -अपने शरीरों पर कोई चिन्ह
करके नहीं घुसते। अपने शरीर के अपने होने में उन्हें कभी
सन्देह नहीं होता ] ठीक इसी प्रकार प्रत्यगात्मा के विषय में
ऐसा ही दृढ़ ज्ञान, मुक्ति को पाने के लिये आवश्यक है। इसी
बात का निर्णय करने के लिये श्रुति में 'अयम्' यह पद कहा है।
देहात्मज्ञानवज्ज्ञानं देहात्मज्ञानबाधकम्।
आत्मन्येव भवेद्यस्य स नेच्छन्नपि मुच्यते ॥२०॥
'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा जो देहात्मविषय में लोगों का दृढ़
निश्चय पाया जाता है, उसके समान ही यदि किसी को
प्रत्यगात्मा के विषय में, देहात्मज्ञान की बाधा करने वाला ज्ञान
हो जाय [कि यही आत्मतत्व मैं हूँ। यही ब्रह्मतत्व मैं हूँ]
वह विद्वान् मुक्त होना न चाहने पर भी मुक्त हो जाता है
[क्योंकि उसका संसार का कारण अज्ञान तो ज्ञान से बाधित
हो चुका है ]
अयमित्यपरोक्षत्व-मुच्यते चेत्तदुच्यताम् ।
स्वयंप्रकाशचैतन्यमपरोक्षं सदा यतः ॥२१॥
'अयम्' का अर्थ लोक में 'अपरोक्षत्व' होता है। सो इस
श्रुति में भी 'अयं' इस शब्द से अपरोक्षता ही लिया गया है,
ऐसा यदि कोई कहे तो उसकी बात भी मान लो कि हाँ यह
अर्थ भी लिया जा सकता है। क्योंकि स्वयंप्रकाश [अर्थात् किसी
साधनान्तर की सहायता के बिना प्रतीत होने वाला] चैतन्य तो
सदा ही प्रत्यक्ष रहता है [यह हमारा सिद्धान्त ही है]
परोक्षमपरोक्षं च ज्ञानमज्ञानमित्यदः ।
नित्यापरोक्षरूपेऽपि द्वयं स्याद् दशमे यथा ॥२२॥