चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७७
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४७७
( मन्दाग्नि ) हो तो लाख का सुरा के साथ पीवे । यदि रोगी को अतीसार
हो तो लाख को मांथा, अतीस, पाठा और इन्द्रजौ के काथ ( काढे )
के साथ पीवे ॥ १६ ॥
लाक्षा सर्पिर्मधूच्छिष्ट जीवनीयगण सिताम् ।
त्वक्क्षीरीसंमितं क्षीरे पक्त्वा दीप्तानलः पिबेत् ॥ १७ ॥
( ३ ) दीप्ताग्नि रोगी लाख, घी, मोम, जीवनीय गण की औषधिया, मिश्री
त्वक्क्षीरी ( वंशलोचन ) और समिता ( गोधूम, गेहूँ का चूर्ण ) को दूध से
पका कर पीये ॥ १७ ॥
इक्ष्वालिकविसग्रन्थिपद्मकेशरचन्दनैः ।
श्रुतं पयो मधुयुतं सन्धानार्थं पिबेत्क्षती ॥ १८ ॥
( ४ ) उरःक्षत रोगी सन्धान के लिये इक्षुवालिका, बिस (मृणाल की जड)
ग्रन्थि ( पिप्पली मूल ), पद्मकेसर ओर चन्दन इनसे पकाये दूध मे मधु मिला
कर पिये ॥ १८ ॥
यवानां चूर्णमादाय क्षीरसिद्धं घृतप्लुतम् ।
ज्वरे दाहे सिताक्षौद्रसक्तून् वा पयसा पिबेत् ॥ १६ ॥
( ५ ) उरःक्षत मे ज्वर और दाह होने पर आम (अग्नि पर न भुने,
कच्चे ) जौ के चूर्ण को चौगुने दूध मे पका कर घी मे मिला कर शर्करा
( शक्कर ) और मधु के साथ खावे । अथवा शक्कर और मधु से मिले जौ के
सत्तूओ को दूध मे मिला कर खावे ॥ १६ ॥
कासी पर्वास्थिशूली च लिह्यात्सघृतमाक्षिकाः ।
मधूकमधुकद्राक्षात्वक्क्षीरीपिप्पलीबलाः ॥ २० ॥
( ६ ) कास, पार्श्वशूल, पोरुओ मे पीडा और अस्थिशूल होने पर महुए के
फूल, मुलहठी, द्राक्षा, वसलोचन, पिप्पली और बला इनके चूर्ण को घी और
शहद मे मिला कर चाटे ॥ २० ॥
एलापत्रत्वचोऽर्धांशाः पिपल्यर्धपलं तथा ।
सितामधुकखर्जूरमृद्वीकाश्च पलोन्मिताः ॥ २१ ॥
संचूर्ण्य मधुना युक्ता गुलिकाः संप्रकल्पयेत् ।
अक्षमात्रा ततश्चैका भक्षयेन्ना दिने दिने ॥ २२ ॥
कासं श्वास ज्वर हिक्का छर्दिमूर्च्छा मदं भ्रमम् ।
रक्तनिष्ठीवनं तृष्णां पार्श्वशूलमरोचकम् ॥ २३ ॥
शोषप्लीहाढ्यवातांश्च स्वरभेदं क्षतं क्षयम् ।
४७८ चरकसंहिता [ अ० ११
गुलिका तर्पणी वृष्या रक्तपित्तं च नाशयेत् ॥ २४ ॥
इत्येलादिगुटिका ।
(७) एलादि गुटिका—छोटी इलायची, पत्र (तेजपात), त्वच (दाल-
चीनी) ये प्रत्येक आधा कर्ष, पिप्पली आधा पल, शर्करा, मुलहठी, खजूर,
द्राक्षा (दाख) प्रत्येक एक-एक पल इन सब का चूर्ण करके मधु के साथ
गोलिया बनावे । रोगी को चाहिये कि प्रतिदिन एक कर्ष परिमित गुटिका खाये।
ये गुटिकाये तर्पणी (वृष्य) है। कास, श्वास, ज्वर, हिचकी, वमन, मूर्च्छा, मद
श्रम, रक्तवमन, प्यास, पार्श्वशूल, अरोचक, शोष, प्लीहा, आढ्यवात, स्वरभेद,
क्षत, क्षय और रक्तपित्त को नष्ट करती है ॥ २१-२४ ॥
रक्तेऽतिवृत्ते दक्षाण्डं यूषेस्तोयेन वा पिबेत् ।
चटकाण्डरसं वाऽपि रक्तं वा छागजाङ्गलम् ॥ २५ ॥
