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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८५

अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८५

आतुरार्थमनुप्राप्तं खरोष्ट्ररथवाहनम् ।
दूतं दृष्ट्वा भिषग्विद्यादातुरस्य पराभवम् ॥ १८ ॥
पलाल-बुस-मांसास्थि-केश-लोम-नख-द्विजान् ।
मार्जनीं मुसलं सूपमुपानच्चर्म विच्युतम् ॥ १९ ॥
तृण-काष्ठ-तुषाङ्गारं स्पृशन्तो लोष्टमश्म च ।
तत्पूर्वदर्शने दूता व्याहरन्ति मुमूर्षताम् ॥ २० ॥
यस्मिंश्च दूते ब्रुवति वाक्यमातुरसंश्रयम् ।
पश्येन्निमित्तमशुभं तं च नातुरजेद्विषक् ॥ २१ ॥
तथा व्यसनिनं प्रेतं प्रेतालङ्कारमेव वा ।
भिन्नं दग्धं विनष्टं वा तद्वाहीनि वचांसि वा ॥ २२ ॥
रसो वा कटुकस्तीव्रो गन्धो वा कौणपो महान् ।
स्पर्शो वा विपुलः क्रूरो यद्वाऽन्यदशुभं भवेत् ॥ २३ ॥
( ३ ) दूतगत अरिष्ट लक्षण—
( ८ ) जिस दूत के नाक, कान आदि कोई अंग कटा फटा हो, संन्यासी,
रोगी, वध आदि उग्र काम करने वाले दूत को देख कर वैद्य को रोगी के घर जाना
ठीक नहीं । ( ६ ) दूत यदि गधे, ऊठ या रथ या सवारी पर चढ कर बुलाने
के लिये आवै, तो वैद्य समझ ले कि रोगी का मरण होगा । ( १० ) पलाल
( पुराली ), भूसा, मांस, अस्थि, केश, लोम, नख, दात, झाडू, भूषण, छाज,
जूता, चमड़ा, टूटी या गिरी हुई वस्तु, तिनका, काठ, लकड़ी, तुष, अंगार,
मिट्टी का ढेला, पत्थर इन वस्तुओं का प्रथम प्रवेश काल मे ही स्पर्श करते
हुए दूत मरने वाले रोगी की सूचना देते है । ( ११ ) रोगी के सम्बन्ध में बात
करते हुए जिस दूत में वैद्य को अशुभ लक्षण दिखाई देवे, उस रोगी के घर
वैद्य न जावे । ( १२ ) अशुभ लक्षण—दूत में किसी प्रकार का व्यसन ( शराब
पीना या जुआ खेलना ), मृत मनुष्य की कथा का कहना, मृतक के अलकार
धारण करना, टूटी, जली अथवा नष्ट हुई वस्तु की बातचीत, कटु रस या तीव्र
( इन्द्रियों को उद्विग्न करने वाला ) गन्ध, अथवा मुर्दे की दुर्गन्ध, तीव्र या उग्र
स्पर्श, क्रूर अन्य इसी प्रकार के अशुभ लक्षण हों तो इनको अशुभ जाने ॥१७-२३॥
तत्पूर्वमभितो वाक्यं वाक्यकालेऽथवा पुनः ।
दूतानां व्याहृतं श्रुत्वा धीरो मरणमादिशेत् ॥ २४ ॥
इति दूताधिकारोऽयमुक्तः कृत्स्नो मुमूर्षताम् ।
( ४ ) पूर्वापर लक्षण—
( १३ ) दूत के बचन से पूर्व भूतकाल के द्योतक वचनों में रोगी की

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अवस्था का श्रवण करना अथवा रोगी का वर्णन करते समय भूतकाल की
क्रियाओं को सुनना अशुभ लक्षण हैं । ऐसा सुन कर रोगी की मृत्यु समझनी
चाहिये । इस प्रकार से मरणोन्मुख रोगियों के दूतों का वर्णन सम्पूर्ण रूप में
कह दिया ॥ २४ ॥
पध्याातुरकुलानां च वक्ष्याम्यौत्पातिकं पुनः ॥ २५ ॥
अवश्रुतमधोत्कृष्टं स्खलनं पतनं तथा।
आक्रोशः संप्रहारो वा प्रतिषेधो विगर्हणम् ॥ २६ ॥
वस्त्रोष्णीषोत्तरीयध्वजच्छत्रोपानद्युगाश्रयम् ।
व्यसनं दर्शनं चापि मृतव्यसनिनां तथा ॥ २७ ॥
चैत्यध्वजपताकानां पूर्णानां पतनानि च ।
हतानिष्टप्रवादाश्च दर्शनं भस्मपांसुभिः ॥ २८ ॥
पथच्छेदो विडालेन शना सर्पेण वा पुनः ।
मृगद्विजानां क्रूराणां गिरो दीप्तां दिशं प्रति ॥ २९ ॥
शयनासनयानानामुत्तानानां प्रदर्शनम् ।
इत्येतान्यप्रशस्तानि सर्वाण्याहुर्मनीषिणः ॥ ३० ॥
एतानि पथि वैद्येन पश्यताऽऽतुरवेश्मनि ।
शृण्वता च न गन्तव्यं तदागारं विपश्चिता ॥ ३१ ॥
इत्यौत्पातिकमाख्यातं पथि वैद्यविगर्हितम् ।
( ५ ) मार्ग के लक्षण—
रोगी के घर जाते समय रास्ते में जो अरिष्ट सूचक लक्षण ( अशुभ चिह्न )
होते हैं उनको कहते हैं—छींक का आना, डर कर रोना, फिसलना, गिरना,
चिल्लाना, चोट लगना, प्रतिषेध ( मत जाओ ऐसी रुकावट होना ), निन्दा,
वस्त्र, पगड़ी, चादर ( दुपट्टा ), छत्री, जूता इन पदार्थों का फट जाना, मार्ग
में दुःखी अथवा मृत या कान, नाक अथवा अंग से हीन व्यक्ति का दर्शन
होना, चैत्य (मन्दिर), ध्वजा, पताका अथवा पानी से भरे घड़ों का गिरना; मरना
या कोई अनिष्ट बात, या वस्तु का नाश सुनाई देना; राख या रेत-मिट्टी इन सहित
दीखना; बिल्ली, सांप या कुत्ता इनका रास्ता काट कर जाना; जिस दिशामें सूर्य हो
उधर ही शृगाल, गोहड़, गीध आदि क्रूर पशु पक्षी चिल्ला रहे हों; बिछौना, आसन,
गाड़ी आदि वस्तुएं उत्तान रूप से रास्ते में पड़ी हों तो बुद्धिमान् इनको अशुभ लक्षण
समझें । ۞ रोगी के घर में जाते समय ये लक्षण हों तो रोगी के घर नहीं जाना
चाहिये । वैद्य के लिए निन्दित इन 'औत्पातिक' लक्षणों को कह दिया ॥२५-३१॥
۞ दीप्ता दिक्—'दक्षिण दिशा' भी अर्थ है ।