चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ६०७
अ० १५ ] चिकित्सास्थानम् ६०७
स्वर्जिकायावशूकाख्यौ क्षारौ दत्त्वा च युक्तितः ॥ ८४ ॥
सैन्धवौद्भिदसामुद्रबिडाना रोमकस्य च ।
ससौवर्चलपाक्याना भागान्द्विपलिकान्पृथक् ॥ ८५ ॥
विनीय चूर्णितान् सिद्धात्ततो द्वे द्वे पले पिबेत् ।
करोत्यग्निबलं वर्णं वातघ्नं भुक्तपाचनम् ॥ ८६ ॥
इति दशमूलाद्यं घृतम् ।
(८) दशमूलाद्य घृत—क्वाथार्थ, दोनो पञ्चमूल (बिल्व की छाल, अरणी
का छाल, सोनापाठा की छाल, गम्भारी की छाल, पाढल की छाल, छोटी कटेरी,
बड़ी कटेरी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, गोखरू), सरल काष्ठ, देवदारु, सोंठ,
पिप्पली, पिप्पलीमूल, गजपिप्पली, सन के बीज, जौ, बेर, कुलत्थी, सुरभी
(रास्ना) ये मिलित द्रव्य १६ पल, आरनाल (काजी) या दही (दही का
मस्तु) अथवा सौवीरक काजी इनमे से कोई एक १२८ पल लेकर क्वाथ करना
चाहिये। जब चतुर्थांश शेष रह जाये तब गाय का घृत एक आढक लेकर घृत
सिद्ध करना चाहिये। जब घृत सिद्ध होने के लगभग हो तो इसमे सर्जक्षार और
यवक्षार का थोड़ी मात्रा मे प्रक्षेप देना चाहिये। फिर सैन्धा नमक, उद्भेद
नमक, सामुद्र नमक, बिड् नमक, रोमक (साभर) नमक, सचल नमक, पाक्य
(पांशुज) नमक, प्रत्येक का दो दो पल चूर्ण लेकर इसमे मिला देना चाहिये।
इसमे से दो दो पल घृत पीना चाहिये। यह घृत अग्नि, बल और वर्ण को
बढाता है, वायु को नष्ट करता है और खाये हुए आहार को पचाता है १।
नमक आदि को कल्क रूप मे प्रक्षेप करके भी घृतपाक किया जा सकता
है और विशेषतया गुण भी इसी विधि से पाक करने मे आता है। इसलिये
कल्क रूप मे इनका प्रक्षेप देना चाहिये ॥ ८२-८६ ॥
त्र्यूषणत्रिफलाकल्के बिल्वमात्रे गुडात्पले ।
सर्पिषोऽष्टपलं पक्त्वा मात्रा मन्दानिलः पिबेत् ॥ ८७ ॥
इति त्र्यूषणाद्यं घृतम् ।
१. जतुकर्ण ने सर्जक्षार और यवक्षार की मात्रा दो दो पल कही है।
द्वौ क्षारौ सप्त लवण दापयेद् द्विपलोन्मितम् ॥
अष्टाग-संग्रह मे यह पाठ थोड़े अन्तर से है। यथा—
'द्विपञ्चमूलपञ्चकोलसरलसुरदारुसुरभिगजपिप्पलीशणबीजकोलकुलत्थान्मस्तुना-
रनालेन वा पाचयेत् । तेन पादावशेषेण पञ्चलवणद्विक्षाराम्लबदरयुक्तं
सर्पिर्विपक्वम्।'
६०८ चरकसंहिता [ अ० १५
(६) त्र्यूषणाद्य घृत--त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पिप्पली) और त्रिफला
(हरड़, बहेड़ा, आवला) मिलित एक पल, गुड़ १ पल इस कल्क से गाय
का घृत ८ पल लेकर यथाविधि पाक करना चाहिये । इ० घृत को उचित मात्रा
मे (आधा ताला) मन्दानि वाले रोगी को पीना चाहिये ॥ ८७ ॥
पञ्चमूलाभयाजाजीपिप्पलीमूलसैन्धवैः ।
विडङ्गरद्व्यूपणशटीरास्नाक्षारद्वयैर्घृतम् ॥ ८८ ॥
शुक्तन मातुलुङ्गस्य स्वरसेनाईकस्य च ।
शुष्कमूलककोलाम्बुचुक्रिकादाडिमस्य च ॥ ८६ ॥
तक्रमस्तुसुरामण्डसौवीरकतुषोदकैः ।
काञ्जिकेन च तत्पक्वमग्निदीप्तिकरं परम् ॥ ६० ॥
शूलगुल्मोदरश्वासकासानिलकफापहम् ।
(१०) पचमूलाद्य चूर्ण--पचमूल (बेल की छाल, सोनापाठा की छाल,
अरणी की छाल, गम्हारी की छाल, पाढल की छाल), अभया (हरड़), व्योष
^(सोंठ, मरिच, पिप्पली), वायविडंग, शटी ये दस द्रव्य, शुक्त, मातुलुग
(गलगल, बडा नीबू) का स्वरस ओर आर्द्रक का स्वरस ये तीन द्रव, ये सब
द्रव्य अलग अलग घृत के समान भाग मे लेने चाहिये । सूखी हुई मूली, बेर,
नागरमोथा, चुक्रिका (चांगेरी) ओर अनार, तक्र, मस्तु, सुरामण्ड, सौवीरक,
काजी, तुषोदक और काजी इनसे घृत पाक करना चाहिये । इस पाकविधि मे
पचमूलादि दस द्रव्यो को ओर मूली, बेर, नागरमोथा इनको कल्क के रूप मे
बरतना चाहिये । यह घृत खूब अग्निवर्धक है । शूल, गुल्म, उदररोग, श्वास,
कास, वायु ओर कफ को नष्ट करता है ।। ८८-६० ।।
सबीजपूरकरसं सिद्धं वा पाययेद् घृतम् ॥ ६१ ॥
सिद्धमभ्यञ्जनार्थं च तैलमेतैः प्रयोजयेत् ।
(११) अथवा बिजौरे के स्वरस में उपरोक्त घृत को सिद्ध करके पीना
चाहिये । इसमें भी पंचमूलादि दस द्रव्यो का कल्क रूप मे व्यवहार करना
चाहिये । पचमूलादि से सिद्ध तैल को मालिश के लिये प्रयोग करना चाहिये ।
इसमे तक्र, मस्तु, सुरामण्ड, काजी आदि का उपयोग करना चाहिये ॥ ६१ ॥
एतेषामौषधानां वा पिबेच्चूर्णं सुखाम्बुना ॥ ६२ ॥
वाते श्लेष्मावृते सामे कफे वा वायुनोद्धते ।
दद्याच्चूर्णं पाचनार्थमग्निसन्दीपनं परम् ॥ ९३ ॥
इति पञ्चमूलाद्यं घृतं चूर्णं च ।