सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

परिच्छेद ४

परिच्छेद ४

चतुर्थ दर्शन

(१)

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥ (गीता, ६।२२)

नरेन्द्र, भवनाथ आदि के संग आनन्द

उसके दूसरे दिन (६ मार्च को) भी छुट्टी थी। दिन के तीन बजे मास्टर फिर आए। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में बैठे हैं। फर्श पर चटाई बिछी है। नरेन्द्र, भवनाथ तथा और भी दो एक लोग बैठे हैं। सभी अभी लड़के हैं, उम्र उन्नीस-बीस के लगभग होगी। प्रफुल्लमुख श्रीरामकृष्ण तखत पर बैठे हुए लड़कों से सानन्द वार्तालाप कर रहे हैं।

मास्टर को कमरे में घुसते देख श्रीरामकृष्ण ने हँसते हुए कहा, “यह देखो, फिर आया।” सब हँसने लगे। मास्टर ने भूमिष्ठ हो प्रणाम करके आसन ग्रहण किया। पहले वे खड़े खड़े हाथ जोड़कर प्रणाम करते थे – जैसा अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग करते हैं। पर आज उन्होंने भूमिष्ठ होकर प्रणाम करना सीखा। श्रीरामकृष्ण नरेन्द्रादि भक्तों से कहने लगे, “देखो, एक मोर को किसी ने चार बजे अफीम खिला दी। दूसरे दिन से वह अफीमची मोर ठीक चार बजे आ जाता था! यह भी अपने समय पर आया है।” सब लोग हँसने लगे।

मास्टर सोचने लगे, ये ठीक तो कहते हैं। घर जाता हूँ, पर मन दिन-रात यहीं पड़ा रहता है। कब जाऊँ, कब उन्हें देखूँ इसी विचार में रहता हूँ। यहाँ मानो कोई खींच ले आता है! इच्छा होने पर भी दूसरी जगह जा नहीं पाता, यहीं आना पड़ता है। इधर श्रीरामकृष्ण लड़कों से हँसी-मजाक करने लगे। मालूम होता था कि वे सब मानो एक ही उम्र के हैं। हँसी की लहरें उठने लगीं। मानो आनन्द की हाट लगी हो।

मास्टर यह अद्भुत चरित्र देखते हुए सोचते हैं कि पिछले दिन क्या इन्हीं को समाधि और अपूर्व प्रेमानन्द में मग्न देखा था? क्या ये वे ही मनुष्य हैं, जो आज प्राकृत मनुष्य जैसा व्यवहार कर रहे हैं? क्या इन्हीं ने मुझे पहले दिन उपदेश देते हुए धिक्कारा था? इन्हीं ने मुझे 'तुम ज्ञानी हो' कहा था? इन्हीं ने साकार और निराकार दोनों सत्य हैं,

२०श्रीरामकृष्णवचनामृत६ मार्च, १८८२

कहा था? इन्हीं ने मुझे कहा था कि ईश्वर ही सत्य हैं और सब अनित्य? इन्हीं ने मुझे संसार में दासी की भाँति रहने का उपदेश दिया था?

श्रीरामकृष्ण आनन्द कर रहे हैं और बीच बीच में मास्टर को देख रहे हैं। मास्टर को सविस्मय बैठे हुए देखकर उन्होंने रामलाल से कहा - "इसकी उम्र कुछ ज्यादा हो गयी है न, इसी से कुछ गम्भीर है। ये सब हँस रहे हैं; पर यह चुपचाप बैठा है।"

मास्टर की उम्र उस समय सत्ताईस साल की होगी।

बात ही बात में परम भक्त हनुमान की बात चली। हनुमान का एक चित्र श्रीरामकृष्ण के कमरे की दीवार पर टँगा था। श्रीरामकृष्ण ने कहा, "देखो तो, हनुमान का भाव कैसा है! धन, मान, शरीरसुख कुछ भी नहीं चाहते, केवल भगवान् को चाहते हैं। जब स्फटिक-स्तम्भ के भीतर से ब्रह्मास्त्र निकालकर भागे, तब मन्दोदरी नाना प्रकार के फल लेकर लोभ दिखाने लगी। उसने सोचा कि फल के लोभ से उतरकर शायद ये ब्रह्मास्त्र फेंक दें; पर हनुमान इस भुलावे में कब पड़ने लगे? उन्होंने कहा - मुझे फलों का अभाव नहीं है। मुझे जो फल मिला है, उससे मेरा जन्म सफल हो गया है। मेरे हृदय में मोक्षफल के वृक्ष श्रीरामचन्द्रजी हैं। श्रीराम-कल्पतरु के नीचे बैठा रहता हूँ; जब जिस फल की इच्छा होती है, वही फल खाता हूँ। फल के बारे में कहता हूँ कि तेरा फल मैं नहीं चाहता हूँ। तू मुझे फल न दिखा, मैं इसका प्रतिफल दे जाऊँगा।"

इसी भाव का एक गीत श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं। फिर वही समाधि; देह निश्चल, नेत्र स्थिर। बैठे हैं, जैसी मूर्ति फोटोग्राफ में देखने को मिलती है। भक्तगण अभी इतना हँस रहे थे पर अब सब एक दृष्टि से श्रीरामकृष्ण की इस अद्भुत अवस्था का दर्शन करने लगे। मास्टर दूसरी बार यह समाधि-अवस्था देख रहे थे।

बड़ी देर बाद अवस्था का परिवर्तन हो रहा है। देह शिथिल हो गयी, मुख सहास्य हो गया, इन्द्रियाँ फिर अपना अपना काम करने लगीं। नेत्रों से आनन्दाश्रु बहाते हुए 'राम राम' उच्चारण कर रहे हैं।

मास्टर सोचने लगे, क्या ये ही महापुरुष लड़कों के साथ दिल्लगी कर रहे थे? तब तो यह जान पड़ता था कि मानो पाँच वर्ष के बालक हैं।

श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ होकर फिर प्राकृत मनुष्यों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। मास्टर और नरेन्द्र से कहने लगे कि तुम दोनों अंग्रेजी में बातचीत करो, मैं सुनूँगा।

यह सुनकर मास्टर और नरेन्द्र हँस रहे हैं। दोनों परस्पर कुछ बातचीत करने लगे, पर बँग्ला में। श्रीरामकृष्ण के सामने मास्टर को तर्क करना सम्भव न था; क्योंकि तर्क का तो घर उन्होंने बन्द कर दिया है। अतएव मास्टर अब तर्क कैसे कर सकते हैं! श्रीरामकृष्ण ने फिर कहा, पर मास्टर के मुँह से अंग्रेजी तर्क न निकला।