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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद ९५ ६७५

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२ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद ९५ ६७५

"ज्ञान किसे कहते हैं? इसी स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना और मन को उसी में लगाये रहना – इस शुद्ध आत्मा को जानना – यही ज्ञान है।

कर्म कब तक? प्रथम माया के संसार का त्याग, फिर ब्रह्मज्ञान

"कर्म कब तक है? – जब तक देहाभिमान रहता है अर्थात् देह ही मैं हूँ, यह बुद्धि रहती है। यह बात गीता में लिखी है।

"देह पर आत्मा-बुद्धि का आरोप करना ही अज्ञान है।

(शिवपुर के ब्राह्मभक्त से) "आप क्या ब्राह्म हैं?"

ब्राह्म – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – मैं निराकार साधक का मुँह और उसकी आँखें देखकर उसे समझ लेता हूँ। आप जरा डूबिये; ऊपर उतराते रहियेगा तो रत्न आपको नहीं मिल सकता। मैं साकार और निराकार सब मानता हूँ।

बड़ाबाजार के मारवाड़ी भक्तों ने आकर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण उन लोगों की प्रशंसा कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – अहा! ये सब कैसे भक्त हैं! सब के सब श्रीठाकुरजी के दर्शन करते हैं, स्तुतियाँ पढ़ते हैं और प्रसाद पाते हैं। इस बार इन लोगों ने जिसे पुरोहित रखा है, वह भागवत का पण्डित है।

मारवाड़ी भक्त – 'मैं तुम्हारा दास हूँ', यह जो कहता है वह 'मैं' कौन है?

श्रीरामकृष्ण – लिंग-शरीर या जीवात्मा है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार, इन चारों के मेल से लिंग-शरीर होता है।

मारवाड़ी – जीवात्मा कौन हैं?

श्रीरामकृष्ण – अष्ट-पाशों से बँधा हुआ आत्मा; और चित्त उसे कहते हैं जो (किसी चीज की याद आने पर) 'अहा' कर उठता है।

मारवाड़ी भक्त – महाराज, मरने पर क्या होता है?

श्रीरामकृष्ण – गीता के मत से मरते समय जीव जो कुछ सोचता है, वही हो जाता है। भरत ने हरिण सोचा था, इसलिए वह वही हो भी गया था। यही कारण है कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए साधना की आवश्यकता है। दिन-रात उनकी चिन्ता करते रहने पर मरते समय भी उन्हीं की चिन्ता होगी।

मारवाड़ी भक्त – अच्छा, महाराज, विषय से वैराग्य क्यों नहीं होता?

श्रीरामकृष्ण – इसे ही माया कहते हैं। माया से सत् असत् और असत् सत् जान पड़ता है।

"सत् अर्थात् जो नित्य है – परब्रह्म हैं। असत् संसार है – अनित्य है।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

६७६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ अक्टूबर, १८८४

"पढ़ने से क्या होता है? साधना और तपस्या चाहिए। उन्हें पुकारो।

" 'भंग-भंग चिल्लाने से क्या होगा? कुछ पीना चाहिए।

"यह संसार काँटे के पेड़ की तरह है। हाथ लगाओं तो खून निकल आता है। अगर काँटे के पेड़ के सम्बन्ध में बैठे ही बैठे यह कल्पना करते रहें कि पेड़ जल गया, तो क्या इससे वह कभी जला जाता है? ज्ञानाग्नि लाओ, वही आग लगाओ, तब पेड़ कहीं जल सकता है।

"साधना की अवस्था में कुछ परिश्रम करना पड़ता है। फिर तो सीधा मार्ग है। मोड़ पार करके अनुकूल वायु में पाल लगाकर नाव छोड़ दो।

"जब तक माया के घेरे के भीतर हो, जब तक माया के मेघ हैं, तब तक ज्ञान-सूर्य की किरणें नहीं फैल सकतीं। माया का घेरा पार कर जब बाहर आकर खड़े हो जाओगे तब ज्ञान-सूर्य अविद्या का नाश कर देगा। घर के भीतर ले आने पर आतशी शीशे से कोई काम नहीं हो सकता। घर के घेरे से बाहर खड़े होने पर जब धूप उस पर गिरती है तब उसकी ज्वाला से कागज जल जाता है।

"और बादलों के रहने पर भी आतशी शीशे से कागज नहीं जलता। बादलों के हट जाने पर ही वह काम कर सकेगा।

"कामिनी और कांचन के घेरे से जरा हटकर खड़े होने पर, अलग रहकर कुछ साधना करने पर मन का अन्धकार दूर होता है - अविद्या और अहंकार के बादल हट जाते हैं - ज्ञान-लाभ होता है।

"कामिनी और कांचन ही बादल हैं।"

(७)

श्रीरामकृष्ण का कांचन-त्याग

श्रीरामकृष्ण – (मारवाड़ी से) – त्यागियों के नियम बड़े कठिन हैं। कामिनी और कांचन का संसर्ग लेशमात्र भी न रहना चाहिए। रुपया अपने हाथ से तो छूना ही न चाहिए; परन्तु दूसरे के पास रखने की भी कोई व्यवस्था न रहनी चाहिए।

"लक्ष्मीनारायण मारवाड़ी था, वेदान्तवादी भी था, प्रायः यहाँ आया करता था। मेरा बिस्तरा मैला देखकर उसने कहा, मैं आपके नाम दस हजार रुपया लिख दूँगा, उसके ब्याज से आपकी सेवा होती रहेगी।

"उसने यह बात कही नहीं कि मैं जैसे लाठी की चोट खाकर बेहोश हो गया।

"होश आने पर उससे कहा, तुम्हें अगर ऐसी बातें करनी हों, तो यहाँ फिर कभी न आना। मुझमें रुपया छूने की शक्ति ही नहीं है, और न मैं रुपया पास ही रख सकता हूँ।

"उसकी बुद्धि बड़ी सूक्ष्म थी। उसने कहा, 'तो अब भी आपके लिए त्याज्य और