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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

5. Mahavakya Viveka

महावाक्यविवेक का संक्षेप

'महाश्रोत्रिय' 'महाराजा' 'महायात्रा' 'महाप्रस्थान' 'महा-
ज्ञानी' आदि जैसे शब्द हैं वैसा ही यह 'महावाक्य' भी है।
इसका एक यह भी अर्थ हो सकता है कि—जिस से बड़ा, जिससे
व्यापक अर्थ वाला कोई अन्य वाक्य न हो सकता हो। दूसरा
अर्थ यह भी हो सकता है कि—जिसके पश्चात् दूसरा वाक्य
बोलना ही पड़ता हो। या यों कहो कि बोलने की आवश्यकता
ही न रह जाती हो। जो प्राणी दिन रात बहिर्मुख बने रहते हैं,
जो प्राणी आठों पहर इन्द्रियद्वारों पर ही डटे रहते हैं, उनमें से
कोई जब किसी नाटक के नटों, या पालतू तोते मैनाओं के समान
इन महावाक्यों को बोल उठे तो उसकी बात हम नहीं कहते हैं।
हम तो केवल उन महामना मुनियों की ओर को संकेत करना
चाहते हैं, जिनके हृदयधाम में धधकती हुई ज्ञानाग्नि की ज्वाला
में सृष्टि के पदार्थों की स्वाधीन सत्ता सरकण्डे की रूई के समान
भड़भड़ा कर भस्म हो चुकी हो। वे जब अपने एकान्त हृदय-
मन्दिर के मौनप्रदेश में बैठकर इन वाक्यों को बोल बैठते हैं
और जब उनके हृदय-प्रदेश में सदा के लिये सन्नाटा छा जाता
है—जिसके बाद एक भी अन्यर्थ वाक्य ऐसा सुनाई नहीं पड़ा
सकता जो उनके उस गंभीर सन्नाटे को कभी भी भंग कर सकता
हो, तब इन वाक्यों को 'महावाक्य' कहना बड़े ही गौरव की
बात प्रतीत होती है। यह प्रकरण आगमप्रधान है—इसमें कुतर्क
और व्यर्थ विवाद को थोड़ा सा भी अवकाश नहीं है। इसमें

३० पंचदशी

जिन महावाक्यों का उल्लेख है वे सभी प्राणियों के अन्दर गुप्तभाव
से रहनेवाले 'पूर्ण अहं' का वर्णन करनेवाले हैं। क्षुद्र अहं ने
जीवात्माओं को संकुचित कर रखा है। विचार की आँच से
जब क्षुद्र अहं जल जाता है तब वही पूर्ण अहं प्रत्यक्ष दर्शन दे
देता है। आंख का पलक खुलते ही जैसे अनन्त आकाश आंखों
के सामने आ खड़ा होता है इसी प्रकार क्षुद्र अहं को हटाते ही
अनन्त आत्मतत्व साधक को दीखने लग पड़ता है। उसी पुण्य-
कीर्ति अवस्था की ओर संकेत करनेवाले ये महावाक्य हैं।
जितने भी वेदादि सच्छास्त्र हैं वे इसी पूर्ण अहं की आवाजें हैं।
मनन में गहरे उतरे हुए लोगों को ही ऐसी ईश्वरीय आवाजें सुनाई
पड़ा करती हैं। इसी कारण वेदों को 'अपौरुषेय' कहा जाता है।
वेदों को कोई पुरुष बनाता नहीं किन्तु ये तो शुद्ध मन से सुनने
की बातें हैं। इसी लिये वेदों को ऋषियों के द्वारा प्रकट होना
बताया जाता है। इस प्रकरण में जिन 'महावाक्यों' का वर्णन है
उनकी मृतप्राय आवाजें जनसाधारण के हृदयों में भी सुनाई तो
पड़ती हैं, परन्तु वे अपने क्षुद्र अहंकार के परवश होने के कारण
इनको अनसुनी कर देते हैं। सभी प्राणी अपने जी में अपने
आप को बड़े से बड़ा और अच्छे से अच्छा मानते हैं। सभी को
अपना आपा सर्वगुणसम्पन्न और सब से अच्छा, प्रतीत होता है।
सभी अवसर पाते ही अपनी बड़ाई बघारने से चूकते नहीं हैं।
परन्तु ऐसी सर्वहृदयेश्वरी महत्ता का जो गुप्त कारण है उसका
किसी को भी पता नहीं है। हम तो इसी गुप्त महत्ता को ही
सोया पड़ा हुआ 'अहं ब्रह्मास्मि' कहते हैं। अन्दर जो निःशब्द
भाषा में 'अहं ब्रह्मास्मि' की अखण्ड रटना चल रही है, उसी से
यह प्राणी अपने को सर्वोत्तम समझ रहा है। हमारे रोम रोम में

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३१

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३१

'अहं ब्रह्मास्मि' यह महामन्त्र समाया हुआ है। मौत ने सारे
संसार को अपने जबड़े में दबा रक्खा है परन्तु उस मौत को भी
निगल जानेवाला यह अन्दर का 'अहं ब्रह्मास्मि' कभी मरना
जानता ही नहीं। इस अन्दर के 'अहं ब्रह्मास्मि' को इस मांस
की चादर ने लपेट रक्खा है। अब तो हमें क्षुद्र देहाभिमान के रूप
में इस 'अहं ब्रह्मास्मि' की निर्बल (मुरदा) आवाज़ कभी कभी
सुनाई पड़ जाती है। अब इसमें ब्राह्मतेज नहीं रह गया है।
अन्दर के इस 'अहं ब्रह्मास्मि' को—सोये पड़े हुए इस ओम् को—
हम साधकों को धीरतापूर्वक जगाना पड़ेगा। जब यह पूरा पूरा
जाग उठेगा और इस मांस की चादर को तोड़ फोड़ डालेगा, तब
यह देहाभिमान को, किंवा क्षुद्र अहंकार को जलाकर राख कर
देगा। देहाभिमान के जलने का बहाना पाकर यहीं 'अहं
ब्रह्मास्मि' फिर ब्रह्माण्ड भर में फैल जायगा और इस अनन्त ब्रह्माण्ड
पर फिर अपना एकछत्र आधिपत्य जमा लेगा। ऐसी दिव्य
अवस्था जब आ जाती है तब ही 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि महावाक्यों
के बोलने का सच्चा अधिकार प्राप्त होता है। नहीं तो कोरे
शाब्दिक [शास्त्रीय] ज्ञान से कुछ भी होने जाने वाला नहीं है।
गुड़ कहने मात्र से किसी का मुँह मीठा नहीं हो जाता है—राम
राम रटने से तोता मुनि नहीं हो जाता है। ऐसी दिव्य अवस्था
जब आती है तब शान्ति का अनन्त समुद्र उमड़ पड़ता है। तब
शोक भय दीनता आदि ठहर नहीं पाते हैं। जिन लोगों के
पवित्र मानस में इस तरह के अपौरुषेय महावाक्य सुनाई पड़ने
लगते हैं, जिनके हृदय में पूर्णता की गुंजार रहने लग जाती है,
वे ही मुनि हैं, वे ही जीवन्मुक्त हैं, उनको ही विदेह मुक्ति
मिल सकती है। जिसकी वाणी के पीछे अनुभव का बल नहीं

३२ पञ्चदशी
होता है ऐसी निस्तेज वाणी से बोले हुए 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि .
महावाक्य उसी तरह बन्धनकारक होते हैं, जिस प्रकार अन्य
अपशब्द बन्धनकारक होते हैं। क्योंकि अनुभव रहित पुरुष जब
इन महावाक्यों को कहते हैं तब वे आत्मघात कर बैठते हैं क्योंकि
उनमें दम्भ आदि दोष बहुतायत से उत्पन्न हो जाते हैं।
मुख्य महावाक्य. चार हैं। एक 'प्रज्ञानं ब्रह्म' दूसरा
'अहं ब्रह्मास्मि' तीसरा 'तत्त्वमसि' चौथा 'अयमात्मा ब्रह्म'
ब्रह्म और आत्मा की एकता रूप जो मोक्ष का साधन है-उसका
ज्ञान इन ( या इन जैसे ) वाक्यों से ही हो पाता है। आत्मा
सच्चिदानन्द स्वरूप है, यह ज्ञान तो युक्ति से भी हो जाता
है। परन्तु 'यह आत्मा और वह ब्रह्म तत्व दोनों एक ही तत्व
हैं, इस बात को जानने का उपाय शब्द प्रमाण के अतिरिक्त
और कुछ भी नहीं है।
प्रज्ञानँ ब्रह्म
चक्षु और श्रोत्र के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर
निकलती है, उस वृत्ति से उपहित जो चैतन्य किंवा ज्ञान है,
उसी से तो यह संसार रूपादि पदार्थों को देखा करता है और
शब्दों को सुना करता है। नासिका के द्वारा जो अन्तःकरण की
वृत्ति बाहर निकलती है अन्तःकरण की उस वृत्ति से उपहित जो
चैतन्य किंवा प्रज्ञान है, उसी प्रज्ञान से तो यह संसार भले बुरे
गन्धों को सूँघा करता है। वागिन्द्रिय से ढके हुए उसी
चैतन्य किंवा प्रज्ञान से ये सब शब्द बोले जाते हैं। रसना के
द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर निकलती है, उसको जिस
चैतन्य ने अपनी उपाधि बना लिया है, उसी से तो ये स्वादु
या अस्वादु रस पहचाने जाते हैं। इतना ही नहीं और भी

