श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
१६ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १० ६९
१६ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १० ६९
नरेन्द्र और उनके कुछ ब्राह्म मित्र पंचवटी के नीचे ध्यान कर रहे हैं। करीब साढ़े दस बजे होंगे। थोड़ी देर में श्रीरामकृष्ण वहाँ आए; मास्टर भी साथ हैं। श्रीरामकृष्ण कहते हैं –
(ब्राह्म भक्तों से) – “ध्यान करते समय ईश्वर में डूब जाना चाहिए, ऊपर ऊपर तैरने से क्या पानी के नीचेवाले लाल मिल सकते हैं?”
फिर आपने रामप्रसाद का एक गीत गाया जिसका आशय इस प्रकार है – “ऐ मन, काली कहकर हृदयरूपी रत्नाकर के अथाह जल में डुबकी लगा। यदि दो ही चार डुबकियों में धन हाथ न लगा, तो भी रत्नाकर शून्य नहीं हो सकता। पूरा दम लेकर एक ऐसी डुबकी लगा कि तू कुलकुण्डलिनी के पास पहुँच जाय। ऐ मन, ज्ञानसमुद्र में शक्तिरूपी मुक्ताएँ पैदा होती हैं। यदि तू शिव की युक्ति के अनुसार भक्तिपूर्वक ढूँढ़ेगा तो तू उन्हें पा सकेगा। उस समुद्र में काम आदि छः घड़ियाल हैं, जो खाने के लोभ से सदा ही घूमते रहते हैं। तो तू विवेकरूपी हल्दी बदन में चुपड़ ले – उसकी बू से वे तुझे छुएँगे नहीं। कितने ही लाल और माणिक उस जल में पड़े हैं। रामप्रसाद का कहना है कि यदि तू कूद पड़ेगा तो तुझे वे सब के सब मिल जाएँगे।”
ब्राह्मसमाज वक्तृता और समाजसंस्कार (Social Reforms) –
पहले ईश्वरलाभ, उसके बाद लोकशिक्षा
नरेन्द्र और उनके मित्र पंचवटी के चबूतरे से उतरे और श्रीरामकृष्ण के पास खड़े हुए। श्रीरामकृष्ण दक्षिणमुख होकर उनसे बातचीत करते करते अपने कमरे की तरफ आ रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – गोता लगाने से तुम्हें घड़ियाल पकड़ सकते हैं, पर हल्दी चुपड़ने से वे नहीं छू सकते। हृदयरूपी रत्नाकर के अथाह जल में काम आदि छः घड़ियाल रहते हैं, पर विवेकवैराग्यरूपी हल्दी चुपड़ने से वे फिर तुम्हें नहीं छुएँगे।
“केवल पण्डिताई या लेक्चर से क्या होगा यदि विवेक-वैराग्य न हुआ? ईश्वर सत्य हैं और सब कुछ अनित्य; वे ही वस्तु हैं, शेष सब अवस्तु – इसी का नाम विवेक है।
“पहले हृदय-मन्दिर में उनकी प्रतिष्ठा करो। वक्तृता, लेक्चर आदि जी चाहे तो उसके बाद करना। खाली ‘ब्रह्म ब्रह्म’ कहने से क्या होगा, यदि विवेक-वैराग्य न रहा? वह तो नाहक शंख फूंकना हुआ!
