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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम ५८५

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण (transcription) दिया गया है:

अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम ५८५
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( ७२ ) पिच्छाबस्ति—जवासा, कुश, काश की जडे, सीम्बल के पत्ते
और वड़, गूलर, पीपल इनके कोमल पत्ते प्रत्येक वस्तु दो-दो पल, पानी तीन
प्रस्थ, दूध १ प्रस्थ मिलाकर काथ करना चाहिये । जब केवल दूध मात्र शेष
रह जाये तब छान लेना चाहिये । इसमे सीम्बल का गोद, लाजवन्ती, चन्दन,
कमलगट्ठा, इन्द्रजौ, फूल, प्रियगु और पद्मकेशर ( कमल का केसर ) सब द्रव्य
परस्पर समान भाग और मिलित दूध से चतुर्थांश लेकर दूध मे मिला देना
चाहिये । इसमे घी, शहद ओर शक्कर भी मिला देना चाहिये । यह पिच्छा-
बस्ति प्रवाहिका, गुदभ्रश, रक्तस्राव, ओर ज्वर मे प्रयोग करनी चाहिये ॥२२६-२२६॥
प्रपौण्डरीकं मधुकं पेष्यान् बस्तौ १ यथेरितान् ।
पिच्छाऽनुवासनं स्नेहं क्षीरद्विगुणितं पचेत् ॥ २३० ॥
( ७३ ) प्रपौण्डरीकादि अनुवासन—पुण्डरीक काष्ठ, मुलहठी तथा पिच्छा-
बस्ति मे कहे गये मोचरस आदि कल्क-द्रव्यो को पीस कर दुगने दूध से तैल-
पाक करना चाहिये ॥ २३० ॥
ह्रीवेरमुत्पलं लोध्रं समङ्गाचव्यचन्दनम् ।
पाठा सातिविषा बिल्वं धातकी देवदारु च ॥ २३१ ॥
दार्वीत्वङ् नागरं मांसी मस्तं क्षारो यवाग्रजः ।
चित्रकञ्चेति पेष्याणि चाङ्गेरीस्वरसे घृतम् ॥ २३२ ॥
ऐकध्यं साधयेत्सर्पं तत्सर्पिः परमौषधम् ।
अर्शोतिसारग्रहणीपाण्डुरोगज्वराऽरुचौ ॥ २३३ ॥
मूत्रकृच्छ्रे गुदभ्रंशे बस्त्याध्माने २ प्रवाहणे ।
पिच्छास्रावेऽर्शसा शूले योज्यमेतत्तिदोषनुत् ॥ २३४ ॥
इति ह्रीवेरादिघृतम् ।
( ७४ ) ह्रीवेरादि घृत—ह्रीवेर ( बाल ), कमल, लोध, लाजवन्ती या
मजीठ, चव्य, चन्दन, पाठा, अतीस, बेलगिरी, धाय के फूल, देवदारु, दारु-
हल्दी की छाल, सोंठ, जटामासी, मोथा, यवक्षार, चीता इन सब को समान
भाग लेकर एक पाव ( २० तोला ) कल्क तैय्यार करना चाहिये । चागेरी
( चौपतिया ) का स्वरस ४ सेर, घी १ सेर लेकर घृतविधि से घृत पकाना
चाहिये । यह घी अर्श, अतीसार, ग्रहणी, पाण्डुरोग, ज्वर, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र,
गुदभ्रश, बस्ति के आनाह मे, पिच्छा-स्राव मे और अर्जजन्य शूल मे प्रयोग
करना चाहिये, यह घृत त्रिदोष नाशक है ॥ २३१-२३४ ॥

१. 'पिच्छाबस्तौ' इति वा पाठः । २ 'बस्त्यानाहे' इति पाठान्तरम् ।

५८६ चरकसंहिता [ अ० १४
अवाक्पुष्पी बला दार्वा पृश्निपर्णी त्रिकण्टकः ।
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थशुङ्गाश्च द्विपलोन्मिताः ॥ २३५ ॥
कषाय एषा पेष्यास्तु जीवन्ती कटुरोहिणी ।
पिप्पली पिप्पलीमूलं नागरं सुरदारु च ॥ २३६ ॥
कलिङ्गाः शाल्मलं पुष्प वीरा चन्दनमुत्पलम् ।
कट्फल चित्रकं मुस्तं प्रियङ्ग्वतिविषास्थिराः ॥ २३७ ॥
पद्मोत्पलाना किञ्जल्कः समङ्गा सनिदिग्धिक। ।
बिल्वं मोचरसः पाठा भागाः कर्षसमन्विताः ॥ २३८ ॥
चतुःप्रस्थे शृतं प्रस्थं कषायमवतारयेत् ।
त्रिशत्पलानि प्रस्थोऽत्र विज्ञेयो द्विपलाधिकः ॥ २३९ ॥
सुनिषण्णकचाङ्गेर्याः प्रस्थौ द्वौ स्वरस्य च ।
सर्वैरेतैैर्यथोद्दिष्टैर्घृतप्रस्थ विपाचयेत् ॥ २४० ॥
एतदशर्शःस्वतीसारे रक्तस्रावे त्रिदोषजे ।
प्रवाहणे गुदभ्रंशे पिच्छासु विविधासु च ॥ २४१ ॥
उत्थाने चातिबहुशः शोथशूले गुदाश्रये ।
मूत्रग्रहे मूढवाते मन्देऽग्नावरुचावपि ॥ २४२ ॥
प्रयोज्यं विधिवत्सर्पिर्बलवर्णामिवर्धनम् ।
विविधेष्वन्नपानेषु केवलं वा निरत्ययम् ॥ २४३ ॥
इति सुनिषण्णकचाङ्गेरीघृतम् ।
(७५) चागेरी घृत—अवाक् पुष्पी (ओधा हुली), खरैटी, दारु हल्दी,
पृश्निपर्णी, गोखरू, बरगद, गूलर, पीपल इनके कोमल पत्ते प्रत्येक वस्तु दो-दो
पल लेकर चार प्रस्थ पानी मे कषाय करना चाहिये । जब एक प्रस्थ रह जाये
तब उतार कर छान लेना चाहिये । यह कषाय एक प्रस्थ, चागेरी का स्वरस
दो प्रस्थ और सुनिषण्णक (सुरवारी) का स्वरस दो प्रस्थ, घी एक प्रस्थ,
कल्कर्थ—जीवन्ती, कुटकी, पिप्पली, पिप्पलीमूल, सोठ देवदारु, इन्द्रजौ,
सिम्बल के फूल, वीरा (शालपर्णी या शतावरी), चन्दन, कमल, कायफल,
चीता, मोथा, प्रियगु, अतीस, शालपर्णी, पद्म का केशर, उत्पल का केशर,
लाजवन्ती, छोटी कटेरी, बेलगिरी, सिम्बल का गोंद, पाठा प्रत्येक वस्तु एक
कर्ष लेकर, पीस कर कल्क बनाना चाहिये । इन सब से यथाविधि घृत-पाक
करना चाहिये । यह घृत अर्शंरोग मे, अतीसार मे, त्रिदोषजन्य रक्तस्राव मे,
प्रवाहण मे, गुदभ्रश मे, नाना प्रकार की पिच्छाओं मे, बार-बार थोड़ा-थोड़ा
मल त्याग होने मे, गुदा की शोथ या शूल मे, मूत्र की रुकावट में, मूढवात मे,