श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२२ अप्रैल, १८८३ परिच्छेद ३१ १९३
२२ अप्रैल, १८८३ परिच्छेद ३१ १९३
पुकारते हैं, कितना प्यार करते है, तुम लोग इसी भाव को लो, मूर्ति को न भी मानो तो कोई बात नहीं है।
ब्राह्मभक्त – वैराग्य कैसे होता है? और सभी को क्यों नहीं होता?
श्रीरामकृष्ण – भोग की शान्ति हुए बिना वैराग्य नहीं होता। छोटे बच्चे को खाना और खिलौना देकर अच्छी तरह से भुलाया जा सकता है, परन्तु जब खाना हो गया और खिलौने के साथ खेल भी समाप्त हो गया तब वह कहता है, 'माँ के पास जाऊँगा।' माँ के पास न ले जाने पर खिलौना पटक देता है और चिल्लाकर रोता है।
सच्चिदानन्द ही गुरु है – ईश्वरलाभ के बाद सन्ध्यादि कर्मों का त्याग
ब्राह्मभक्तगण गुरुवाद के विरोधी हैं। इसीलिए ब्राह्मभक्त इस सम्बन्ध में चर्चा कर रहे हैं।
ब्राह्मभक्त – महाराज, गुरु न होने पर क्या ज्ञान न होगा?
श्रीरामकृष्ण – सच्चिदानन्द ही गुरु हैं। यदि कोई मनुष्य गुरु के रूप में तुम्हारा चैतन्य जागृत कर दे तो जानो कि सच्चिदानन्द ने ही उस रूप को धारण किया है। गुरु मानो सखा हैं। हाथ पकड़कर ले जाते हैं। भगवान् का दर्शन होने पर फिर गुरु-शिष्य का ज्ञान नहीं रह जाता। 'वह बड़ा कठिन स्थान है, वहाँ पर गुरु-शिष्यों में साक्षात्कार नहीं होता।' इसीलिए जनक ने शुकदेव से कहा था, 'यदि ब्रह्मज्ञान चाहते हो तो पहले दक्षिणा दो;' क्योंकि ब्रह्मज्ञान हो जाने पर गुरु-शिष्यों में भेदबुद्धि नहीं रहेगी। जब तक ईश्वर का दर्शन नहीं होता, तभी तक गुरु-शिष्य का सम्बन्ध रहता है।
थोड़ी देर में सन्ध्या हुई। ब्राह्मभक्तों में से कोई कोई श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं, “शायद अब आपको सन्ध्या करनी होगी।”
श्रीरामकृष्ण – नहीं, ऐसा कुछ नहीं। यह सब पहले-पहल एक एक बार कर लेना पड़ता है। उसके बाद फिर अर्घ्यपात्र या नियम आदि की आवश्यकता नहीं रहती।
(२)
श्रीरामकृष्ण तथा आचार्य बेचाराम; वेदान्त और ब्रह्मतत्त्व के प्रसंग में
सन्ध्या के बाद आदि-समाज के आचार्य श्री बेचाराम ने वेदी पर बैठकर उपासना की। बीच बीच में ब्राह्मसंगीत और उपनिषद् का पाठ होने लगा।
उपासना के बाद श्रीरामकृष्ण के साथ बैठकर आचार्यजी अनेक प्रकार के वार्तालाप कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, निराकार भी सत्य है और साकार भी सत्य है। आपका क्या मत है?
