सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

११ मार्च, १८८३ | परिच्छेद २६ | १६३

११ मार्च, १८८३ | परिच्छेद २६ | १६३

“किस तरह, जानते हो। सच्चिदानन्द मानो एक अनन्त समुद्र है। ठण्डक के कारण समुद्र का पानी बर्फ बनकर तैरता है। पानी पर बर्फ के कितने ही आकार के टुकड़े तैरते हैं। वैसे ही भक्तिहिम के लगने से सच्चिदानन्द-सागर में साकार मूर्ति के दर्शन होते हैं। वे भक्त के लिए साकार होते हैं। फिर जब ज्ञानसूर्य का उदय होता है तब बर्फ गल जाती है, फिर वही पहले का पानी ज्यों का त्यों रह जाता है। ऊपर-नीचे जल ही जल भरा हुआ है। इसीलिए श्रीमद्भागवत में सब स्तव करते हैं, ‘हे देव, तुम्हीं साकार हो, तुम्हीं निराकार हो। हमारे सामने तुम मनुष्य बने घूम रहे हो, परन्तु वेदों ने तुम्हीं को वाक्य और मन से परे कहा है।’

“परन्तु यह कह सकते हो कि किसी किसी भक्त के लिए वे नित्य साकार हैं। ऐसा भी स्थान है जहाँ बर्फ गलती नहीं, स्फटिक का आकार धारण करती है।”

केदार – श्रीमद्भागवत में व्यासदेव* ने तीन दोषों के लिए परमात्मा से क्षमाप्रार्थना की है। एक जगह कहा है, हे भगवन् तुम मन और वाणी से दूर हो, किन्तु मैंने केवल तुम्हारी लीला, तुम्हारे साकार रूप का वर्णन किया; अतएव अपराध क्षमा करो।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, ईश्वर साकार भी हैं और निराकार भी, फिर साकार-निराकार के भी परे हैं। उनकी इति नहीं की जा सकती।

(६)

नित्यसिद्ध तथा कौमार-वैराग्य

राखाल के पिता बैठे हुए हैं। राखाल आजकल श्रीरामकृष्ण के पास ही रहते हैं। राखाल की माता के गुजर जाने पर उनके पिता ने अपना दूसरा विवाह कर लिया है। राखाल यहीं रहते हैं; इसलिए उनके पिता कभी कभी आया करते हैं। राखाल के यहाँ रहने में इनकी ओर से कोई बाधा नहीं है। ये श्रीमान् और विषयी मनुष्य हैं। सदा मुकदमों की पैरवी में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण के पास कितने ही वकील और डिप्टी मैजिस्ट्रेट आया करते हैं। राखाल के पिता इनसे वार्तालाप करने के लिए कभी कभी आ जाते हैं। उनसे मुकदमों की बहुतसी बातें सूझ जाती हैं।

श्रीरामकृष्ण रह-रहकर राखाल के पिता को देख रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की इच्छा है, राखाल उन्हीं के पास रह जाएँ।


* रूप रूपविवर्जितस्य भवतो ध्यानेन यत् कल्पितं
स्तुत्यनिर्वचनीयताऽखिलगुरो दूरीकृता यन्मया।
व्यापित्वञ्च निराकृतं भगवतो यत्तीर्थयात्रादिना,
क्षन्तव्यं जगदीश! तद्विकलतादोषत्रयं मत्कृतम्।।

१६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ११ मार्च, १८८३

श्रीरामकृष्ण (राखाल के पिता और भक्तों से) – अहा, आजकल राखाल का स्वभाव कैसा हुआ है! उसके मुँह पर दृष्टि डालने से देखोगे, उसके होंठ रह-रहकर हिल रहे हैं। अन्तर में ईश्वर का नाम जपता है, इसलिए होंठ हिलते रहते हैं।

“ये सब लड़के नित्यसिद्ध की श्रेणी के हैं। ईश्वर का ज्ञान साथ लेकर पैदा हुए हैं। कुछ उम्र होते ही ये समझ जाते हैं कि संसार की छूत देह में लगी तो फिर निस्तार न होगा। वेदों में ‘होमा’ पक्षी की कहानी है। वह चिड़िया आकाश में ही रहती है; जमीन पर कभी नहीं उतरती। आकाश ही में अण्डे देती है। अण्डे गिरते रहते हैं, पर वे इतनी ऊँचाई से गिरते हैं कि गिरते ही गिरते बीच में वे फूट जाते हैं। तब बच्चे निकल आते हैं। वे भी गिरने लगते हैं। उस समय भी वे इतने ऊँचे पर रहते हैं कि गिरते ही गिरते उनके पंख निकल आते हैं और आँखें भी खुल जाती हैं। तब वे समझ जाते हैं कि अरे हम मिट्टी में गिर जाएँगे, और गिरे तो चकनाचूर! मिट्टी देखते ही एकदम अपनी माता की ओर उड़ जाते हैं। माता के निकट पहुँचना ही उनका लक्ष्य हो जाता है।

“ये सब लड़के ठीक वैसे ही हैं। बचपन ही में संसार देखकर डर जाते हैं। इनकी एकमात्र चिन्ता यही है कि किस तरह माता के निकट जाएँ, किस प्रकार ईश्वर के दर्शन हों।

“यदि यह कहो कि ये रहे विषयी मनुष्यों में, पैदा हुए विषयी के यहाँ, फिर इनमें ऐसी भक्ति, ऐसा ज्ञान कैसे हो गया, तो इसका भी अर्थ है। मैली जमीन पर यदि चना गिर जाय, तो उसमें चना ही फलता है। उस चने से कितने अच्छे काम होते हैं। मैली जमीन पर गिर गया है, इसलिए उससे कोई दूसरा पौधा थोड़े ही होगा।

“अहा, राखाल का स्वभाव आजकल कैसा हो गया है! और होगा भी क्यों नहीं। यदि सूरण अच्छा हुआ, तो उसके अंकुर भी अच्छे होते हैं। (सब हँसते हैं।) जैसा बाप, वैसा उसका बेटा।”

मास्टर (गिरीन्द्र से अलग से) – साकार और निराकार की बात कैसी समझायी इन्होंने! जान पड़ता है, वैष्णव केवल साकार ही मानते हैं।

गिरीन्द्र – होगा। वे एक ही भाव पर अड़े रहते हैं।

मास्टर – ‘नित्य साकार’ आप समझे। स्फटिकवाली बात। मैं उसे अच्छी तरह नहीं समझ सका।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – क्यों जी, तुम लोग क्या बातचीत कर रहे हो।

मास्टर और गिरीन्द्र जरा हँसकर चुप हो गए।

वृन्दा दासी (रामलाल से) – रामलाल, अभी इस आदमी को मिठाइयाँ दो, हमें बाद में देना।

श्रीरामकृष्ण – वृन्दा को अभी मिठाइयाँ नहीं दी गयीं?