श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
१६ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १० | ६७
१६ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १० | ६७
और हाजरा से बातचीत कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने एक भक्त से पूछा, “क्या तुम कोई स्वप्न भी देखते हो?”
भक्त – एक अद्भुत स्वप्न मैंने देखा है – यह जगत् जलमय हो गया है। अनन्त जलराशि! कुछ एक नावें तैर रही थीं, एकाएक बाढ़ से डूब गयीं। मैं और कुछ और आदमी एक जहाज पर चढ़े हैं कि इतने में उस अकूल समुद्र के ऊपर से चलते हुए एक ब्राह्मण दिखायी पड़े। मैंने पूछा, “आप कैसे जा रहे हैं?” ब्राह्मण ने जरा हँसकर कहा, ‘यहाँ कोई तकलीफ नहीं है; जल के नीचे बराबर पुल है।’ मैंने पूछा, ‘आप कहाँ जा रहे हैं?’ उन्होंने कहा, ‘भवानीपुर जा रहा हूँ।’ मैंने कहा, ‘जरा ठहर जाइए; मैं भी आपके साथ चलूँगा।’
श्रीरामकृष्ण – यह सब सुनकर मुझे रोमांच हो रहा है!
भक्त – ब्राह्मण ने कहा, ‘मुझे अब फुरसत नहीं हैं; तुम्हें उतरने में देर लगेगी। अब मैं चलता हूँ। यह रास्ता देख लो, तुम पीछे आना।’
श्रीरामकृष्ण – मुझे रोमांच हो रहा है! तुम जल्दी मन्त्रदीक्षा ले लो।
रात के ग्यारह बज गए हैं। नरेन्द्र आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के कमरे में फर्श पर बिस्तर लगाकर लेट गये।
(३)
नींद खुलने पर भक्तों में से कोई कोई देखते हैं कि सबेरा हुआ है (१७ अक्टूबर १८८२ मंगलवार)। श्रीरामकृष्ण बालक की भाँति दिगम्बर हैं, और देव-देवियों के नाम उच्चारण करते हुए कमरे में टहल रहे हैं। आप कभी गंगादर्शन करते हैं, कभी देव-देवियों के चित्रों के पास जाकर प्रणाम करते हैं, और कभी मधुर स्वर में नामकीर्तन करते हैं। कभी कहते हैं – ‘वेद, पुराण, तन्त्र, गीता, गायत्री, भागवत, भक्त, भगवान्। गीता को लक्ष्य करके अनेक बार कहते हैं – ‘त्यागी, त्यागी, त्यागी, त्यागी।’ फिर कभी – ‘तुम्हीं ब्रह्म हो, तुम्हीं शक्ति; तुम्हीं पुरुष हो, तुम्हीं प्रकृति; तुम्हीं विराट हो, तुम्हीं स्वराट् (स्वतन्त्र अद्वितीय सत्ता) – तुम्हीं नित्य हो, तुम्हीं लीलामयी; तुम्हीं (सांख्य के) चौबीस तत्त्व हो।’
इधर कालीमन्दिर और राधाकान्त के मन्दिर में मंगलारती हो रही है और शंख-घण्टे बज रहे हैं। भक्त उठकर देखते हैं कि मन्दिर की फुलवाड़ी में देव-देवियों की पूजा के लिए फूल तोड़े जा रहे हैं, और प्रभाती रागों की लहरें फैलाती हुई नौबत बज रही है।
नरेन्द्र आदि भक्त प्रातःक्रिया से निपटकर श्रीरामकृष्ण के पास आए। श्रीरामकृष्ण सहास्यमुख हो उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में पश्चिम की ओर खड़े हैं।
नरेन्द्र – मैंने देखा कि पंचवटी में कुछ नानकपन्थी साधु बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, वे कल आए थे। (नरेन्द्र से) तुम सब एक साथ चटाई पर बैठो,
६८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२
मैं देखूँ।
सब भक्तों के चटाई पर बैठने के बाद श्रीरामकृष्ण आनन्द से देखने और उनसे बातचीत करने लगे। नरेन्द्र ने साधना की बात छेड़ी।
वीरभाव की साधना कठिन है। सन्तानभाव अतिशुद्ध है।
श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र आदि से) – भक्ति ही सार वस्तु हैं। ईश्वर को प्यार करने से विवेक-वैराग्य आप ही आप आ जाते हैं।
नरेन्द्र – एक बात पूछूँ – क्या औरतों से मिलकर साधना करना तन्त्रों में कहा गया है?
श्रीरामकृष्ण – वे सब अच्छे रास्ते नहीं; बड़े कठिन हैं, और उनसे प्रायः पतन हुआ करता है। तीन प्रकार की साधनाएँ हैं – वीरभाव, दासीभाव और मातृभाव। मेरी मातृभाव की साधना है। दासीभाव भी अच्छा है। वीरभाव की साधना बड़ी कठिन है। सन्तानभाव बड़ा शुद्ध भाव है।
नानकपन्थी साधुओ ने आकर श्रीरामकृष्ण को 'नमो नारायण' कहकर अभिवादन किया। श्रीरामकृष्ण ने उनसे बैठने को कहा।
ईश्वर के लिए सभी कुछ सम्भव है
श्रीरामकृष्ण कहते हैं – “ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं। उनका यथार्थ स्वरूप कोई नहीं बता सकता। सभी सम्भव है। दो योगी थे, ईश्वर की साधना करते थे। नारद ऋषि जा रहे थे। उनका परिचय पाकर एक ने कहा 'तुम नारायण के पास से आते हो? वे क्या कर रहे हैं?' नारदजी ने कहा, 'मैं देख आया कि वे एक सुई के छेद में ऊँट-हाथी घुसाते हैं और फिर निकालते हैं।' उस पर एक ने कहा, 'इसमें आश्चर्य ही क्या है? उनके लिए सभी सम्भव है।' पर दूसरे ने कहा, 'भला ऐसा कभी हो सकता है? तुम वहाँ गए ही नहीं।'
दिन के नौ बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में बैठे हैं। कोन्नगर से मनोमोहन सपरिवार आए हैं। उन्होंने प्रणाम करके कहा, “इन्हें कलकत्ते ले जा रहा हूँ!” कुशल प्रश्न पूछने के बाद श्रीरामकृष्ण ने कहा, “आज माह का पहला दिन है और तुम तो कलकत्ते जा रहे हो; – क्या जाने कहीं कुछ खराबी न हो!” यह कहकर जरा हँसे और दूसरी बात कहने लगे।
नरेन्द्र को मग्न होकर ध्यान करने का उपदेश
नरेन्द्र और उनके मित्र स्नान करके आए। श्रीरामकृष्ण ने व्यग्र होकर नरेन्द्र से कहा, “जाओ, बट के नीचे जाकर ध्यान करो। आसन दूँ?”