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३३

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३३
इन्द्रियों तथा अन्तःकरण की वृत्तियों से जिस चैतन्य किंवा जिस
प्रज्ञान की सूचना जब-तब मननशील पुरुष को मिला करती है
उसी को हम 'प्रज्ञान' कह रहे हैं। ब्रह्मा इन्द्र देवता मनुष्य तथा
पशु पक्षियों तक में यही ऊपर कहा हुआ प्रज्ञान व्याप्त हो रहा
है। वेदादि सब इसी प्रज्ञान सूर्य की बिखरी हुई किरणें हैं। इसी
के सहारे से जगत् के जन्म स्थिति और प्रलय हो रहे हैं—इस
कारण कहना पड़ता है कि सर्वान्तर्यामी यह 'प्रज्ञान' ही ब्रह्मतत्व
है। क्योंकि सर्वत्र व्याप्त यह 'प्रज्ञान' ही ब्रह्म है, इसी से मैं मुमुक्षु
अब यह बात बेधड़क होकर कह सकता हूँ कि मुझ में जो 'प्रज्ञान'
है वह भी ब्रह्मतत्व ही है। आज से मैं इस महामहिम 'प्रज्ञान'
पर झूठा अहंकार ( क्षुद्र अहंकार ) करना छोड़ देता हूँ। इतना
जान चुकने पर भी यदि मैं इस सर्वत्र व्याप्त 'प्रज्ञान' पर क्षुद्र
अहंकार करूँगा तो मैं ब्रह्मद्रोही हो जाऊँगा। व्यापक ब्रह्म को
क्षुद्र अहम् में परिच्छिन्न करने का घोर पातक मुझे लगेगा।
अहं ब्रह्मास्मि
यों सिद्धान्तरूप से तो सभी देहों में वह परात्मतत्व परिपूर्ण
हो रहा है और सभी की बुद्धियों का साक्षी भी है। सभी प्राणी
अपने को सबसे बड़ा और सब से अधिक गुणी मान कर 'अहं
ब्रह्मास्मि' की रटन अज्ञानपूर्वक करते ही रहते हैं। परन्तु इतने मात्र
से साधक का कुछ भी उपकार नहीं हो पाता। जब तो किसी
साधक को उसके साथ ही यह स्फूर्ति [प्रतीति] भी हो जाय कि वह
सर्वत्र परिपूर्ण परात्मतत्व ही मेरी बुद्धि का साक्षी है, तो वैसे स्फूर्ति-
युक्त आत्मा के विषय में ही हम 'अहम्' [मैं] शब्द कह रहे हैं।
जब कोई साधक अपने ऊपर पड़ी हुई अविद्या की चादर को बार
बार उतार कर फेंकने लगता है, जब कोई साधक मांस के झोंपड़े

३४ पंचदशी
में से निकल कर बार बार बाहर बैठने लगता है, तब उस
साधक को ही हम अहम् ['मैं'] कहना चाहते हैं। देश काल
या वस्तु के परिच्छेद में न आने वाली स्वभाव से ही परिपूर्ण जो
वस्तु है वह 'ब्रह्म' कही जाती है। इस 'मैं' को और उस 'ब्रह्म'
को परस्पर एक बता देना 'अस्मि' इस तीसरे पद का काम है।
जिसका भाव यही होता है कि मैं (साधक) ब्रह्मतत्व ही हूँ अथवा
मैं साधक ही तो ब्रह्म हूँ। अविद्या के प्रताप से जो मैं अपने आप
को संसारी आदि मान बैठा था वह कुछ भी मैं नहीं हूँ। देहेन्द्रि-
यादि की क्षुद्र और संकीर्ण दृष्टि में उलझा रह जाने वाला,
देहेन्द्रियादि के साथ जल मरने वाला क्षुद्र प्राणी मैं कदापि नहीं
हूँ। अथवा अविद्या के प्रताप से जो मैं ब्रह्मतत्व को अपने से
पृथक्—सातवें आसमान पर रहने वाला—तत्त्व मान बैठा था
वह ब्रह्मतत्व मुझ से पृथक् पदार्थ नहीं है।
तत्त्वमसि
जो अभी तक वृथा ही [नामालूम क्यों] शरीरों के वेष्टनों से
लिपटा पड़ा था, जो शरीरों के साथ वृथा ही बार बार मर और
जी रहा था, श्रवणादि का अनुष्ठान करके महावाक्य के समझने
की योग्यता अब जिसमें आ गयी है, जो तीनों देहों से अलग
रहने लगा है, जो तीनों देहों के साक्षी की हैसियत में आ गया
है, उसी को हम लक्षणावृत्ति से 'त्वं' अर्थात् 'तू' कह रहे हैं। सृष्टि
बनने से पहले सम्पूर्ण भेदों से रहित जो एक नामरूप रहित
वस्तु थी, सृष्टि बन जाने के बाद अब भी जो वस्तु वैसी की वैसी
ही है, जिस सद्वस्तु में अब भी कोई विकार नहीं आया है, उसी
निर्विकार सद्वस्तु को हम लक्षणावृत्ति से 'तत्' अर्थात् 'वह' कह
रहे हैं। इन दोनों शब्दों के लक्ष्यार्थों की जो छिपी हुई एकता है

