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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

11. Yogananda

[११]
ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप
इस प्रकरण में उस ब्रह्मानन्द का वर्णन किया गया है जिसे
पहचानते ही इस लोक और परलोक के त्रिविध ताप कूच कर
जाते हैं और पहचानने वाला सुखरूप ब्रह्मतत्व ही हो जाता है।
इस ब्रह्मज्ञान की श्रुतियों ने बड़ी प्रशंसा की है। वे कहती हैं
कि—"ब्रह्मदर्शी पुरुष पर को पा लेता है। आत्मज्ञानी शोक मोह
की हालत से ऊपर उठ जाता है। रस अथवा सार तो ब्रह्म ही है।
इस रस को पाकर ही आनन्दी हो सकता है और तरह से नहीं।
जब अपने रूप में प्रतिष्ठा (ठहरना) मिल जाती है तभी पुरुष
अभय हो सकता है। जब तो अपने में भेद देखने लगता है तब
उसे डरना ही पड़ता है। यह समझ लेने वाला पुरुष कि 'आनंद
तो जहां भी है वहां ब्रह्मतत्व का ही है,' किसी भी बात और किसी
भी घटना से नहीं डरता। कर्मरूपी अग्नि की चिन्ता बस एक
इस ज्ञानी को ही छोड़ती है। शेष तो सब प्राणी इस कर्तव्याग्नि
की ज्वालाओं से झुलसे पड़े हैं और इसी के झूठे इलाज करने में
व्यग्र हो रहे हैं। ऐसा जान चुकने वाला पुरुष पाप पुण्यों को
छोड़कर सदा आत्मा को याद रखने लगता है और किये हुए धर्मों
को भी तो आत्मरूप ही जान लेता है। उस परावर को देख चुकने
पर इसकी 'हृदयग्रन्थि' खुल जाती है। इसके सब सन्देह मिट
जाते हैं और सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। उसी को जान चुकने
वाला पुरुष जन्म मरणरूपी चक्कर से छूट सकता है। इस चक्र

पंचदशी ८८
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से छुटकारे का दूसरा कोई मार्ग ही नहीं है। देव को जानकर
ही फांसा खुल जाता है। क्लेशों के नष्ट हो जाने पर फिर जन्म
लेना नहीं पड़ता। जो धीर पुरुष देव को जान लेता है वह इसी
जन्म और इसी लोक में हर्ष शोक से छूट जाता है। किये या
बेकिये पुण्य पाप फिर इसे कभी भी दुःखी नहीं करते।” उपर्युक्त
श्रुतियों में ब्रह्मज्ञान से अनर्थ की हानि और आनन्द की प्राप्ति
दोनों ही बातों की घोषणा की गयी है।
आनन्द के मुख्य तीन भेद हैं एक ‘ब्रह्मानन्द’ दूसरा ‘विद्या-
नन्द’ तीसरा ‘विषयानन्द’। सबसे पहले ब्रह्मानन्द का विवेचन
करेंगे—
भृगु के पिता वरुण ने उसको ब्रह्म का लक्षण बताया कि
‘जिससे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, जिसके सहारे से जीते हैं
तथा मरते समय जिसमें लीन हो जाते हैं वह ब्रह्म है।’ इस
लक्षण को जब उसने अन्न, प्राण, मन और बुद्धि में घटाकर देखा
तब उसे यह निश्चय हो गया कि ये ब्रह्मतत्व नहीं है। अन्त में
जाकर इसी लक्षण के सहारे से उसे आनन्द के ही ब्रह्म होने का
निश्चय हुआ। क्योंकि आनन्द से ही ये भूत उत्पन्न होते हैं उसी
से जीते हैं और उसी में ही लीन हो जाते हैं। इस कारण आनन्द
ही ब्रह्मतत्व है। इसमें फिर उसे संशय नहीं रहा।
भूतों के उत्पन्न होने से पहले [त्रिविध द्वैत के न होने से]
भूमा परमात्मा ही था। क्योंकि प्रलय काल में ज्ञाता ज्ञान ज्ञेयरूपी
त्रिविध द्वैत होता ही नहीं। उस परमात्मा में से जब विज्ञानमय
उत्पन्न हुआ तब वह ‘ज्ञाता’ हो गया। जब मनोमय उत्पन्न हुआ
तब ‘ज्ञान’ होने लगा। जब शब्दादि विषय उत्पन्न हुए तब वे ‘ज्ञेय’
हो गये। ये तीनों ही उत्पत्ति से पहले नहीं थे। आप उस अवस्था

ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ८९
का ध्यान कीजिये—जबकि ये उपर्युक्त तीनों हा नहीं थे, यदि
आप उस अवस्था में जाने का साहस कर सकते हों तो सुनिये—
उस अवस्था में एक द्वैतरहित पूर्ण पदार्थ अनुभव में आता ही
है। द्वैतरहित पूर्ण पद को देखना हो तो यहां लोक में वर्तमान
काल में भी देख लो कि समाधि के समय निर्द्वैत पूर्ण आत्मा का
अनुभव विद्वान् को होता ही है। सुषुप्ति और मूर्च्छा में उस निर्द्वैत
पूर्ण तत्व का अनुभव सर्वसाधारण को भी हुआ ही करता है। सुषुप्ति
आदि के समय इस पूर्ण पद के टुकड़े कर डालने वाली वस्तु नहीं
रह जाती और यों उस समय आत्मा में आत्मा की पूर्णता आ ही
जाती है। इसी प्रकार सृष्टि बनने से पहले भी,भेदक उपाधि के न
रहने के कारण,वह परात्मा उस समय पूर्ण का पूर्ण ही रहता है।
पुराण सहित पांचों वेदों और सकल शास्त्रों को जानकर भी
केवल अनात्मज्ञ होने के कारण नारद बड़ा ही शोकी हो गया
था। उसने गुरु के सामने जाकर अपने हृदय की दुर्बलता को
यों दिखाया था कि भगवन् ! विद्या पढ़ने से पहले तो मुझे सर्व-
साधारण की तरह, तीन तरह के ताप ही तपाया करते थे, अब
तो मेरे ऊपर यह बोझ और पड़ गया है कि कहीं यह विद्या भूल
न जाय, दूसरे विद्वान् से पराजय का खटका भी लगा रहता है।
अपने से थोड़े पढ़े लिखे को देखकर गर्व भी होने लगा है, इस
कारण बार बार इसका अभ्यास करना पड़ता है। यों विद्वान् होने
से तो मेरा बोझ और भी बढ़ गया है। होना जो चाहिये था उस
से सर्वथा विपरीत हो गया है। विद्वान् होने से तो मुझे शान्ति की
आशा लगी हुई थी। आज वह पूरी नहीं हो रही है सो कृपा
करके आप मुझे वहां पहुँचा दीजिये जहां जाकर शोक नहीं
रहता। इसके उत्तर में सनत्कुमार ऋषि ने उत्तर दिया कि—सुख

