श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
६ मार्च, १८८२ | परिच्छेद ४ | २१
६ मार्च, १८८२ | परिच्छेद ४ | २१
(२)
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं, त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता, सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥ (गीता, ११।१८)
अन्तरंग भक्तों के संग में। 'मैं कौन हूँ'?
पाँच बजे हैं। भक्त लोग अपने अपने घर चले गए। सिर्फ मास्टर और नरेन्द्र रह गए। नरेन्द्र मुँह-हाथ धोने के लिए गए। मास्टर भी बगीचे में इधर-उधर घूमते रहे। थोड़ी देर बाद कोठी की बगल से 'हंस तालाब' की ओर आते हुए उन्होंने देखा कि तालाब की दक्षिण तरफवाली सीढ़ी के चबूतरे पर श्रीरामकृष्ण खड़े हैं और नरेन्द्र भी हाथ में गड़ुआ लिए खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण कहते हैं, "देख, और जरा ज्यादा आया-जाया करना - तूने हाल ही में आना शुरू किया है न? पहली जान-पहचान के बाद सभी लोग कुछ ज्यादा आया करते हैं, जैसे नया पति। (नरेन्द्र और मास्टर हँसे।) क्यों, आएगा नहीं?" नरेन्द्र ब्राह्मसमाजी लड़के हैं, हँसते हुए कहा, "हाँ, कोशिश करूँगा।"
फिर सभी कोठी की राह से श्रीरामकृष्ण के कमरे की ओर आने लगे। कोठी के पास श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से कहा, "देखो, किसान बाजार से बैल खरीदते हैं। वे जानते हैं कि कौनसा बैल अच्छा है और कौनसा बुरा। वे पूँछ के नीचे हाथ लगाकर परखते हैं। कोई कोई बैल पूँछ पर हाथ लगाने से लेट जाते हैं। वे ऐसे बैल नहीं खरीदते। पर जो बैल पूँछ पर हाथ रखते ही बड़ी तेजी से कूद पड़ता है, उसी बैल को वे चुन लेते हैं। नरेन्द्र इसी बैल की जाति का है। भीतर खूब तेज है।" यह कहकर श्रीरामकृष्ण मुसकराने लगे। "फिर कोई कोई ऐसे होते हैं कि मानो उनमें जान ही नहीं है - न जोर है, न दृढ़ता।"
सन्ध्या हुई। श्रीरामकृष्ण ईश्वर-चिन्तन करने लगे। उन्होंने मास्टर से कहा, "तुम जाकर नरेन्द्र से बातचीत करो, और फिर मुझे बताना कि वह कैसा लड़का है।"
आरती हो चुकी। मास्टर ने बड़ी देर में नरेन्द्र को चाँदनी के पश्चिम की तरफ पाया। आपस में बातचीत होने लगी। नरेन्द्र ने कहा कि मैं साधारण ब्राह्मसमाजी हूँ, कालेज में पढ़ता हूँ, इत्यादि।
रात हो गयी। अब मास्टर घर जाएँगे, पर जाने को जी नहीं चाहता; इसलिए नरेन्द्र से बिदा होकर वे फिर श्रीरामकृष्ण को ढूँढ़ने लगे। उनका गीत सुनकर मास्टर मुग्ध हो गए हैं। जी चाहता है कि फिर उनके श्रीमुख से गीत सुनें। ढूँढ़ते हुए देखा कि कालीमाता के मन्दिर के सामने जो नाट्यमण्डप है, उसी में श्रीरामकृष्ण अकेले टहल रहे हैं। मन्दिर में मूर्ति के दोनों तरफ दीपक जल रहे थे। विस्तृत नाट्यमण्डप में एक लालटेन जल रही थी। रोशनी धीमी थी। प्रकाश और अँधेरे का मिश्रण-सा दीख पड़ता था।
| २२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ६ मार्च, १८८२ |
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मास्टर श्रीरामकृष्ण का गीत सुनकर मुग्ध हो गए हैं, जैसे साँप मन्त्रमुग्ध हो जाता है। अब बड़े संकोच से उन्होंने श्रीरामकृष्णदेव से पूछा, “क्या आज फिर गाना होगा?” श्रीरामकृष्ण ने जरा सोचकर कहा, “नहीं, आज अब न होगा।” यह कहते ही मानो उन्हें फिर याद आयी और उन्होंने कहा, “हाँ, एक काम करना। मैं कलकत्ते में बलराम के घर जाऊँगा, तुम भी आना, वहाँ गाना होगा।”
मास्टर – आपकी जैसी आज्ञा।
श्रीरामकृष्ण – तुम जानते हो बलराम बसु को?
मास्टर – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – बलराम बसु – बोसपाड़ा में उनका घर है।
मास्टर – जी मैं पूछ लूँगा।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के साथ टहलते हुए) – अच्छा, तुमसे एक बात पूछता हूँ – मुझे तुम क्या समझते हो?
मास्टर चुप रहे। श्रीरामकृष्ण ने फिर से पूछा, “तुम्हें क्या मालूम होता है? मुझे कितने आने ज्ञान हुआ है?”
मास्टर – 'आने' की बात तो मैं नहीं जानता पर ऐसा ज्ञान, या प्रेमभक्ति, या विश्वास, या वैराग्य, या उदार भाव मैंने और कहीं कभी नहीं देखा।
श्रीरामकृष्ण हँसने लगे।
इस बातचीत के बाद मास्टर प्रणाम करके विदा हुए। फाटक तक जाकर फिर कुछ याद आयी, उल्टे पाँव लौटकर फिर श्रीरामकृष्णदेव के पास नाट्यमण्डप में हाजिर हुए।
उस धीमी रोशनी में श्रीरामकृष्ण अकेले टहल रहे थे – निःसंग – जैसे सिंह वन में अकेला अपनी मौज में फिरता रहता है। आत्माराम, और किसी की अपेक्षा नहीं!
विस्मित होकर मास्टर उन महापुरुष को देखने लगे।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – क्यों जी, फिर क्यों लौटे?
मास्टर – जी, वे अमीर आदमी होंगे – शायद मुझे भीतर न जाने दें – इसीलिए सोच रहा हूँ कि वहाँ न जाऊँगा, यहीं आकर आपसे मिलूँगा।
श्रीरामकृष्ण – नहीं जी, तुम मेरा नाम लेना। कहना कि मैं उनके पास जाऊँगा, बस कोई भी तुम्हें मेरे पास ले आएगा।
“जैसी आपकी आज्ञा” – कहकर मास्टर ने फिर प्रणाम किया और वहाँ से विदा हुए।
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