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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् ३०३

अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् ३०३
बेर, पृश्निपर्णी, और शालपर्णी इनसे साधित यवागू मे विल्व के चूर्ण का प्रक्षेप
डाल कर पीवे ।
(६) जिस ज्वर मे रोगी का नींद और पसीना न आता हा, तथा प्यास
लगती हो उसको सेंठ, आवले से साधित घी मे भूनी पेया को शर्करा डालकर
देना चाहिये । यह पेया ज्वरनाशक हे । [ यवागू-पाक की पाक-विधि देश लोक
मे प्रसिद्ध व्यवहार से देखनी चाहिये । तीक्ष्ण वीर्य द्रव्या से आधा कर्ष, मृदु
द्रव्यो से एक पल लेना, मध्यम वीर्य द्रव्यो का दो कर्ष लेना चाहिये । यह रस-
प्रधान द्रव्यो की विधि है । क्वाथ द्रव्य ४ पल, जल २ आढक, चतुर्थांश
बचाना चाहिये । ] ॥ १७८-१८८ ॥
मुद्गांन्मसूरांश्चणकान् कुलत्थान् समकुष्ठकान् ।
यूषार्थे यूषसात्म्याना ज्वरिताना प्रकल्पयेत् ॥ १८६ ॥
ज्वर मे जिन पुरुषा का यूष सात्म्य ( अनुकूल ) हो, उनके यूष के लिये
मूग, मसूर, चने, कुलत्थी आर मोठ इनका उपयोग करना चाहिये ॥ १८६ ॥
पटोलपत्र सफलं कुलक पापचेलिकाम् ।
कर्कोटकं कठिल्ल च विद्याच्छाक ज्वरे हितम् ॥१६० ॥
ज्वर रोगी के शाक के लिये परवल के पत्ते, परवल का फल, कुलक ( पर-
वल भेद, या करेला ), पापचेलिका ( पाठा ), कर्कोटक ( ककोड़ा ), कठिल्लक
( लाल पुनर्नवा ) देना चाहिये । इनका शाक हितकारी है ॥ १६० ॥
लावान् कपिञ्जलानेणांश्चकोरानुपचक्रकान् ।
कुरङ्गान कालपुच्छांश्च हरिणान्पृषतान् शशान् ॥ १६१ ॥
कुक्कुटांश्च मयूरांश्च तित्तिरिक्रौञ्चवर्तकान् ।
प्रदद्यान्माससात्म्याय ज्वरिताय ज्वरापहान् ॥ १६२ ॥
ईषदम्लाननम्लान्वा रसान् काले विचक्षणः ।
गुरूष्णत्वान्न शसन्ति ज्वरे केचिच्चिकित्सकाः ॥ १६३ ॥
लंघनेनानिलबलं ज्वरे यद्यधिकं भवेत् ।
भिषग् मात्रविकल्पज्ञो दद्यात्तानपि कालवित् ॥ १६४ ॥
जिस ज्वर के रोगी को मास रस का सात्म्य ( अनुकूलता ) हो उसके लिये-
बटेर, कपिंजल (श्वेत तीतर ), एण ( काला हरिण ), चकार, उपचक्रक ( चकोर
का भेद ), कुरग, कालपुच्छ, हरिण और पृषत ( हरिण भेद ) और खरगोश
इनके मास से रस बनाकर देना चाहिये । इस मास रस को अनार के रस आदि
से खट्टा करके या बिना खट्टा बनाये देना चाहिये । यह मास रस ज्वरनाशक
है । कई चिकित्सको की सम्मति हे कि मुर्गा, मोर, तीतर, क्रौंच, बत्तक पक्षियो

३०४ चरकसंहिता [ अ० ३
का मांस गुरु और उष्ण है, इसलिये इनका उपयोग ज्वर मे नही करना चाहिये।
परन्तु यदि ज्वर मे उपवास के कारण वायु का बल प्रबल हो जाये तो मात्रा
और विकल्पो को जानने वाले वैद्यको चाहिये कि इनका भी प्रयोग करे ॥१६४॥
घर्माम्बु चानुपानार्थं तृषिताय प्रदापयेत् ।
मद्यं वा मद्यसात्म्याय यथादोषं यथाबलम् ॥ १६५ ॥
गुरूष्णस्निग्धमधुरकषायांश्च नवज्वरे ।
ज्वर मे प्यास लगने पर उपरोक्त आहार के अनुपान मे गरम पानी देना
चाहिये। जिस रोगी को मद्य-सात्म्य हो, उसका दोष और बल के अनुसार मद्य
देना चाहिये ॥ १६५ ॥
आहारान् दोषपक्त्यर्थं प्रायशः परिवर्जयेत् ॥ १६६ ॥
अनुपानक्रमः सिद्धो ज्वरघ्नः संप्रकाशितः ।
नवज्वर (तरुण ज्वर) मे दोषो के पाचन के लिये गुरु, उष्ण, स्निग्ध, मधुर
और कषाय रस वाले भोजनो का प्राय करके त्याग कर देना चाहिये । इस प्रकार
से ज्वरनाशक और फलप्रद अनुपान क्रम कह दिया ॥ १६६ ॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यन्ते कषाया ज्वरनाशनाः ॥ १६७ ॥
पाक्यं शीतकषायं वा मुस्तपर्पटकं पिबेत् ।
सनागरं पर्पटकं पिबेद्वा सदुरालभम् ॥ १६८ ॥
किराततिक्तकं मुस्तं गुडूचीं विश्वभेषजम् ।
पाठामुशीरं सोदीच्यं पिबेद्वा ज्वरशान्तये ॥ १६६ ॥
ज्वरघ्ना दीपनाश्चैते कषाया दोषपाचनाः ।
तृष्णाऽरुचिप्रशमना मुखवैरस्यनाशनाः ॥ २०० ॥
पटोलं सारिवां मुस्तं पाठां कटुकरोहिणीं ।
कलिङ्गकाः पटोलस्य पत्रं कटुकरोहिणी ॥ २०१ ॥
निम्बः पटोलस्त्रिफला मृद्वीका मुस्तवत्सकौ ।
किराततिक्तममृता चन्दनं विश्वभेषजम् ॥ २०२ ॥
गुडूच्यामलकं मुस्तमर्धश्लोकसमापनाः ।
कषायाः शमयन्त्याशु पञ्च पञ्चविधाञ्ज्वरान् ॥ २०३ ॥
सन्ततं सततमन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् ।
वत्सकारग्वधं पाठां षड्ग्रन्थां कटुरोहिणीम् ॥ २०४ ॥
मूर्वां सातिविषां निम्बं पटोलं धन्वयासकम् ।
वचां मुस्तमुशीराणि मधुकं त्रिफलां बलाम् ॥ २०५ ॥