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१९४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २२ अप्रैल, १८८३
आचार्य – जी, निराकार मानो electric current (बिजली का प्रवाह) है; आँखों से देखा नहीं जाता, परन्तु अनुभव किया जाता है।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, दोनों ही सत्य हैं। साकार-निराकार दोनों सत्य हैं। केवल निराकार कहना कैसा है जानते हो? जैसे शहनाई में सात छेद रहते हुए भी एक व्यक्ति केवल ‘पों’ करता रहता है, परन्तु दूसरे को देखो, कितनी ही रागरागिनियाँ बजाता है। उसी प्रकार देखो, साकारवादी ईश्वर का कितने भावों से आस्वाद लेता है। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर – अनेक भावों से।
“असली बात क्या है जानते हो? किसी भी प्रकार से अमृत के कुण्ड* में गिरना है। चाहे स्तव करके गिरो अथवा कोई धक्का दे दे और तुम जाकर कुण्ड में गिर पड़ो। परिणाम एक ही होगा। दोनों ही अमर होंगे।
“ब्राह्मों के लिए जल और बरफकी उपमा ठीक है। सच्चिदानन्द मानो अनन्त जलराशि हैं। महासागर का जल ठण्डे देश में स्थान स्थान पर जिस प्रकार बरफ का आकार धारण कर लेता है, उसी प्रकार भक्तिरूपी ठण्ड से वे सच्चिदानन्द भक्त के लिए साकार रूप धारण करते हैं। ऋषियों ने उस अतीन्द्रिय, चिन्मय रूप का दर्शन किया था और उनके साथ वार्तालाप किया था। भक्त के प्रेम के शरीर – भागवती तनु † द्वारा इस चिन्मय रूप का दर्शन होता है।
“फिर है ब्रह्म ‘अवाङ्मनसगोचरम्’ ज्ञानरूपी सूर्य के ताप से साकार बरफ गल जाती है; ब्रह्मज्ञान के बाद, निर्विकल्प समाधि के बाद फिर वही अनन्त, वाक्य-मन के अतीत, अरूप, निराकार ब्रह्म।
“उसका स्वरूप मुख से नहीं कहा जाता, चुप हो जाना पड़ता है। मुख से कहकर अनन्त को कौन समझाएगा? पक्षी जितना ही ऊपर उठता है, उसके ऊपर और भी है। आप क्या कहते हैं?”
आचार्य – जी हाँ, वेदान्त में इसी प्रकार की बातें हैं।
श्रीरामकृष्ण – नमक का पुतला समुद्र नापने गया था। लौटकर फिर उसने खबर न दी। एक मत में है, शुकदेव आदि ने दर्शन-स्पर्शन किया था, डुबकी नहीं लगायी थी।
“मैंने विद्यासागर से कहा था, ‘सब चीजें उच्छिष्ट हो गयी हैं, परन्तु ब्रह्म उच्छिष्ट
* अमृतकुण्ड :- आनन्दरूपम् अमृतं यद् विभाति। ब्रह्म एव इदम् अमृतम्, पुरस्ताद् ब्रह्म, पश्चाद् ब्रह्म, दक्षिणतश्चोत्तरेण, अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्म। – मुण्डक उपनिषद् २। २। ११
† नारद ने कहा था – “मुझे शुद्धा, सर्वमयी, भागवती तनु प्राप्त हो गयी।”
प्रयुज्यमाने मयि तां शुद्धां भागवतीं तनुम्।
आरब्धकर्मनिर्वाणो न्यपतत् पांचभौतिकः॥ – श्रीमद्भागवत १। ६। २९ ·
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नहीं हुआ।* अर्थात् ब्रह्म क्या है, कोई मुँह से कह नहीं सका। मुख से बोलने से ही चीज उच्छिष्ट हो जाती है।' विद्यासागर विद्वान् हैं, यह सुनकर बहुत खुश हुए।
“सुना है, केदार के उस तरफ बरफ से ढका पहाड़ है। अधिक ऊँचाई पर उठने से फिर लौटना नहीं होता। जो लोग यह जानने के लिए गए है कि अधिक ऊँचाई पर क्या है तथा वहाँ जाने पर कैसी स्थिति होती है, उन्होने फिर लौटकर खबर नहीं दी।
उठने से फिर लौटना नहीं होता। जो लोग यह जानने के लिए गए है कि अधिक ऊँचाई पर क्या है तथा वहाँ जाने पर कैसी स्थिति होती है, उन्होने फिर लौटकर खबर नहीं दी।
“उनका दर्शन होने पर मनुष्य आनन्द से विह्वल हो जाता है, चुप हो जाता है। खबर कौन देगा? समझाएगा कौन?
“सात फाटकों से परे राजा है। प्रत्येक फाटक पर एक एक महा ऐश्वर्यवान पुरुष बैठे है। प्रत्येक फाटक में शिष्य पूछ रहा है, ‘क्या यही राजा है?’ गुरु भी कह रहे हैं नहीं;’ नेति नेति। सातवें फाटक पर जाकर जो कुछ देखा, एकदम अवाक् रह गए! आनन्द से विह्वल हो गए। फिर यह पूछना न पडा कि क्या यही राजा है? देखते ही सब सन्देह मिट गये।†
आचार्य – जी हाँ, वेदान्त में इसी प्रकार सब लिखा है।
•श्रीरामकृष्ण – जब वे सृष्टि, स्थिति, प्रलय करते हैं, तब हम उन्हें सगुण ब्रह्म, आद्याशक्ति कहते हैं। जब वे तीनों गुणों से अतीत हैं, तब उन्हें निर्गुण ब्रह्म, वाक्य-मन के अतीत परब्रह्म कहा जाता है।
“मनुष्य उनकी माया में पड़कर अपने स्वरूप को भूल जाता है। इस बात को भूल जाता है कि वह अपने पिता के अनन्त ऐश्वर्य का अधिकारी है। उनकी माया त्रिगुणमयी है। ये तीनों ही गुण डाकू हैं। सब कुछ हर लेते हैं, हमारे स्वरूप को भुला देते हैं। सत्त्व, रज, तम तीन गुण हैं। इनमें से केवल सत्त्वगुण ही ईश्वर का रास्ता बताता है; परन्तु ईश्वर के पास सत्त्वगुण भी नहीं ले जा सकता।
“एक धनी जंगल के बीच में से जा रहा था। ऐसे समय तीन डाकुओं ने आकर उसे घेर लिया और उसका सब कुछ छीन लिया। सब कुछ छीनकर एक डाकू ने कहा, ‘अब इसे रखकर क्या करोगे! इसे मार डालो।’ ऐसा कहकर वह उसे काटने गया। दूसरा डाकू बोला, ‘जान से मत मारो; हाथ-पैर बाँधकर इसे यहीं पर छोड दिया जाय, तो फिर यह पुलिस को खबर नहीं दे सकेगा।’ यह कहकर उसे बाँधकर डाकू लोग वहीं छोड़कर चले
* अचिन्त्यम् अव्यपदेश्यम् अद्वैतम्। – माण्डूक्य उपनिषद्, ७
† यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सहं। – तैत्तिरीय उपनिषद् २। ९। १
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गए।
“थोड़ी देर के बाद तीसरा डाकू लौट आया। आकर बोला, 'खेद है; तुमको बहुत कष्ट हुआ? मैं तुम्हारा बन्धन खोले देता हूँ।' बन्धन खोलने के बाद उस व्यक्ति को साथ लेकर डाकू रास्ता दिखाता हुआ चलने लगा। सरकारी रास्ते के पास आकर उसने कहा, 'इस रास्ते से चले जाओ; अब तुम सहज ही अपने घर जा सकोगे।' उस व्यक्ति ने कहा, 'यह क्या महाशय? आप भी चलिए! आपने मेरा कितना उपकार किया! हमारे घर पर चलने से हम कितने आनन्दित होंगे!' डाकू ने कहा, 'नहीं, मेरे वहाँ जाने पर छुटकारे का उपाय नहीं, पुलिस पकड़ लेगी।' यह कहकर रास्ता बताकर वह लौट गया।
“पहला डाकू तमोगुण है, जिसने कहा था, 'इसे रखकर क्या करोगे, मार डालो।' तमोगुण से विनाश होता है। दूसरा डाकू रजोगुण है; रजोगुण से मनुष्य संसार में आबद्ध होता है; अनेकानेक कार्यों में जकड़ जाता है। रजोगुण ईश्वर को भुला देता है। सत्त्वगुण ही केवल ईश्वर का रास्ता बताता है। दया, धर्म, भक्ति यह सब सत्त्वगुण से उत्पन्न होते हैं। सत्त्वगुण मानो अन्तिम सीढ़ी है। उसके बाद ही है छत। मनुष्य का धाम है परब्रह्म। त्रिगुणातीत न होने पर ब्रह्मज्ञान नहीं होता।”
आचार्य – अच्छा हुआ, ये सब बड़ी अच्छी बातें हुईं।
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – भक्त का स्वभाव क्या है, जानते हो? मैं कहूँ, तुम सुनो; तुम कहो, मैं सुनूँ। तुम लोग आचार्य हो, कितने लोगों को शिक्षा दे रहे हो। तुम लोग जहाज हो, हम तो हैं मछुओं की छोटी नैया। (सभी हँस पड़े।)
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