पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
चित्, दूसरी अन्तर्यामी, तीसरी सूत्रात्मा, चौथी विराट्, ये
(जैसे (१) धुला हुआ, (२) मांडी दिया हुआ, (३) चित्रों
की रेखा वाला, तथा (४) रंग भरा हुआ—ये चार अवस्थायें
छींट के कपड़े की होती हैं, इसी प्रकार परमात्मा में भी पहली
चित्, दूसरी अन्तर्यामी, तीसरी सूत्रात्मा, चौथी विराट्, ये
चार अवस्थायें होती हैं।)
स्वतः शुभ्रोऽत्र धौतः स्याद् घट्टितोऽन्नविलेपनात् ।
मष्याकारैर्लाञ्छितः स्याद् रञ्जितो वर्णपूरणात् ॥३॥
जो वस्त्र स्वतः [अर्थात् दूसरे द्रव्य से सम्बन्ध हुए बिना]
ही शुभ्र है उसको यहाँ ‘धौत’ कहा जाता है। अन्न [अर्थात्
मांडी] से पुतने पर उसको ‘घट्टित’ कहते हैं। स्याही से जिस
पर [खाली] आकार बना दिये गये हों वह ‘लाञ्छित’ कहाता
है। [यथायोग्य] रंग भर देने पर वही ‘रञ्जित’ कहाने लगता है।
स्वतश्चिदन्तर्यामी तु मायावी, सूक्ष्मसृष्टितः ।
सूत्रात्मा, स्थूलसृष्ट्यैव विराडित्युच्यते परः ॥४॥
वह परमात्मा जब स्वतः हो [जब उसमें माया और माया
के कार्यों का मिश्रण न हुआ हो] तब ‘चित्’ कहाता है।
माया का योग हो जाने पर वही परात्मा ‘अन्तर्यामी’ हो जाता
है। जब उसका सूक्ष्म सृष्टि से योग हो जाता है [किंवा जब उसे
अपंचीकृत भूतों से बना हुआ समष्टि सूक्ष्म शरीर मिल जाता
है] तब वही ‘सूत्रात्मा’ कहा जाता है। स्थूल सृष्टि [किंवा
पंचीकृत भूतों के बने हुए समष्टि स्थूल शरीर] के कारण वही
परमात्मा अन्त में ‘विराट्’ कहाने लगता है।
ब्रह्माद्याः स्तम्बपर्यन्ताः प्राणिनोऽत्र जडा अपि ।
उत्तमाधमभावेन वर्तन्ते पटचित्रवत् ॥५॥
१२६ पञ्चदशी
ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त चेतन प्राणी तथा गिरि, नदी.
आदि जड जगत्, जो कि इस परमात्मा में ऊँच नीच भाव से
रह रहा है, ठीक ऐसा ही है जैसे कि कपड़े के चित्र हों और
वे आपस में एक दूसरे से उत्तम वा अधम हों। [कपड़े के चित्रों
का उच्च नीच भाव जैसे परिणाम में निकम्मा है इसी प्रकार
प्राणियों का उच्च नीच भाव भी वेमतलव है। उच्च नीच कोई
नहीं है, ये सब जीव अनन्त को पाने में लगे हुए हैं, जिसने उसे
जितना पा लिया है वह उतना उच्च है। न पानेवाला नीच है ।
उच्च नीच उसको पाने या न पाने की ही अवस्थायें हैं। विद्या-
लय और महाविद्यालय में पढ़ने वाले छोटे बड़े छात्रों में जैसे
उच्च नीच भाव नहीं गिना जाता है । यही अवस्था इस संसार
रूपी महाविद्यालय के विद्यार्थी सब प्राणियों की है ।]
चित्रार्पितमनुष्याणां वस्त्राभासाः पृथक् पृथक् ।
चित्राधारेण वस्त्रेण सदृशा इव कल्पिताः ॥६॥
पृथक् पृथक् चिदाभासाश्चैतन्याध्यस्तदेहिनाम् ।
कल्प्यन्ते जीवनामानो बहुधा संसरन्त्यमी ॥७॥
[ यों तो चित्र में पर्वत, वृक्ष, मनुष्य आदि सभी होते हैं
परन्तु ] चित्र में जो मनुष्यशरीर होते हैं उस चित्र में केवल
उनके ही पृथक् पृथक् रंग विरंगे कपड़े, उस चित्र के आधार-
वस्त्र के समान दीखनेवाले बनाये जाते हैं [ उस चित्र में पर्व-
तादि के कपड़े नहीं बनाये जाते । चित्र के वे कपड़े भी कपड़े
नहीं होते । वे तो बनावटी कपड़े होते हैं। उन कपड़ों से किसी
के शीत आदि का निवारण नहीं होता ]। ठीक इसी प्रकार