९० पञ्चदशी
ही ऐसा तत्व है जिसे जानकर शोक का पार पाया जा सकता है,
सो आप सुख को ही जान लें। सुख के विषय में भी यह बात
विशेष रूप से जाननी पड़ेगी कि—यह जो वैषयिक सुख है इसे
तो हम सुख ही नहीं मानते हैं। क्योंकि इस पर तो हज़ारों शोक-
रूपी श्वापदों की वक्र दृष्टि पड़ी ही हुई है। वे तो सदा ही इस
वैषयिक सुख को नोचते रहते हैं। इसे तो सुख न कहकर दुःख
ही कहें तो भला है। यह तो ठीक है कि अद्वैत में भी सुख नहीं
है परन्तु आपको यह मालूम हो जाना चाहिये कि सुख तो स्वयं अद्वैत
ही है। स्वयंप्रकाश होने के कारण उसके लिये प्रमाण की दरकार
भी नहीं है। सुषुप्ति के समय इन्द्रियां नहीं होती हैं, जिनसे उसे
जान सकें, फिर भी सुषुप्ति को सब मानते ही हैं। जानते हो
ऐसी विचित्र बात क्यों है ? बिना प्रमाण की वस्तु को क्यों माना
जाता है ? सुनो इसका कारण सुषुप्ति की स्वयंप्रकाशता ही तो
है। उस सुषुप्ति के समय कुछ भी दुःख नहीं होता। उस समय
केवल सुख नाम की वस्तु ही शेष रह जाती है। उस समय कोई
भी विरोधी दुःख नहीं रहता, इस कारण उस समय सुख मानने
में कोई विघ्न नहीं है। जागते समय के अनेक व्यापारों से थक-
कर जब दुःखदायी प्रसंग टल जाता है तब वह प्राणी स्वस्थचित्त
होता है। उस समय ही उसे मृदुशय्या आदि से मिलने वाले
सुख का अनुभव होता है। विषयोपार्जन करता करता तंग हो
कर जब उस दुःख को हटाने के लिये कोमल शय्या पर लेट
जाता है तब उसकी बुद्धि अन्तर्मुख हो जाती है। अन्तर्मुख हुई
उस बुद्धिवृत्ति में सामने रक्खे हुए दर्पण की तरह स्वरूपभूत जो
आत्मानन्द है, वह प्रतिबिम्बित हो जाता है। बस इसी को तो
'विषयानन्द' कहते हैं। यह विषयानन्द त्रिपुटी के ही अधीन

ब्रह्मानन्दन्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९१
(मातहत) होता है, इस कारण इससे भी जीव को यत्किंचित्
श्रम तो होता ही है। इस श्रम को हटाने के लिये यह जीव
प्रतिदिन सोना चाहा करता है या यों कहो कि परमात्मा की ओर
दौड़ लगाया करता है। वहां पहुँच कर जो अद्भुत प्रसंग होता
है उसे तो याद करते ही साधकों को बड़ी प्रसन्नता होती है।
क्योंकि उस समय सोने वाला प्राणी स्वयं ही वहां का ब्रह्मानन्द
हो गया होता है। जैसे धागे में बंधा हुआ पक्षी चारों तरफ उड़
उड़ कर थक कर अपने बन्धनस्थान पर लौटा हो, इसी प्रकार
यह जीव धर्माधर्म के फलों को भोगने के लिये सुपने या जागरण
में टक्करें मार मार कर भोगदायी कर्मों के क्षीण होते ही, लीन हो
जाता है। जैसे कोई श्येन [पक्षी] उड़ते उड़ते थककर अपने
घोंसले पर को टूट पड़ा हो उसी प्रकार ब्रह्मानन्द का लम्पट यह
जीव सुषुप्ति की ओर को दौड़ा करता है। मनुष्यों में भी जैसे
नन्हा बच्चा जब दूध पीकर खाट पर लेटा होता है उस समय वह
आनन्द की मूर्ति दिखाई देता है। क्योंकि उसे उस समय रागद्वेष
नहीं होता। जो चक्रवर्ती राजा सब भोगों से तृप्त होकर बैठा है,
जिसे मनुष्यों को मिलने वाला बड़े से बड़ा सुख प्राप्त रहता है,
वह भी आनन्दमूर्ति हुआ रहता है। जो ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण है वह
जब कृतकृत्य होकर बैठता है—विद्यानन्द की अन्तिम गति जब
उसे मिल जाती है तब वह भी सुखमूर्ति बन जाता है। मुग्ध,
बुद्ध और अतिबुद्ध ये ही तो तीन लोक में सुखी माने जाते हैं।
जिनको लेशमात्र भी विवेक नहीं है, उनमें बालक सबसे सुखी
माना जाता है। जिन्हें कुछ विवेक है उनमें, सार्वभौम राजा सब
से सुखी गिना जाता है। जो अतिविवेकी हैं उनमें आत्मदर्शी
को सर्वाधिक सुखी समझते हैं। इन तीनों को छोड़कर और तो

