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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | १२९

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | १२९

मैं तुम्हारा दास हूँ।' पाँचवीं और छठी भूमि के बीच में चक्कर काटना अच्छा है। छठी भूमि को पार कर सप्तम भूमि में अधिक देर तक रहने की मेरी इच्छा नहीं होती। मैं उनका नामगुण-कीर्तन करूँगा, यही मेरी इच्छा है। सेव्य-सेवक भाव बड़ा अच्छा है। और देखो, ये तरंगें गंगा ही की हैं, परंतु तरंगों की गंगा है ऐसा कोई नहीं कहता। 'मैं वही हूँ' यह अभिमान अच्छा नहीं। देहात्मबुद्धि के रहते ऐसा अभिमान जिसको होता है उसकी बड़ी हानि होती है, फिर वह आगे बढ़ नहीं सकता, गिरे पतित हो जाता है। वह दूसरों की आँखों में धूल झोंकता है, साथ ही अपनी आँख में भी; अपनी स्थिति का हाल वह नहीं समझ पाता।

भक्ति के दो प्रकार – उत्तम अधिकारी – ईश्वर दर्शन का उपाय

"परन्तु भेड़ियाधसान की भक्ति से ईश्वर नहीं मिलते, उन्हें पाने के लिए 'प्रेमाभक्ति' चाहिए। 'प्रेमाभक्ति' का एक और नाम है 'रागभक्ति'। प्रेम या अनुराग के बिना भगवान् नहीं मिलते। ईश्वर पर जब तक प्यार नहीं होता तब तक उन्हें कोई प्राप्त नहीं कर सकता।

"और एक प्रकार की भक्ति है उसका नाम है 'वैधीभक्ति'। इतना जप करना होगा, उपवास करना होगा, तीर्थयात्रा करनी होगी, इतने उपचारों से पूजा करनी होगी, बलिदान देना होगा – यह सब वैधीभक्ति है। इसका बहुत-कुछ अनुष्ठान करते करते क्रमशः रागभक्ति होती है। जब तक रागभक्ति न होगी, तब तक ईश्वर नहीं मिलेंगे। उन्हें प्यार करना चाहिए। जब संसारबुद्धि बिलकुल चली जाएगी – सोलह आना मन उन्हीं पर लग जाएगा, तब वे मिलेंगे।

"परन्तु किसी किसी को रागभक्ति अपने आप ही होती है। स्वतःसिद्ध, बचपन से ही। बचपन से ही वह ईश्वर के लिए रोता है, जैसे प्रह्लाद। 'विधिवादीय' भक्ति कैसी है? जैसे हवा लगने के लिए पंखा झलना। हवा के लिए पंखे की जरूरत है। ईश्वर पर अनुराग उत्पन्न करने के लिए जप, तप, उपवास आदि विधियाँ मानी जाती हैं; परन्तु जब दक्षिणी हवा आप बह चलती है तब लोग पंखा रख देते हैं। ईश्वर पर अनुराग, प्रेम, आप आ जाने से जप, तप आदि कर्म छूट जाते हैं। भगवत्प्रेम में मस्त हो जाने से वैध कर्म करने के लिए फिर किसको समय है?

"जब तक उन पर प्यार नहीं होगा, तब तक वह भक्ति कच्ची भक्ति है। जब उन पर प्यार होता है, तब वह भक्ति पक्की भक्ति कहलाती है।

"जिसकी भक्ति कच्ची है वह ईश्वर की कथा और उपदेशों की धारणा नहीं कर सकता। पक्की भक्ति होने पर ही धारणा होती है। फोटोग्राफ के शीशे पर अगर स्याही (Silver Nitrate) लगी हो तो जो चित्र उस पर पड़ता है वह ज्यों का त्यों उतर जाता है,


CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

१३०श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ दिसम्बर १८८२

परन्तु सादे शीशे पर चाहे हजारों चित्र दिखाए जाए, एक भी नहीं उतरता। शीशे पर से चित्र हटा कि वही ज्यों का त्यों सफेद शीशा! ईश्वर पर प्रीति हुए बिना उपदेशों की धारणा नहीं होती।”

विजय – महाराज, ईश्वर को कोई प्राप्त करना चाहे, उनके दर्शन करना चाहे, तो क्या सिर्फ भक्ति से काम सध जाएगा?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, भक्ति ही से उनके दर्शन हो सकते हैं। परन्तु पक्की भक्ति, प्रेमाभक्ति, रागभक्ति चाहिए। उसी भक्ति से उन पर प्रीति होती है, जैसा बच्चों का माँ पर प्यार, माँ का बच्चे पर प्यार और पत्नी का पति पर प्यार होता है।

“इस प्यार, इस रागभक्ति के होने पर, स्त्री-पुत्र और आत्मीय परिवार की ओर पहले जैसा आकर्षण नहीं रह जाता, फिर तो उन पर दया होती है। घर-द्वार विदेश जैसा जान पड़ता है, उसे देखकर सिर्फ एक कर्मभूमि का ख्याल जागता है; जैसे घर देहात में और कलकत्ता है कर्मभूमि, कलकत्ते में किराये के मकान में रहना पड़ता है कर्म करने के लिए। ईश्वर पर प्यार होने से संसार की आसक्ति – विषयबुद्धि – बिलकुल जाती रहेगी!

“विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते उनके दर्शन नहीं हो सकते। दियासलाई अगर भीगी हो तो चाहे जितना रगड़ो वह जलती ही नहीं – बीसों दियासलाई व्यर्थ ही बरबाद हो जाती हैं। विषयासक्त मन भीगी दियासलाई है।

“श्रीमती (राधिका) ने जब कहा, ‘मैं सर्वत्र कृष्णमय देखती हूँ’, तब सखियाँ बोलीं, ‘कहाँ, हम तो उन्हें नहीं देखतीं तुम प्रलाप तो नहीं कर रही हो?’ श्रीमती बोलीं, ‘सखियों, नेत्रों में अनुराग का अंजन लगा लो, तभी उन्हें देखोगी।’ (विजय से) तुम्हारे ब्राह्मसमाज ही के भजन में है – ‘प्रभो, बिना अनुराग के यज्ञ-यागादि करके क्या तुम्हें जाना जा सकता है?’

“यह अनुराग, यह प्रेम, यह सच्ची भक्ति, यह प्यार यदि एक बार भी हो तो साकार और निराकार दोनों मिल जाते हैं।”

ईश्वर-दर्शन उनकी कृपा बिना नहीं होता

विजय – महाराज, क्या किया जाय जो ईश्वर-दर्शन हो।

श्रीरामकृष्ण – चित्तशुद्धि के बिना ईश्वर के दर्शन नहीं होते। कामिनी-कांचन में पड़कर मन मलिन हो गया है, उसमें जंग लग गया है। सुई में कीच लग जाने से उसे चुम्बक नहीं खींच सकता, मिट्टी साफ कर देने ही से चुम्बक खींचता है। मन का मैल नेत्रजल से धोया जा सकता है। ‘हे ईश्वर, अब ऐसा काम न करूँगा’ यह कहकर यदि कोई अनुताप करता हुआ रोये तो मैल धुल जाता है। तब ईश्वररूपी चुम्बक मनरूपी सुई को खींच लेता है। तब समाधि होती है, ईश्वर के दर्शन होते हैं।