श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
परिच्छेद ३०
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परिच्छेद ३०
सुरेन्द्र के मकान पर अन्नपूर्णा पूजा के उत्सव में
(१)
अहंकार। स्वाधीन इच्छा अथवा ईश्वर-इच्छा। साधुसंग
सुरेन्द्र के घर के आँगन में श्रीरामकृष्ण सभा को आलोकित कर बैठे हुए हैं। शाम के छः बजे होंगे।
आँगन से पूर्व की ओर, दालान के भीतर, देवीप्रतिमा प्रतिष्ठित है। माता के पादपद्मों में जवा और बिल्वपत्र तथा गले में फूलों की माला शोभायमान् है। माता दालान को आलोकित करके बैठी हुई हैं।
आज अन्नपूर्णा देवी की पूजा है। चैत्र शुक्ला अष्टमी, १५ अप्रैल १८८३, दिन रविवार। सुरेन्द्र माता की पूजा कर रहे हैं, इसीलिए निमन्त्रण देकर श्रीरामकृष्ण को ले आए हैं। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ आये हैं। आते ही उन्होंने दालान पर चढ़कर देवी के दर्शन किए। फिर प्रणाम करके खड़े होकर देवी की ओर देखते हुए उँगलियों पर मूलमन्त्र जपने लगे। भक्तगण दर्शन और प्रणाम करके पास ही खड़े हैं।
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ आँगन में आए। आँगन में दरी पर साफ चद्दर बिछी है। उस पर कुछ तकिये रखे हुए हैं। एक ओर मृदंग-करताल लेकर कुछ वैष्णव बैठे हुए हैं; संकीर्तन होगा। भक्तगण श्रीरामकृष्ण को घेरकर बैठ गए।
लोग श्रीरामकृष्ण को एक तकिये के पास ले जाकर बैठाने लगे; परन्तु वे तकिया हटाकर बैठे।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – तकिये के सहारे बैठना! जानते हो न अभिमान छोड़ना बड़ा कठिन है! अभी विचार कर रहे हो कि अभिमान कुछ नहीं है, परन्तु फिर न जाने कहाँ से आ जाता है
“बकरा काट डाला गया, फिर भी उसके अंग हिल रहे हैं।
“स्वप्न में डर गए हो; आँखें खुल गयीं, बिलकुल सचेत हो गए, फिर भी छाती धड़क रही है। अभिमान ठीक ऐसा ही है। हटा देने पर भी न जाने कहाँ से आ जाता है! बस आदमी मुँह फुलाकर कहने लगता है, मेरा आदर नहीं किया।”
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१५ अप्रैल, १८८३ परिच्छेद ३० १८७
केदार – 'तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना।'
श्रीरामकृष्ण – मैं भक्तों की रेणु की रेणु हूँ।
वैद्यनाथ आए हैं। वैद्यनाथ विद्वान् हैं। कलकत्ता के हाईकोर्ट के वकील हैं। वे श्रीरामकृष्ण को हाथ जोड़कर प्रणाम करके एक ओर बैठ गए।
सुरेन्द्र (श्रीरामकृष्ण से) – ये मेरे आत्मीय हैं।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, इनका स्वभाव तो बड़ा अच्छा है।
सुरेन्द्र – ये आपसे कुछ पूछना चाहते हैं, इसीलिए आए हैं।
श्रीरामकृष्ण (वैद्यनाथ से) – जो कुछ देख रहे हो, सभी उनकी शक्ति है। उनकी शक्ति के बिना कोई कुछ भी नहीं कर सकता। परन्तु एक बात है। उनकी शक्ति सब जगह बराबर नहीं है। विद्यासागर ने कहा था, 'परमात्मा ने क्या किसी को अधिक शक्ति दी है?' मैंने कहा, 'शक्ति अगर अधिक न देते तो तुम्हें हम लोग देखने क्यों आते? तुम्हारे दो सींग थोड़े ही हैं!' अन्त में यही ठहरा कि विभुरूप से सर्वभूतों में ईश्वर हैं, केवल शक्ति का भेद है।
वैद्यनाथ – महाराज! मुझे एक सन्देह है। यह जो Free Will अर्थात् स्वाधीन इच्छा की बात होती है, – कहते हैं कि हम इच्छा करें तो अच्छा काम भी कर सकते हैं और बुरा भी, – क्या यह सच है? क्या हम सचमुच स्वाधीन हैं?
