संग्रह पर लौटें


चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३१
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पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३१
जराव्याधिप्रशमनं देहदाढर्यकरं परम् ।
मेधास्मृतिकरं बल्यं क्षीराशो तत्प्रयोजयेत् ॥ ५३ ॥
पूर्वोक्त विधि से लौह आदि धातुओं के बनाये चूर्ण के साथ शिलाजीत
मिलाकर दूध के साथ पीने से आरोग्ययुक्त दीर्घ आयु मिलती है । लोह आदि
जितने धातु आवश्यक हों उन सबों को मिलाकर या पृथक् २ रूप में शिलाजीत१
के साथ उपयोग करे । [ धातुओं की भस्म त्रिफला क्वाथ के साथ बनाने का
अष्टाङ्ग-सङ्ग्रह में उपदेश है ।। परन्तु रस शास्त्र के आधार से बनी भस्में अधिक
उपयोगी होंगी यह हमारी मान्यता है । ] शिलाजीत के प्रयोग के समय दूध का
ही सेवन करना चाहिये । इसके सेवन से बुढ़ापा और रोग मिटते हैं, शरीर
अतिशय दृढ़ होता है । मेधा और स्मृति बढ़ता है, बल भी बढ़ता है ॥५२-५३॥
प्रयोगः सप्त सप्ताहाद्य्रहश्चैकश्च सप्तकः ।
निर्दिष्टस्त्रिविधस्तस्य परो मध्योऽवरस्तथा ॥ ५४ ॥
पलमर्धपलं कर्षो मात्रा तस्य त्रिधा मता ।
शिलाजीत का प्रयोग तीन प्रकार का है । यथा—पर, मध्य और अवर ।
इनमें सात सप्ताह तक प्रयोग करना ‘पर’ प्रयोग, तीन सप्ताह तक प्रयोग करना
‘मध्यम’, और एक सप्ताह तक प्रयोग करना अवर प्रयोग है । इसी प्रकार
शिलाजतु की मात्रा भी तीन प्रकार की है । जैसे—उत्तम मात्रा एक पल,
मध्यम मात्रा आधा पल और अवर मात्रा एक कर्ष है । आजकल तो २ से ५
रत्ती की मात्रा उचित रहेगा ॥५४॥
जातेर्विशेषं सविधं तस्य वक्ष्याम्यतः परम् ॥ ५५ ॥
हेमाद्याः सूर्यसन्तप्ताः स्रवन्ति गिरिधातवः ।
जत्वाभं मृदु मृत्स्नाच्छं यन्मलं तच्छिलाजतु ॥ ५६ ॥
इसके आगे हम इस शिलाजतु का भिन्न २ जातिया कहते हैं—
ग्रीष्म काल में स्वर्ण आदि धातुओं वाली शिलाओं में से सूर्य की गरमी से
एक प्रकार का रस जो कि स्पर्श में लाख के समान होता है, (रंग में नहीं),
चूने लग जाता है, इसी काले से रंग को ‘शिलाजतु’ (शिलाजीत) कहते हैं ।
इसका रंग मिट्टी के समान होता है ॥५५-५६॥
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१ जैसा ‘संग्रह’ में कहा है—संस्कृत संस्कृत देहे प्रयुक्तं गिरिजाह्वयम् ।
युक्तं व्यस्तैः समस्तैर्वा ताम्रायोरूप्यहेमभिः ।
क्षारेणालोडितं शीघ्रं फलं कुर्याद् रसायनम् ॥
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२३२ चरकसंहिता [ अ० १
मधुरश्च सतिक्तश्च जपापुष्पनिभश्च यः ।
कटुर्विपाके शीतश्च स सुवर्णस्य निस्स्रवः ॥ ५७ ॥
रूप्यस्य कटुकः श्वेतः शीतः स्वादु विपच्यते ।
ताम्रस्य बर्हिकण्ठाभस्तिक्तोष्णः पच्यते कटु ॥ ५८ ॥
यस्तु गुग्गुलुकाभासस्तिक्तको लवणान्वितः ।
कटुर्विपाके शीतश्च सर्वश्रेष्ठः स चायसः ॥ ५९ ॥
गोमूत्रगन्धयः सर्वे सर्वकर्मसु यौगिकाः ।
रसायनप्रयोगेषु पश्चिमस्तु विशिष्यते ॥ ६० ॥
इनमें से स्वर्ण-शिलाजीत—तिक्तरसयुक्त मधुर, जपा ( जासुदी ) फूल के
समान लाल, विपाक में कटु, शीतवीर्य होता है ।
रौप्य ( चांदी की शिला से निकला ) शिलाजीत—कटु रस, रंग में श्वेत,
शीतवीर्य, विपाक में मधुर होता है ।
ताम्र ( ताँबे से निःसृत ) शिलाजीत—मोर की ग्रीवा के समान नीली
झाँई लिये, तिक्त रस, उष्णवीर्य और विपाक में कटु होता है ।
आयस ( लोह से निस्सृत ) शिलाजीत—गुग्गुल के समान काला, भूरा,
तिक्त रस, लवण अनुरस, विपाक में कटु, शीतवीर्य होता है । यह शिलाजतु
सब में श्रेष्ठ है ।
[ कहीं कहीं पर छः प्रकार के शिलाजतुओं का वर्णन है । वहाँ पर त्रपु
और सीसक भी गिना है । ]
इन सब शिलाजतु में गोमूत्र की गन्ध आती है, ये सब कार्यों में प्रयुक्त होते
हैं । परन्तु रसायन कार्य में अन्तिम, आयस शिलाजीत ही अधिक श्रेष्ठ है ॥५७-६०॥
यथाक्रमं वातपित्ते श्लेष्मपित्ते कफे त्रिषु ।
विशेषतः प्रशस्यन्ते मला हेमादिधातुजाः ॥ ६१ ॥
खास कर वात पित्त रोग में स्वर्ण शिलाजतु का, कफ-पित्त में रजत शिला-
जतु का, कफ में ताम्र शिलाजतु का और वात-पित्त-कफ में आयस शिलाजतु
का प्रयोग करना चाहिये ॥ ६१ ॥
शिलाजतुप्रयोगेषु विदाहीनि गुरूणि च ।
वर्जयेत्सर्वकालं तु कुलत्थान् १ परिवर्जयेत् ॥ ६२ ॥
ते ह्यत्यन्तविरुद्धत्वादश्मनो भेदनाः परम् ।
लोके दृष्टास्ततस्तेषां प्रयोगः प्रतिषिध्यते ॥ ६३ ॥
१ 'कुनत्थान्' इति च पाठः ।