(८) रक्त के अधिक आने पर कुक्कुट के अण्डों को मूग आदि के यूष
(रस) के साथ अथवा जल के साथ पीवे । अथवा चटक (चिडिया) के
अण्डे के रस को यूष के साथ पीवे, बकरी या हरिण आदि जंगली पशुओ के
रक्त को पीवे ॥ २५ ॥
चूर्णं पौनर्नवं रक्तशालितण्डुलशर्करम् ।
रक्तष्ठीवी पिबेत्सिद्धं द्राक्षारसपयोघृतैः ॥ २६ ॥
मधूकमधुकक्षीरसिद्धं वा तण्डुलीयकम् ।
(६) रक्त मिश्रित थूक आने पर—शर्करा, पुनर्नवा और लाल चावलो
का चूर्ण मिला कर खावे । द्राक्षा रस, दूध, घी इनके साथ सिद्ध करके पीवे ।
अथवा महुवे का फूल, गुलहठी, इनका क्वाथ, क्वाथ के समान दूध, इनमे तण्डु-
लीयक (चौलाई) सिद्ध करके पीवे ॥ २६ ॥
मूढवातस्त्वजामेदः सुराभृष्टं ससैन्धवम् ॥ २७ ॥
क्षामः क्षीणः क्षतोरस्कस्त्वनिद्रः सबलेऽनले ।
श्रुतक्षीरसरेणाद्यात्सक्षाौद्रघृतशर्करम् ॥ २८ ॥
(१०) उर क्षत रोगी मे यदि वायु अनुलोम-मार्ग से प्रवृत्त न हो
तो सुरा मे भुनी अजा की वसा (चर्बी) को सैन्धे नमक के साथ सेवन करे ।
यदि उरःक्षत-रोगी क्षाम (क्लान्त) और क्षीण शरीर हो, अग्नि प्रबल हो और
नींद न आती हो तो अजा-मेद (बकरे की चर्बी) को पके हुए दूध के सर
भाग (मलाई) के साथ मिला कर घी, मधु, शर्करा के साथ खावे ॥२७-२८॥
शर्करा च यवक्षौद्रजीवकर्षभकौ मधु ।
अ० ११] चिकित्सितस्थानम् ४७६
शृतक्षीरानुपानं वा लिह्यात्क्षीणः क्षतः कृशः ॥ २९ ॥
क्रव्यादामासनिर्यूहं घृतभृष्टं पिवेच्च सः ।
पिप्पलीक्षौद्रसंयुक्तं मासशोणितवर्धनम् ॥ ३० ॥
(११) कृश और क्षीण उरःक्षत-रोगी जो, गेहूँ, जीवक, ऋषभक इनके
चूर्ण को शर्करा के समान भाग लेकर मधु के साथ चाटे। ऊपर से गरम दूध
पीवे, मांस और रक्त बढ़ाने वाले मांसभक्षी पशु-पक्षियो के मांस के रस को
म भून कर पिप्पली-चूर्ण और मधु के साथ मिला कर खावे ॥२९-३०॥
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षशालप्रियङ्गुभिः ।
तालमस्तकजम्बूत्वक्प्रियालैश्च सपद्मकैः ॥ ३१ ॥
साश्वकर्णैः शृतात्क्षीराद्दध्नाज्जातेन सर्पिषा ।
शाल्योदनं क्षतोरस्कः क्षीणशुक्रश्च मानवः ॥ ३२ ॥
(१२) उरःक्षत और क्षीणशुक्र पुरुष वट, गूलर, पीपल, पिलखन, साल
प्रियङ्गु, ताड का मस्तक, जामुन की छाल, पियाल, पद्माख, अश्वकर्ण (पीतशाल)
इनका समान भाग लेकर उनके कल्क के साथ पके दूध मे से निकले घी के
साथ चावल खाये ॥३१-३२॥
यष्ट्याह्वानागबलयोः क्वाथे क्षीरसमं घृतम् ।
पयस्यापिप्पलीवाशीकल्कसिद्धं क्षते शुभम् ॥ ३३ ॥
(१३) मुलहठी और नागबला का क्वाथ (एक तृतीयांश रहने पर),
दूध, घी के समान, कल्क Callback, पयस्या (क्षीरकाकोली), पिप्पली, वंशलोचन
इनके कल्क से दूध के समान घृत (एक भाग) सिद्ध करे। यह घृत उरःक्षत
में उपयोगी है ॥ ३३ ॥
कोललाक्षारसे तद्वत्क्षीराष्टगुणसाधितम् ।
कल्कैः कट्वङ्गदार्बीत्वग्वत्सकत्वक्फलैर्घृतम् ॥ ३४ ॥