“किसी गाँव में पद्मलोचन नाम का एक लड़का था। लोग उसे पदुआ कहकर पुकारते थे। उसी गाँव में एक जीर्ण मन्दिर था। अन्दर देवता का कोई विग्रह न था – मन्दिर की दीवारों पर पीपल और अन्य प्रकार के पेड़-पौधे उग आए थे। मन्दिर के भीतर चमगीदड़ अड्डा जमाये हुए थे। फर्श पर गर्द और चमगीदड़ों की विष्ठा पड़ी रहती थी।
७० श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२
मन्दिर में लोगों का समागम नहीं होता था।
“एक दिन सन्ध्या के थोड़ी देर बाद गाँववालों ने शंख की आवाज सुनी। मन्दिर की तरफ से भों भों शंख बज रहा है। गाँववालों ने सोचा कि किसी ने देवता-प्रतिष्ठा की होगी, और सन्ध्या के बाद आरती हो रही है। लड़के, बूढ़े, औरत, मर्द, सब दौड़ते हुए मन्दिर के सामने हाजिर हुए – देवता के दर्शन करेंगे और आरती देखेंगे। उनमें से एक ने मन्दिर का दरवाजा धीरे से खोलकर देखा कि पद्मलोचन एक बगल में खड़ा होकर भों भों शंख बजा रहा है। देवता की प्रतिष्ठा नहीं हुई – मन्दिर में झाडू तक नहीं लगाया गया – चमगीदड़ों की विष्ठा पड़ी हुई है। तब वह चिल्लाकर कहता है – ‘तेरे मन्दिर में माधव कहाँ! पदुआ, तूने तो नाहक शंख फूँककर हुल्लड़ मचा दिया है। उसमें ग्यारह, चमगीदड़ रातदिन गश्त लगा रहे हैं –’
“यदि हृदय-मन्दिर में माधव-प्रतिष्ठा की इच्छा हो, यदि ईश्वर का लाभ करना चाहो तो, सिर्फ भों भों शंख फूँकने से क्या होगा! पहले चित्तशुद्धि चाहिए। मन शुद्ध हुआ तो भगवान् उस पवित्र आसन पर आ विराजेंगे। चमगीदड़ की विष्ठा रहने से माधव नहीं लाए जा सकते। ग्यारह चमगीदड़ का अर्थ है ग्यारह इन्द्रियाँ – पाँच ज्ञान की इन्द्रियाँ, पाँच कर्म की इन्द्रियाँ और मन। पहले माधव-प्रतिष्ठा, बाद में इच्छा हो तो वक्तृता, लेक्चर आदि देना।
“पहले डुबकी लगाओ। गोता लगाकर लाल उठाओ, फिर दूसरे काम करो।
“कोई गोता लगाना नहीं चाहता! न साधन, न भजन, न विवेक-वैराग्य – दो-चार शब्द सीख लिए, बस लगे लेक्चर देने! शिक्षा देना कठिन काम है। ईश्वर-दर्शन के बाद यदि कोई उनका आदेश पाए, तो वह लोगों को शिक्षा दे सकता है।”
अविद्या स्त्री। सच्ची भक्ति हो तो सभी वश में आ जाते हैं।
बातें करते हुए श्रीरामकृष्ण उत्तरवाले बरामदे के पश्चिम भाग में आ खड़े हुए। मणि पास खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण बारम्बार कह रहे हैं, ‘बिना विवेक-वैराग्य के भगवान् नहीं मिलेंगे।’ मणि विवाह कर चुके हैं इसीलिए व्याकुल होकर सोच रहे हैं कि क्या उपाय होगा। उनकी उम्र अट्ठाईस वर्ष की है, कालेज में पढ़कर उन्होंने कुछ अंग्रेजी शिक्षा पायी है। वे सोच रहे हैं – क्या विवेकवैराग्य का अर्थ कामिनी-कांचन का त्याग है?
मणि (श्रीरामकृष्ण से ) – यदि स्त्री कहे कि आप मेरी देखभाल नहीं करते हैं, मैं आत्महत्या करूँगी, तो कैसा होगा?
श्रीरामकृष्ण (गम्भीर स्वर से) – ऐसे स्त्री को त्यागना चाहिए, जो ईश्वर की राह में विघ्न डालती हो, चाहे वह आत्महत्या करे, चाहे और कुछ।
“जो स्त्री ईश्वर की राह में विघ्न डालती है, वह अविद्या स्त्री है।”