९२ पंचदशी

सभी प्राणी दिन रात दुःखी बने रहते हैं—वे सुखी कभी नहीं होते।
इस कारण इन तीन का ही दृष्टान्त हमने दिया है। अब प्रकृत
बात तो यही हुई कि—यह सोता हुआ प्राणी भी इन ही तीनों
की तरह ब्रह्मानन्द में तत्पर रहता है उसे स्त्री से आलिंगित कामी
की तरह अन्दर बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं रह जाता। उस
अवस्था के विषय में श्रुति ने कहा है कि—उस समय पिता पिता
नहीं रहता। अर्थात् जीव का जीवभाव ही उतने समय के लिये
खोया जाता है। उस समय तो जीव ब्रह्मतत्व ही हो गया होता
है। क्योंकि संसारिपन का तो कोई चिह्न ही उस समय नहीं रह
जाता। जानते हो सुख दुःख देने वाली वस्तु क्या है ? सुनो !
पितापन आदि का अभिमान ही सुख दुःख का कारण हुआ
करता है। सुषुप्ति जब आती है तब यही अभिमान नहीं रह जाता
और यह प्राणी उस समय सब शोकसरिताओं के पार पहुँच गया
होता है। जब कोई पुरुष सोकर उठता है तब कहता है कि मैं
सुखपूर्वक सोया और मैंने कुछ भी नहीं जाना। अर्थात् वह उस
समय सुख और अज्ञान दोनों को जान रहा था। चित्स्वरूप होने
के कारण सोते समय सुख तो स्वयं ही प्रतीत हो जाता है। उसी
स्वयंप्रकाश सुख पर जो अज्ञान का पर्दा पड़ा है, उस की
प्रतीति भी उस सुख के सहारे से ही हो जाती है। वाजसनेयी
शाखा वालों ने सुख विज्ञान और आनन्द इन तीनों को एक ही
बात कहा है। उससे यह समझने में और भी सुभीता हो जाता है
कि स्वयंप्रकाश जो भी कोई सुख है वह ब्रह्मतत्व ही है। सुषुप्ति
के समय सुख के ऊपर जो अज्ञान का ढकना पड़ा था उसी अज्ञान
में बुद्धि और मन लीन हो जाया करते हैं। विज्ञानमय और मनोमय
का विलीन हो जाना ही 'निद्रा' कहाती है। इसी को कोई-कोई

[Header] ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९३
'अज्ञान' भी कह देते हैं। पिघला हुआ घी जैसे ठण्डक लगने
से गाढ़ा हो जाता है, इसी प्रकार भोगदायी कर्मों के सम्पर्क से
यही अज्ञान गाढ़ा हो कर 'विज्ञानमय' हो जाता है। विलीन
अवस्था के उसी अज्ञान को 'आनन्दमय' कह देते हैं। सुषुप्ति से
पहले क्षण में जो अन्तर्मुख बुद्धिवृत्ति होती है, उस बुद्धिवृत्ति में
जब सुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है उसके बाद उस प्रतिबिम्ब को
अपने मुँह में पकड़े ही पकड़े वह वृत्ति निद्रा रूप से लीन हो
जाती है तब यही 'आनन्दमय' कहाने लगती है। वह जो अन्त-
र्मुख आनन्दमय है वह, चिदाभास से मिली हुई तथा अज्ञान से
पैदा हुई अति सूक्ष्म वृत्तियों के द्वारा ब्रह्मसुख को भोगा करता है।
जागरण में जब हम सुख भोगते हैं तब तो हमें यह याद भी रहता
है कि हम सुख भोग रहे हैं परन्तु उस [ निद्रा के ] समय ऐसा
विचार न होने का कारण भी सुनलो—वे अज्ञानवृत्तियाँ बहुत ही
सूक्ष्म होती हैं, वे बुद्धिवृत्तियों की तरह स्पष्ट नहीं होतीं इसी से
सुषुप्ति में सुखभोग का स्पष्ट परिज्ञान नहीं होता। वेदान्त का
गम्भीर मनन करने वालों ने यह बात बतलायी है। माण्डूक्य
और तापनीय आदि उपनिषदों में तो बड़ी ही स्पष्ट भाषा में
'आनन्दमय' को भोगने वाला और 'ब्रह्मानन्द' को भोग्य कहा है।
जो आत्मा जागते समय मन, बुद्धि आदि अनेक रूप हो रहा था
वही अब सुषुप्ति के समय चावलों की पिट्ठी की तरह फिर एकता
को प्राप्त हो गया होता है। पहले जो बहुत सी बुद्धिवृत्तियां थी अब
सुषुप्ति के समय उनका एक घनपिण्ड हो गया है—मानों पानी
का जम कर बर्फ़ बन गया हो। जिस प्रज्ञानघनता का वर्णन हमने
ऊपर किया है, इसी को बहुत से लोग दुःखाभाव कह बैठते हैं।
क्योंकि उस समय सम्पूर्ण दुःखवृत्तियों का विलोप हो जाता है।

