चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८३
अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ३८३
( ७ ) लोध्रासव—लोध्र, कचूर, पोहकरमूल, छोटी इलायची, मूर्वा मूल,
बायविडंग, त्रिफला, अजवायन, चविका, फल प्रियंगु, क्रमुक (सुपारी या पट्टिका
लोध्र), इन्द्रायण, चिरायता, कुटकी, भार्गी, तगर, चीतामूल, पिप्पलीमूल, कूठ,
अतीस, पाठा, इन्द्रजा, नागकेसर, इन्द्रसाह्वा ( छोटी इन्द्रायण ), नखी, तेज-
पत्र, कालीमिर्च, प्लव ( केवटी मोथा ) प्रत्येक वस्तु १ कर्ष लेकर दो द्रोण
पानी में क्वाथ करे। चतुर्थांश ( ( २ आढक ) रहने पर छान ले। इसमें एक
आढक मधु मिला कर घी से भावित पात्र में डाल कर पन्द्रह दिना तक सन्धान
करके रख दे। मात्रा—दो पल है, यह लोध्रासव कफजन्य, पित्तजन्य प्रमेहो का,
पाण्डुरोग, अर्श अरुचि, ग्रहणीरोग, किलास और नाना प्रकार के कुष्ठ का
नष्ट करता हे ॥४१-४४॥
क्वाथः स एवाष्टपले च दन्त्या भल्लातकानां च चतुष्पलं स्यात् ।
सितोपला त्वष्टपला विशेषः क्षौद्रं च तावत्पृथगासवौ तौ ॥ ४५ ॥
( ८) दन्त्यासव—पूर्वोक्त लोध्रासव के क्वाथ में दन्तीमूल के आठ पल,
मिसरी ८ पल, शहद क्वाथ से आधा ( १ आढक ) मिला कर रखे। यह
दन्त्यासव है। ( ६ ) भल्लातकासव—लोध्रासवोक्त क्वाथ आधा द्रोण, विशुद्ध
भिलावा का चूर्ण ४ पल, मिसरी ८ पल, शहद क्वाथ से आधा डाल कर
सन्धान करे। ये दोनो आसव कफजन्य और पित्तजन्य प्रमेहा को नष्ट
करते है ॥ ४५ ॥
सारोदकं वाथ कुशोदकं वा मधूदकं वा त्रिफलारस वा।
शीधु पिबेद्वा निगदं प्रमेही माध्वीकमग्र्यं चिरसंस्थितं वा ॥४६॥
( १० ) षडगपानीय विधि से खैर की लकडी का सावित जल, कुशा
मूल का जल ( क्वाथ ), शहद का शरबत, त्रिफला का क्वाथ या रस, दोष
रहित शीधु ( जौ का मद्य ), या पुरातन श्रेष्ठ माध्वोक ( मधु या द्राक्षा आदि
से बना मद्य ) पीवे ॥ ४६ ॥
मांसानि शूल्यानि मृगद्विजानां खादेद्यवानां विविधांश्च भक्ष्यान् ।
संशोधनाविष्टकषायलेहैः सन्तर्पणोत्थान् १ शमयेत्प्रमेहान् ॥४७॥
भृष्टान् यवान् भक्षयतः प्रयोगाच्छुष्कांश्च सक्तून्न भवन्ति मेहाः ।
श्वित्रं च कुष्ठं च कफ च कृच्छ्रं तथैव मुद्गामलकप्रयोगात् ॥४८॥
सन्तर्पणोत्थेषु गदेषु योगा मेदस्विना ये च मयोपदिष्टाः ।
विरूक्षणार्थं कफपित्तजेषु सिद्धाः प्रमेहेष्वपि ते प्रयोज्याः ॥४९॥
१ सतर्पणज्ञ इति च पाठः ।
३८४ चरकसंहिता [अ० ६
व्यायामयोगैर्विविधैः प्रगाढैरुद्वर्तनैः स्नानजलावसेकैः।
सेव्यत्वगेलागुरुचन्दनाद्यैर्विलेपनैश्चाशु न सन्ति मेहाः ॥५०॥
क्लेदश्च मेदश्च कफश्च वृद्धः प्रमेहहेतुः१ प्रसमीक्ष्य तस्मात् ।
वैद्येन पूर्वं कफपित्तजेषु मेहेषु कार्याण्यपतर्पणानि ॥ ५१ ॥
या वातमेहान्प्रति पूर्वमुक्ता वातोल्बणाना विहिता क्रिया सा ।
वायुर्हि मेहेष्वतिकर्पिताना कुर्यात्यसाध्यान् प्रति नास्ति चिन्ता॥५२॥
येर्हेतुभिर्ये प्रभवन्ति मेहास्तेषु प्रमेहेषु न ते निषेव्याः ।
हेतोरसेवा विहिता यथैव जातस्य रोगस्य भवेच्चिकित्सा ॥ ५३ ॥
(१०) पशु-पक्षियो के शलाका पर भुने मास, जो से बने नाना प्रकार के
भक्ष्य पदार्थ खावे । रुतर्पण से उत्पन्न प्रमेहो का सशोधन, अरिष्ट, कषाय,
अवलेहो द्वारा शान्त करे ।
(११) भुने हुए जौ को, सूखे सत्तूओ का, मूग ओर आवलो के
आहार को नित्य खाने से प्रमेह, श्वित्र, कुष्ठ, कफ रोग ओर मूत्रकृच्छू नही
होते । (१२) सन्तर्पण से उत्पन्न रोगो मे तथा मेदस्वी पुरुषो के लिये विरूक्षण
योग जो पहिले सन्तर्पणीय अध्याय मे तथा 'अष्टौ-निन्दिताय' अध्याय मे कहे है,
उनका कफज ओर पित्तज प्रमेहो मे प्रयोग करे । (१३) नाना प्रकार की
व्यायामों से, बलपूर्वक मर्दन से, स्नानजल के परिषेक से, खस, दालचीनी,
इलायची, अगरु, चन्दन आदि के लेपन से प्रमेह नष्ट होते है। (१४) प्रवृद्ध
क्लेद, मेद और कफ प्रमेह के कारण है, इसलिये वैद्य को चाहिये कि कफ-पि-
त्तज प्रमेहो मे अपतर्पण करे । (१५) वात-प्रमेहो की जो चिकित्सा प्रथम कही
है, वही चिकित्सा वाताल्बण प्रमेही की होनी चाहिये । क्योकि प्रमेहो मे अत्य-
धिक कर्षण होने से वायु प्रकुपित हो जाती है, इसलिये ये वाताल्बण है।
असाध्य वातजन्य प्रमेहो का चिकित्साविधि मे विचार करना व्यर्थ है ।
(१६) जिन जिन कारणों से प्रमेह उत्पन्न होता है, प्रमेही को चाहिये
कि उनका सेवन न करे । जैसे—स्वस्थ पुरुषो मे रोगोत्पत्ति के कारणों को
सेवन न करने का विधान है उसी प्रकार यहा भी कारणों को सेवन न करना
ही चिकित्सा है ॥ ४७-५३ ॥
हारिद्रवर्णं रुधिरं च मूत्रं विना प्रमेहस्य हि पूर्वरूपैः ।
यो मूत्रयेत्तं न वदेत्प्रमेहं रक्तस्य पित्तस्य हि स प्रकोपः ॥५४॥
१ 'नाशं प्रयाति' इति च पाठ ।