(१४) कोल (सूखे बेर) और लाक्षा रस (अथवा क्वाथ) और घी से
आठ गुणे दूध मे, कट्वङ्ग (श्यानाक), दारुहल्दी की छाल, कूडे की छाल, इन्द्रजौ
इनके कल्क से घृत सिद्ध करे। यह घृत उरःक्षत मे हितकारी है १॥ ३४ ॥
जीवकर्षभकौ वीरां जीवन्तीं नागरं शटीम् ।
चतस्रः पर्णिनीर्मेदे काकोल्यौ द्वे निदिग्धिके ॥ ३५ ॥
पुनर्नवे द्वे मधुकमात्मगुप्ता शतावरीम् ।
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१ अष्टांगसंग्रह मे अष्टगुण दूध का ही विधान है। यथा—
घृतं वाष्टगुणे क्षीरे कोललाक्षारसान्वितम् ॥
४८० चरकसंहिता [ अ० ११
ऋद्धिं परूषकं भार्गी मृद्वीकां बृहतीं तथा ॥ ३६ ॥
शृङ्गाटकं तामलकीं पयस्यां पिप्पलीं बलाम् ।
बदराक्षोटखर्जूरवातामाभिषुकाण्यपि ॥ ३७ ॥
फलानि चैवमादीनि कल्कान् कुर्वीत कार्षिकान् ।
धात्रीरसविदारीक्षुच्छागमांसरसं पयः ॥ ३८ ॥
एषां प्रस्थोन्मितान् भागान् घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
प्रस्थार्धं मधुनः शीते शर्कराऽर्धतुला तथा ॥ ३९ ॥
द्विकार्षिकाणि पत्रैलाहेमत्वङ्मरिचानि च ।
चूर्णितानि विनीयास्माल्लिह्यान्मात्रां सदा नरः ॥ ४० ॥
अमृतप्राशमित्येतन्नराणाममृतं घृतम् ।
सुधामृतरसं प्राश्य क्षीरमांसरसाशिना ॥ ४१ ॥
नष्टशुक्रक्षतक्षीणदुर्बलव्याधिकंपितान् ।
स्त्रीप्रसक्तान्कृशान्वर्णस्वरहीनांश्च बृंहयेत् ॥ ४२ ॥
कासहिक्काज्वरश्वासदाहतृष्णास्रपित्तनुत् ।
पुत्रदं वमिमूर्च्छाहृद्योनिमूत्रामयापहम् ॥ ४३ ॥
इत्यमृतप्राशघृतम् ।
( १५ ) अमृतप्राश-घृत—कल्कार्थ—जीवक, ऋषभक, शतावरी, जीवन्ती,
सोंठ, कचूर, मूगपर्णी, माषपर्णी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मेदा, महामेदा, का-
काली, क्षीरकाकाली, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, श्वेत और लाल दोनो पुनर्नवा,
मुलहठी, कौंच, शतावरी, ऋद्धि, फालसा, भार्गी, मुनक्का, बड़ी कटेरी, सिंघाढ़ा,
तामलकी ( भूई आवला ), पयस्या ( विदारी ), पिप्पली, खरैटी, बदर ( बेर ),
अक्षोट ( अखराट ), खजूर, बाताम ( बादाम ), अभिषुक ( पिस्ता ) इसी
प्रकार के अन्य मधुर, स्निग्ध और बृंहण फल प्रत्येक एक-एक कर्ष, आवले
का स्वरस, विदारी का रस, गन्ने का रस, बकरे के मास का रस और गाय का
दूध प्रत्येक एक प्रस्थ लेकर इनके साथ घी का एक प्रस्थ सिद्ध करे । सिद्ध होकर
शीतल हो जाने पर मधु आधा प्रस्थ ( आठ पल ), शर्करा पचास पल, मरिच,
दालचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेसर प्रत्येक आधा पल लेकर इनका चूर्ण
इसमे मिला देवे ।
यह घृत क्षतक्षीण व्यक्तियों के लिये अमृत के समान है । सुधा और अमृत
के समान है१, इस घी को खाकर पीछे से दूध और मास रस के साथ अन्न खावे ।
१ सुधा और अमृत दोनो पर्याय है तथापि इतना विवेक है कि नागों ने-