उनकी यह एकदेशीय दृष्टि ही उनके भ्रम का कारण बन जाती
है। यह हम पहले ही कह चुके हैं कि अज्ञान में बिम्बित चैतन्य
से ही आनन्द का भोग तब हुआ करता है। अज्ञान के पर्दे के
कारण भोग्य के स्वरूप का पता हमें चलता ही नहीं। यदि उस
का पता चल जाता तो प्राणी को विषयों में भटकना ही न पड़ता।
इसी कारण भोग में आते हुए भी उस ब्रह्मसुख की अवहेलना
करके कर्मों के प्रताप से इस जीव को फिर फिर वाहर निकलना
ही पड़ता है किंवा यों कहो कि—जागना पड़ ही जाता है।
जब यह जीव सो कर उठता है तब कुछ काल तक उस भोगे
हुए ब्रह्मानन्द की बासना तो बनी ही रहती है। जभी तो वह
बिना किसी सुखदायी विषय के ही सुखी हो कर चुप चाप बैठा
रहता है। जिन कर्मों ने सुषुप्ति में से इसे जगा लिया था वे ही
कर्म फिर इस से संसार के नाना दुःखों की भावना कराने लगते
हैं। फिर यह अभागा प्राणी धीरे धीरे हाय ! हाय ! उस जगज्जी-
वन ब्रह्मानन्द को सर्वथा भूल ही जाता है। निद्रा के पीछे और
निद्रा के पहले सभी मनुष्यों को इस ब्रह्मानन्द में बड़ा स्नेह होता
है। हां इतना तो अवश्य है वे इस आनन्द का यह नाम नहीं
जानते हैं। इतना समझ चुकने पर हम समझते हैं कि कोई भी
समझदार इस आनन्द के विषय में विवाद तो नहीं करेगा। जो
ब्रह्मानन्द बड़े परिश्रम से मिला करता है, वही ब्रह्मानन्द आल-
सियों और सर्वसाधारण को मिला ही हुआ है, फिर आप गुरु और
शास्त्र की पख क्यों लगाते हो ? ऐसा यदि कोई पूछे तो हम
कहेंगे कि हां यदि सचमुच ही वे लोग यह पहचान जांय कि
यह ब्रह्मानन्द ही है तो वे अवश्य ही कृतार्थ हो जांय। परन्तु
गुरु और शास्त्र के बिना तो यह गम्भीर तत्व किसी की समझ में

ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९५
आता ही नहीं। जब तक कोई इस ब्रह्ममार्ग का भेदिया साथ
न हो तब तक ब्रह्मदुर्ग पर अधिकार पाना सरल काम नहीं है।
प्रकृत बात तो यही हुई कि जहां जहां विषय न हों और
सुख होता हो वहां वहां इस ब्रह्मानन्द की 'वासना' को समझ लो।
विषयों के मिलने पर भी, जब कि उनकी इच्छा नहीं रह जाती
और मनोवृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है, तब उसमें आनन्द का प्रति-
बिम्ब पड़ जाता है। बस इसी को 'विषयानन्द' जान लो। 'ब्रह्मा-
नन्द' 'वासनानन्द' और 'प्रतिबिम्ब' [विषयानन्द] इन तीन के
सिवाय तो इस जगत् में चौथा आनन्द है ही नहीं। इन तोनों
आनन्दों में भी यह बात ध्यान रखने योग्य है कि यह स्वयं-
प्रकाश 'ब्रह्मानन्द' ही 'वासनानन्द' और 'विषयानन्दों' को यदा
तदा उत्पन्न कर देता है।
यहां तक श्रुति, युक्ति और अनुभव के सहारे से यह सिद्ध
किया गया है कि सुषुप्ति काल में यह स्वयंप्रकाश और चेतन
ब्रह्मानन्द रहता है। अब जागरण काल में उस ब्रह्मानन्द को कैसे
जानें ? सो भी सुन लीजिए—सुषुप्ति के समय जिस 'आनन्द-
मय' को हमने ऊपर बताया है, वही जब 'विज्ञानमय' हो जाता
है तब स्थानभेद के, कारण कभी जागरण और कभी स्वप्न में
पहुँच जाता है। नेत्र में 'जागरण' होता है, कण्ठ में 'स्वप्न'
होता है और हृदय कमल में 'सुषुप्ति' होती है। यह चेतन जब
जागता है तब पैरों से मस्तकपर्यन्त देह को व्याप्त कर लेता है।
तपे हुए लोहपिण्ड के साथ जैसे अग्नि हिल मिल कर एक होजाती
है, इसी प्रकार इस देह के साथ तादात्म्य को प्राप्त हुआ यह
चेतन, निश्चित रूप से यह मान बैठता है कि 'मैं तो मनुष्य हूँ'।
यह मनुष्य क्रम से 'उदासीन' 'सुखी' और 'दुःखी' इन तीन अव-

९६ पञ्चदशी

स्थाओं में रहने लगता है। इन तीनों अवस्थाओं में से सुख दुःख
की दो अवस्थायें कर्म से उत्पन्न हुआ करती हैं। परन्तु उदासी-
नता तो किसी भी कर्म से उत्पन्न नहीं होती [ वह तो स्वाभाविक ही
होती है ]। बाह्य पदार्थों के भोग से या फिर मनोराज्य से भिन्न
भिन्न प्रकार के सुख दुःख होते हैं। परन्तु कभी कभी ऐसा भी
होता है कि उस समय न तो सुख ही होता है और न दुःख ही।
उस समय निजानन्द की धुंधली प्रतीति सब ही को होती है।
उस समय प्रायः सभी यह कहा करते हैं कि आज मुझे कुछ भी
चिन्ता नहीं है। आज तो मैं सुखपूर्वक बैठा हूँ। 'मैं सुखपूर्वक'
हूँ' इस प्रकार सूक्ष्म अहंकार से ढका रहने के कारण ही इस
आनन्द को हम मुख्यानन्द नहीं कह सकते। इसे तो मुख्य
आनन्द की वासना समझना चाहिए, जो कि अहंकार के छनने
में को छन कर हमें अस्पष्ट दीख रही है—जो अपनी ओर को
हमारा विशेष ध्यान नहीं खींच सकी है। जिस घड़े के अन्दर
जल भर रहा हो उस के बाहर जो शीतलता आजाती है वह शीत-
लता जल नहीं होती, किन्तु वह तो जल का गुण होता है। उस
शीतलता को देखकर जल का तो अनुमान ही हो जाता है। इसी
प्रकार यह उदासीनता का सुख ही 'ब्रह्मानन्द' नहीं है। यह तो
'ब्रह्मानन्द' की वासना है। इस वासना से तो 'ब्रह्मानन्द' का अनु-
मान होता है। निरोध समाधिका अभ्यास करने से जितना इस
अहंकार का विस्मरण होता जायगा, योगी की दृष्टि उतनी ही सूक्ष्म
होने लगेगी और उसी परिमाण से योगी को निजानन्द का अनु-
भव भी होने लग पड़ेगा। जब अहंकार का विस्मरण पूर्ण रूप से हो
जाता है, तब यह परमसूक्ष्म होकर रहता है—लीन नहीं होता—
इस कारण इस अवस्था को निद्रा नहीं कह सकते। यही कारण