चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८६
अ० ६ ] शारीरस्थानम् ८६
मानोपदेशाश्चाप्रमाणानि स्युर्ये प्रमाणभूताः सर्वतन्त्रेषु, यैरायुष्यानायु-
ष्याणि चोपलभ्यन्ते । वाग्वस्तुमात्रमेतद्वादृषयो मन्यन्ते यदुच्यते—
नाकालमृत्युरस्तीति ॥ २५ ॥
यह भी पक्ष ठीक नहीं है। बिना काल के कोई नहीं मरता, इसलिये काल समान
क्रियावाला है। ऐसा कहना ठीक नही, क्योंकि यहां पर ‘काल’ शब्द आयु के
प्रमाण की अपेक्षा से कहा है। जो यह मानता है कि जो मनुष्य जब मरता है
वही उसका नियत मृत्युकाल है, उसके मत में मृत्यु से अतिरिक्त आहार, वचन
आदि भी सब नियत कालवाले हो जायेगे। परन्तु ये ऐसे नहीं होते, क्योंकि
यह प्रत्यक्ष है कि अकाल में किये भोजन तथा अकाल में कहे हुए वचन का फल
बुरा होता है और समय पर किये भोजन तथा समय पर कहे वचन का फल
अच्छा होता है और यह भी हम देखते है कि प्रत्येक अवस्था में काल और
अकाल का विचार करते हैं। जैसे—यह इस रोग का समय है, यह आहार
का समय है, यह औषध का समय है, यह प्रतिकर्म का काल है, यह विसर्ग
काल है। इसी प्रकार यह रोग का, भोजन का, औषध का, प्रतिकर्म का और
विसर्ग का समय नहीं है। लोक में भी ऐसा होता है। समय पर मेघ बरसता
है, अकाल में भी बादल बरसता है। काल में शीत और अकाल में भी शीत
होता है। काल में सूर्य तपता हे और अकाल में भी सूर्य तपता है। काल में
फूल फल होते हैं और अकाल में भी फूल फल होते हैं। इसलिये दोनों ही बाते
है, काल में भी मृत्यु है और अकाल में भी मृत्यु है एक ही बात ठीक नहीं
है। यदि अकाल में मृत्यु न हो तो सब पुरुषों की आयु का समय और मान
नियत होना चाहिये। इस प्रकार होने से हित अहित का ज्ञान निष्फल हो जाता
है। प्रत्यक्ष अनुमान, आप्तोपदेश जा कि सब तन्त्रों में प्रमाणभूत हैं वे सब
तथा आयुष्यकारक और अनायुष्यकारक सब बातें व्यर्थ हो जायेगी। ‘अकाल
मृत्यु नहीं है’ इस कथन को ऋषि लोग केवल कहने भर के लिये ही मानते हैं,
वास्तव में इसमें कुछ सार या सत्यता नही है ॥ २५ ॥
वर्षशतं खल्वायुषः प्रमाणमस्मिन् काले ॥ २६ ॥
तस्य निमित्तं प्रकृतिगुणात्मसम्पत्सात्म्योपसेवनं चेति ॥ २७ ॥
इस कलियुग में आयु का परिमाण सो साल है। इसका कारण उत्तम
प्रकृति, उत्तम गुण, उत्तम आत्मा और उत्तम सात्म्य का सेवन है। [उत्तम
प्रकृति जैसे—सम वात आदि प्रकृति का होना, उत्तम गुण जैसे—सार-सहनन
आदि का होना, उत्तम आत्मा के धर्म, दान, यज्ञ आदि] ॥ २६-२७ ॥
६० चरकसंहिता [ अ० ७
तत्र श्लोकाः—शरीरं यद्यथा तच्च वर्तते क्लिन्नमामयैः ।
यथा क्लेशं विनाशं च याति ये चास्य धातवः ॥ २८ ॥
वृद्धिह्रासौ यथा तेषां क्षीणानामौषधं च यत् ।
देहवृद्धिकरा भावा बलवृद्धिकराश्च ये ॥ २९ ॥
परिणामकरा भावा या च तेषां पृथक् क्रिया ।
मलाख्याः संप्रसादाख्या धातवः प्रश्न एव च ॥ ३० ॥
नवको निर्णयश्चास्य विधिवत्संप्रकाशितः ।
तथ्यः शरीरविचये शारीरे परमर्षिणा ॥ ३१ ॥
शरीर जिस प्रकार से रहता है, जिस प्रकार से क्लेश या विनाश को प्राप्त
होता है, शरीर के धातु, इन धातुओं की वृद्धि और ह्रास क्षीण धातुओं का
औषध, देह की वृद्धि करनेवाले और बल को बढ़ाने वाले कारण, परिणाम-
कारक भाव, इनकी पृथक् पृथक् क्रिया, मल और प्रसाद रूप धातु, नव प्रश्न
तथा इन प्रश्नों का समुचित निर्णय 'शरीर विचय' नामक अध्याय में परमर्षि
आत्रेय ने प्रकाशित किया है ॥ २८-३१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरविचय-
शारीरं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः ।
अथातः शरीरसंख्याशारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'शरीरसंख्या' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
शरीरसंख्यामवयवशः (कृत्स्नं) शरीरं प्रविभज्य सर्व-शरीर-
संख्यान-प्रमाण-ज्ञान-हेतोर्भगवन्तमात्रेयमग्निवेशः पप्रच्छ ॥ ३ ॥
अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से सम्पूर्ण शरीर की संख्या, परिमाण और
नाम आदि ज्ञान करने के लिये अवयव रूप में शरीर का विभाग करके शरीर
संख्या नाम शारीर प्रकरण के सम्बन्ध में प्रश्न किया—
तमुवाच भगवानात्रेयः—शृणु मत्तोऽग्निवेश ! सर्वशरीरमभिवक्षा-
णायथाप्रश्नमेकमना यथावत् ॥ ४ ॥