श्रीरामकृष्ण – सभी ईश्वर के अधीन है। उन्हीं की लीला है। उन्होंने अनेक वस्तुओं की सृष्टि की है, – छोटी-बड़ी, भली-बुरी, मजबूत-कमजोर। अच्छे आदमी, बुरे आदमी। यह सब उन्हीं की माया है – उन्हीं का खेल है। देखो न, बगीचे के सब पेड़ बराबर नहीं होते।
"जब तक ईश्वर नहीं मिलते, तब तक जान पड़ता है, हम स्वाधीन हैं। यह भ्रम वे ही रख देते हैं, नहीं तो पाप की वृद्धि होती, पाप से कोई न डरता, न पाप की सजा मिलती।
"जिन्होंने ईश्वर को पा लिया है, उनका भाव जानते हो क्या है? मैं यन्त्र हूँ, तुम यन्त्री हो; मैं गृह हूँ, तुम गृही; मैं रथ हूँ, तुम रथी; जैसा चलाते हो, वैसा ही चलता हूँ; जैसा कहाते हो, वैसा ही कहता हूँ।
(वैद्यनाथ से) – "तर्क करना अच्छा नहीं। आप क्या कहते हैं?"
वैद्यनाथ – जी हाँ, तर्क करने का स्वभाव ज्ञान होने पर नष्ट हो जाता है।
श्रीरामकृष्ण – Thank you (धन्यवाद)! (लोग हँसते हैं।) तुम पाओगे। ईश्वर की बात कोई कहता है, तो लोगों को विश्वास नहीं होता। यदि कोई महापुरुष कहे, मैंने ईश्वर को देखा है, तो कोई उस महापुरुष की बात ग्रहण नहीं करता। लोग सोचते हैं, इसने अगर ईश्वर को देखा है तो हमें भी दिखाये तो जानें। परन्तु नाड़ी देखना कोई एक दिन में थोड़े
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१८८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १५ अप्रैल, १८८३
ही सीख लेता है! वैद्य के पीछे महीनों घूमना पड़ता है। तभी वह कह सकता है, कौन कफ की नाड़ी है, कौन पित्त की है और कौन वात की है। नाड़ी देखना जिनका पेशा है, उनका संग करना चाहिए। (सब हँसते हैं।)
“क्या सभी पहचान सकते हैं कि यह अमुक नम्बर का सूत है? सूत का व्यवसाय करो, जो लोग व्यवसाय करते हैं, उनकी दूकान में कुछ दिन रहो, तो कौन चालीस नम्बर का सूत है, कौन इकतालीस नम्बर का, तुरन्त कह सकोगे।”
(२)
भक्तों के साथ कीर्तनानन्द। समाधि में
अब संकीर्तन होगा। मृदंग बजाया जा रहा है। गोष्ठ मृदंग बजा रहा है। अभी गाना शुरू नहीं हुआ। मृदंग का मधुर वाद्य गौरांगमण्डल और उनके नामसंकीर्तन की याद दिलाकर मन को उद्दीप्त करता है। श्रीरामकृष्ण भाव में मग्न हो रहे हैं। रह-रहकर मृदंगवादक पर दृष्टि डालकर कह रहे हैं – “अहा! मुझे रोमांच हो रहा है!”
गवैयों ने पूछा, “कैसा पद गाएँ?” श्रीरामकृष्ण ने विनीत भाव से कहा, “जरा गौरांग के कीर्तन गाओ।”
कीर्तन आरम्भ हो गया। पहले गौरचन्द्रिका होगी, फिर दूसरे गाने।
कीर्तन में गौरांग के रूप का वर्णन हो रहा है। कीर्तन-गवैये अन्तरों में चुन-चुनकर अच्छे पद जोड़ते हुए गा रहे हैं – “सखि, मैंने पूर्णचन्द्र देखा”, “न हास है – न मृगांक”, “हृदय को आलोकित करता है।”
गवैयों ने फिर गाया – “कोटि चन्द्र के अमृत से उसका मुख धुला हुआ है।”
श्रीरामकृष्ण यह सुनते ही सुनते समाधिमग्न हो गए।
गाना होता ही रहा। कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। वे भाव में मग्न होकर एकाएक उठकर खड़े हो गए तथा प्रेमोन्मत्त गोपिकाओं की तरह श्रीकृष्ण के रूप का वर्णन करते हुए कीर्तन-गवैयों के साथ साथ गाने लगे – “सखि! रूप का दोष है या मन का?” “दूसरों को देखती हुई तीनों लोक में श्याम ही श्याम देखती हूँ।”
श्रीरामकृष्ण नाचते हुए गा रहे हैं। भक्तगण निर्वाक् होकर देख रहे हैं। गवैये फिर गा रहे है, – गोपिका की उक्ति – “बंसी री! तू अब न बज। क्या तुझे नींद भी नहीं आती?” इसमें पद जोड़कर गा रहे हैं – “और नींद आए भी कैसे!” – “सेज तो करपल्लव है न?” – “श्रीमुख के अमृत का पान करती है” – “तिस पर उँगलियाँ सेवा करती हैं।”
श्रीरामकृष्ण ने आसन ग्रहण किया। कीर्तन होता रहा। श्रीमती राधा की उक्ति गायी जाने लगी। वे कहती हैं – “दृष्टि, श्रवण और घ्राण की शक्ति तो चली गयी – सभी