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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ८ ] इन्द्रियस्थानम् १७१

अ० ८ ] इन्द्रियस्थानम् १७१
दन्तान् खादति यो जाग्रदसान्ना विरुदन् हसन् ।
विजानाति न चेद् दुःखं न स रोगाद्विमुच्यते ॥ १६ ॥
मुहुर्हसन्मुहुः श्वेडङ्खट्यां पादेन हन्ति यः ।
उच्चैश्छिद्राणि विमृशन्नातुरो न स जीवति ॥ २० ॥
( १६ ) जो रोगी दांतों से नखो को काटता है, और नखों से बालों को
नोचता है और लकडी से भूमि पर कुरेदता है, वह रोगी रोग से नहीं बच
सकता । ( १७ ) जो रोगी जागता हुवा दांतों को कट कटाता है और वेमत-
लब जोर से रोता या हँसता हुआ दुःख का अनुभव नहीं करता, वह रोग से
मुक्त नहीं होता । (१८) जो रोगी क्षण मे हसता, क्षण मे रोता, बकवाद करता
है, पलंग पर पाव पटकता है, हाथों को ऊंचा करके नाक, कान, आख के
छिद्रों को स्पर्श करता है वह रोगी नहीं बचता ॥ १८–२० ॥
यैर्विन्दति पुरा भावै समेतैः परमा रतिम् ।
तैरेवारममाणस्य ग्लानोर्मरणमादिशेत् ॥ २१ ॥
( १९ ) जिन वस्तुओं से पहिले रोगी का विशेष प्रेम हो और पीछे उन्हीं
पदार्थों से वह द्वेष, घृणा प्रकट करते ऐसे रोगी की मृत्यु ही हुई बतलावे ॥२१॥
न बिभर्ति शिरोग्रीव न पृष्ठं भारमात्मन ।
न हनू पिण्डमास्यस्थमातुरस्य मुमूर्षतः ॥ २२ ॥
( २० ) जो रोगी अपनी गर्दन या शिर को, अथवा अपनी पीठ के भार
को न सम्भाल सके, जो मुख में स्थित ग्रास को जबड़ों मे न सम्भाल सकें,
( जबड़े खुले रहे ), वह रोगी नही बचता ॥ २२ ॥
सहसा ज्वरसन्तापस्तृष्णा मूर्च्छा बलक्षयः ।
विश्लेषणं च संधीना मुमूर्षोरुपजायते ॥ २३ ॥
गोसर्गे वदनाद्यस्य स्वेदः प्रचयवते भृशम् ।
लेपज्वरोपतप्तस्य दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ २४ ॥
( २१ ) मरणासन्न रोगी को एक दम से ज्वर, सन्ताप, प्यास, मूर्च्छा,
बलनाश, अर्थात् सन्धिया शिथिल हो जाती हैं । ( २२ ) लेप ज्वर ( प्रलेपक
ज्वर ), थोड़ी सी सर्दी से कफ ज्वर हो के रोगी के मुख पर यदि प्रातः काल के
समय बहुत पसीना आये, तो उसका बचना असम्भव है ॥ २४ ॥
नोपैति कण्ठमाहारो जिह्वा कण्ठमुपैति च ।
आयुष्यन्तं गते जन्तोर्बल च परिहीयते ॥ २५ ॥
( २३ ) जिस रोगी की आयु समाप्त हो जाती है, उसके गले में पहुचा

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हुआ भोजन भी नीचे नहीं उतरता, और जीभ कण्ठभाग में आ लगती है तथा
बल नष्ट हो जाता है ॥ २५ ॥
शिरो विक्षिप्तते कृच्छ्रान्मुञ्चयित्वा प्रपाणिकौ ।
ललाटप्रस्रुतस्वेदो मुमूर्षुश्च्युतबन्धनः ॥ २६ ॥
( २४ ) जो रोगी बड़े कष्ट से पीड़ित होकर अपने दोनों कलाईयों या कोह-
नियों को छोड़कर शिर को इतना धुनता-पटकता है कि माथे से पसीना टपकने
लगे और सन्धिबन्ध ढील पड़ जायें वह रोगी मरने वाला होता है ॥ २६ ॥
तत्र श्लोकः ।
इमानि लिङ्गानि नरेषु बुद्धिमान्विभावयेतावहितो मुहुर्मुहुः ।
क्षणेन भूत्वा ह्युपयान्ति कानिचिन्न चाफल लिङ्गमहास्ति किंचन ॥२७॥
बुद्धिमान् मनुष्य को मरणोन्मुख रोगियों में होने वाले लक्षण खूब ध्यान से
देखने चाहियें । क्योंकि कितने लक्षण क्षणभर मे उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं,
इस प्रकरण में कहा एक भी लक्षण निष्फल नहीं ॥ २७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने अवाक्शिरसीय-
मिन्द्रिय नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः
अथातो यस्य श्यावानिमित्तीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'श्याव-निमित्तीय' नामक इन्द्रिय-अध्याय का व्याख्यान करेंगे
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
यस्य श्यावे परिध्वस्ते हर्रिते चापि दर्शने ।
आपन्नो व्याधिरन्ताय ज्ञेयस्तस्य विजानता ॥ ३ ॥
( १ ) जिस रोगी की दोनों आखें काली, लाल रग की, नष्टप्राय, हरे रग
की हो जाये विद्वान् वैद्य उस रोगी की व्याधि प्राण नाश के लिये जाने ॥ ३ ॥
निःसंज्ञः परिशुष्कास्यः संविद्धो व्याधिभिश्च यः ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ ४ ॥
हरिताश्च सिरा यस्य लोमकूपाश्च संवृताः ।
सोऽम्लाभिलाषी पुरुषः पित्तान्मरणमश्नुते ॥ ५ ॥