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३५

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३५

उसी गुप्त एकता का ग्रहण असि [ है ] यह पद करा रहा है।
परन्तु कितना ही प्रयत्न करो इस लक्ष्यार्थ तक तो केवल अधिकारी
लोगों की ही उदार दृष्टि पहुँचेगी । दूसरे अनधिकारी लोग तो इस
महावार्ता को हँसी में ही टाल देंगे और परम पद के साथ खिल-
वाड़ कर बैठेंगे । मुमुक्षु लोगों को चाहिये कि 'तत्' 'त्वं' पदों की
जो एकता प्रमाणपुष्ट हो चुकी है, उसका दिव्यानुभव वे भी ले
लें, और वैसा अनुभव करके अनादिकाल की इस वृथा खटपट
को भूल जांय । वे अनुभव करें कि क्या हम अनादि काल से
इसी भवजाल में उलझे रहने को यहां उतरे हैं ? क्या इस संसार
की वेमतलब उखाड़ पछाड़ ही हमारे इस जीवन का चरमलक्ष्य
है ? या हमारा अपना कोई स्थायी रूप भी है ? जिसके कि
आधार से हमको शान्ति के सुखद दर्शन मिल सकते हैं। इसी
गम्भीर प्रश्न का उत्तर तत्त्वमसि [ तुम तो वह हो, तुम्हें तो
इस खटपट की कुछ भी आवश्यकता नहीं है ] यह महावाक्य
दे रहा है ।
अयमात्मा ब्रह्म
जो तत्व स्वयंप्रकाश होने के कारण ही यद्यपि सबको प्रत्यक्ष
हो रहा है परन्तु हुआ करो, फिर भी मायामोहित प्राणी ने इस
स्वयंप्रकाशतत्व की भी ऐसी उपेक्षा की है जैसी कदाचित् शत्रुओं
की भी कोई न करता हो। कोटिजन्मों के पुण्यों के परिपाक से
जब किसी साधक की सूक्ष्म दृष्टि उस तत्व तक जा पहुँचे तब
सूक्ष्म दृष्टि से पकड़ लिये हुए उसी तत्व को हम अयम् [यह]
कह रहे हैं-अर्थात् यह तत्व कभी किसी से छिपता नहीं है और
यह कभी किसी का दृश्य नहीं होता है। अहंकार,प्राण,मन इन्द्रिय
तथा देह का जो समूह है, उस सभी का अधिष्ठान, सभी क

३६ पंचदशी
साक्षी, सभी से प्रत्यक्, सभी से आन्तर, जो कोई तत्व है उसी
को हम 'आत्मा' कहते हैं। यह जो आकाशादि संसार हमें दीख
रहा है यह सब क्षणभंगुर है। यह क्षणभंगुर संसार अपने स्वभाव
के अनुसार जब शेष नहीं रह जायगा, तब जो तत्व शेष बचेगा
उस तत्व को ही हम 'ब्रह्म' कहते हैं। वह ब्रह्मतत्व साधक की
समझ में आया हुआ, यह ऊपर कहा हुआ,खयंप्रकाश आत्मा ही
तो है। इस आत्मा से भिन्न कोई ब्रह्मनाम का पदार्थ होता होगा
यह विचार प्रमाणानुमोदित नहीं है। इस आत्मा से भिन्न किसी
को ब्रह्म समझना भारी से भारी भूल है।