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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

९ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६० | ३६५

९ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६०३६५
  • कृपा कीजिए कि वह श्यामल सिपाही मेरा स्वीकार करे।”

पाठ समाप्त होने के बाद श्रीरामकृष्ण मास्टर के साथ बात कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – इन बातों पर तुम्हारा विश्वास होता है? – घोड़े पर सवार होकर उन्होंने सेनानाश किया था; इन सब बातों पर?

मास्टर – भक्त ने व्याकुल होकर उन्हें पुकारा था। इस पर विश्वास होता है। श्रीभगवान् को उसने ठीक ठीक सवार करते देखा था या नहीं, यह सब समझ में नहीं आता। वे सवार होकर आ सकते हैं, परन्तु उन लोगों ने उन्हें ठीक ठीक देखा था या नहीं, इस पर विश्वास नहीं जमता।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – पुस्तक में भक्तों की अच्छी कथाए लिखी हैं, परन्तु हैं सब एक ही ढर्रे की। जिनका दूसरा मत है, उनकी निन्दा लिखी है।

दूसरे दिन सुबह को बगीचे में खड़े हुए श्रीरामकृष्ण वार्तालाप कर रहे हैं। मणि कहते हैं, “तो मैं यहाँ आकर रहूँगा।”

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, तुम लोग जो इतना आया करते हो, इसके क्या मानी है? साधु को लोग ज्यादा से ज्यादा एक बार आकर देख जाते हैं। तुम इतना आते हो – इसके क्या मानी है?

मणि तो चकित हो गये। श्रीरामकृष्ण स्वयं ही इस प्रश्न का उत्तर देने लगे।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – अन्तरंग न होते तो क्या आते? अन्तरंग अर्थात् आत्मीय, अपना आदमी – जैसे पिता, पुत्र, भाई, बहन। सब बातें मैं नहीं कहता। नहीं तो फिर क्यों आओगे?

“शुकदेव ब्रह्मज्ञान पाने के लिए जनक के पास गए थे। जनक ने कहा, 'पहले दक्षिणा दो।' शुकदेव ने कहा, 'जब तक उपदेश नहीं मिल जाता, तब तक कैसे दक्षिणा दूँ?' जनक ने हँसते हुए कहा, 'तुम्हें ब्रह्मज्ञान हो जाने पर फिर गुरु और शिष्य का भेद थोड़े ही रह जाएगा? इसीलिए हमने पहले दक्षिणा की बात कही'।”

(४)

सेवक की विचारतरंगें

शुक्लपक्ष है। चाँद निकला है। मणि कालीमन्दिर के उद्यान के रास्ते पर टहल रहे हैं। रास्ते के एक ओर श्रीरामकृष्ण का कमरा, नौबतखाना, बकुलतला और पंचवटी है – दूसरी ओर ज्योत्स्नापूर्ण भागीरथी बह रही हैं।

मणि मन ही मन कह रहे हैं – “क्या सचमुच ही ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं? श्रीरामकृष्ण तो ऐसा कहते हैं। उन्होंने कहा कि थोड़ी साधना करते ही कोई आकर बता देगा, 'ऐसा ऐसा करो।' अर्थात् उन्होंने थोड़ी साधना करने के लिए कहा। अच्छा, मेरा

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३६६श्रीरामकृष्णवचनामृत९ दिसम्बर, १८८३

तो विवाह हो चुका है, लड़के-बच्चे भी हुए हैं, क्या इतने पर भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है? (थोड़ा सोचकर) अवश्य ही किया जा सकता है, नहीं तो ये वैसा क्यों कहते? उनकी कृपा होने से क्यों न होगा?

“सामने यह जगत् दिखायी दे रहा है – ये सूर्य, चन्द्र, तारे, जीव, चौबीस तत्त्व – ये सब कैसे उत्पन्न हुए, इनका करतार कौन है, मैं, उनका कौन हूँ, यह न जानने पर जीवन ही व्यर्थ है।

“श्रीरामकृष्ण पुरुषश्रेष्ठ हैं। ऐसे महापुरुष मैंने जीवन में आज तक नहीं देखे। इन्होंने अवश्य ही ईश्वर को देखा है। अन्यथा, ये 'माँ माँ' कहते हुए दिनरात किसके साथ बातचीत करते रहते हैं! अन्यथा, ईश्वर पर इनका इतना प्रेम कैसे हो सकता है! इतना प्रेम कि एकदम बाह्यज्ञानरहित हो जाते हैं! समाधिमग्न जड़वत् हो जाते हैं! फिर कभी प्रेम में मतवाले होकर हँसते, रोते नाचते और गाते हैं।”

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CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar