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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ३ ] चिकित्सतस्थानम् २८७

अ० ३ ] चिकित्सतस्थानम् २८७
भ्रमः पिपासा दाहश्च गौरवं शिरसोऽतिरुक् ॥ ९१ ॥
वातपित्तोल्बणे विद्याल्लिङ्गं मन्दकफे ज्वरे ।
शैत्यं कासोऽरुचिस्तन्द्रा पिपासा दाहरुग्व्यथाः ॥ ९२ ॥
वातश्लेष्मोल्बणे व्याधौ लिङ्गं पित्तावरे विदुः ।
छर्दिः शैत्यं मुहुर्दाहस्तृष्णा मोहोऽस्थिवेदना ॥ ९३ ॥
मन्दवाते व्यवस्यन्ते लिङ्गं पित्तकफोल्बणे ।
सन्ध्यस्थिशिरसः शूलं प्रलापो गौरवं भ्रमः ॥ ९४ ॥
वातोल्बणे स्याद्द्व्यनुगे तृष्णा कण्ठास्यशोषता ।
रक्तविण्मूत्रता दाहः स्वेदस्तृड्बलसंक्षयः ॥ ९५ ॥
मूर्च्छा चेति त्रिदोषे स्याल्लिङ्गं पित्ते गरीयसि ।
आलस्यारुचिहृल्लासदाहवम्यरतिभ्रमैः ॥ ९६ ॥
कफोल्बणं सन्निपातं तन्द्राकासेन चादिशेत् ।
प्रतिश्या छर्दिरालस्यं तन्द्राऽरुच्यग्निमार्दवम् ॥ ९७ ॥
हीनवाते पित्तमध्ये चिह्नं श्लेष्माधिके मतम् ।
हारिद्रमूत्रनेत्रत्वं दाहस्तृष्णा भ्रमोऽरुचिः ॥ ९८ ॥
हीनवाते मध्यकफे लिङ्गं पित्ताधिके मतम् ।
शिरोरुग्वेपथुः श्वासः प्रलापश्च्छर्द्यरोचकौ ॥ ९९ ॥
हीनपित्ते मध्यकफे लिङ्गं वाताधिके मतम् ।
शीतको गौरवं तन्द्रा प्रलापोऽस्थिशिरोतिरुक् ॥ १०० ॥
हीनपित्ते वातमध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके विदुः ।
श्वासकासप्रतिश्याया मुखशोषोऽतिपार्श्वरुकू ॥ १०१ ॥
कफहीने पित्तमध्ये लिङ्गं वाताधिके मतम् ।
पर्वभेदोऽग्निमान्द्य च तृष्णा दाहोऽरुचिर्भ्रमः ॥ १०२ ॥
कफहीने वातमध्ये लिङ्गं पित्ताधिके विदुः ।
प्रथम सूत्ररूप में कहे तेरह प्रकार के सन्निपात ज्वर के लक्षण पृथक् पृथक् कहूँगा।
(१) वात-पित्त प्रधान और मन्दकफ ज्वर के लक्षण—भ्रम, प्यास, दाह,
भारीपन, शिर में अधिक वेदना होती है । ( २ ) वात-कफ प्रधान और हीनपित्त
ज्वर में—शीत लगना, खासी, अरुचि, तन्द्रा, प्यास, दाह, पीड़ा, व्यथा होती,
१. 'वमिदाहतृषाभ्रमैः' इति च पाठः ।
२. 'ऽग्निदौर्बल्यं' इति च पाठः ।

२८८ चरकसंहिता [अ० ३
है। (३) पित्त कफ प्रधान हीनवात ज्वर में—वमन, शीत लगना, बार बार
दाह, प्यास, मूर्च्छा, अस्थियों में वेदना होती है। (४) वातप्रधान, हीनपित्त-
कफ ज्वर में—सन्धियों में तथा अस्थियों में और शिर में वेदना, प्रलाप, भारी
होना, भ्रम, प्यास, कण्ठ और मुख का सूखना होता है। (५) पित्तप्रधान हीन
कफ-वात ज्वर मे--मल और मूत्र में रक्तिमा (रक्त का सा लाल वर्ण ), जलन,
पसीना, प्यास, निर्बलता, मूर्च्छा होती है। (६) कफ प्रधान हीन पित्तवात में—
आलस्य, अरुचि, हृल्लास (जी मचलाना), जलन, वमन, बेचैनी, चक्कर आना,
तन्द्रा और कास होता है। (७) कफप्रधान पित्त मध्य, वात हीन सन्निपात मे—
प्रतिश्याय, वमन, आलस्य, तन्द्रा, अरुचि मन्दाग्नि होती है। (८) पित्तप्रधान,
मध्य कफ और हीन वात में—मूत्र और आख का हल्दी के समान पीला वर्ण,
जलन, प्यास, भ्रम, अरुचि होती है। (६) वात प्रधान, मध्य कफ और हीन
पित्त में—शिर में वेदना, कम्पन, श्वास का तेज चलना, प्रलाप, वमन और
अरुचि होती है। (१०) कफप्रधान, वात मध्य और हीन पित्त में—शीत का
लगना, भारीपन, तन्द्रा, प्रलाप, अस्थियों और शिर में अति वेदना होती है।
(११) वात प्रधान, पित्त मध्य और कफ हीन सन्निपात मे—श्वास, कास,
प्रतिश्याय, (जुकाम), मुख का सूखना और पसलियों में अति वेदना होती है।
(१२) पित्त प्रधान, वात मध्य हीन कफ मे—जोड़ों में फूटन की सी पीड़ा,
मन्दाग्नि, प्यास, दाह, अरुचि और चक्कर आता है। [ भालूकि तंत्र से सन्नि-
पात ज्वरों के लक्षण तथा नाम भिन्न २ दिये हैं। जैसे—वात पित्ताधिक सन्नि-
पात 'विभु' पित्त श्लेष्माधिक सन्निपात फल्गु, कफवाताधिक सन्निपात मकरी,
वाताधिक सन्निपात 'विस्फारक', पित्ताधिक सन्निपात 'शीघ्रकारी और कफाधिक
सन्निपात 'उल्बण' कहाता है ।
कुछ आचार्य इन लक्षण। क प्रकृतिसम अवाय के लक्षण होने से इस
पाठ को अनाषे मानते हैं। अन्य स्थानों मे यह पाठ नहीं है ]॥ ६०-१०२॥
सन्निपातज्वरस्योर्ध्वमतो वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ १०३ ॥
क्षणे दाहः क्षणे शीत मस्थिसन्धिशिरोरुजा ।
सास्रावे कलुषे रक्ते निर्भुग्ने चापि दर्शने ॥ १०४ ॥
सस्वनौ सरुजौ कर्णौ कण्ठः शूकरिवावृत ।
तन्द्रा मोहः प्रलापश्च कासः श्वासोऽरुचिर्भ्रमः ॥ १०५ ॥
परिदग्धा खरस्पर्शा जिह्वा स्रस्ताङ्गता परम् ।
ष्ठीवनं रक्तपित्तस्य कफेनोन्मिश्रितस्य च ॥ १०६ ॥