श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
७ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ८० | ६०१
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“परन्तु जो सच्चा साधु है - यथार्थ त्यागी है, वह न तो सोने की थाली चाहता है और न मान। परन्तु यह भी है कि ईश्वर उनके लिए किसी बात की कमी नहीं रखते। उन्हें पाने के लिए प्रयत्न करते हुए जिसे जिस चीज की जरूरत होती है, वे पूरी कर देते हैं।
“आप हाकिम हैं - क्या कहूँ - जो कुछ अच्छा समझो, वही करो। मैं तो मूर्ख हूँ।”
अधर - (हँसते हुए, भक्तों से) - क्या ये मेरी परीक्षा ले रहे हैं?
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - निवृत्ति ही अच्छी है। देखो न, मैंने दस्तखत नहीं किये। ईश्वर ही वस्तु हैं और सब अवस्तु।
हाजरा भक्तों के पास जमीन पर आकर बैठे। हाजरा कभी कभी ‘सोऽहम्-सोऽहम्’ किया करते हैं। वे लाटू आदि भक्तों से कहते हैं - ‘उनकी पूजा करके क्या होता है? उन्हीं की वस्तु उन्हें दी जाती है।’ एक दिन उन्होंने नरेन्द्र से भी यही बात कही थी। श्रीरामकृष्ण हाजरा से कह रहे हैं -
“लाटू से मैंने कहा था, कौन किसकी भक्ति करता है।”
हाजरा - भक्त आप ही अपने को पुकारता है।
श्रीरामकृष्ण - यह तो बड़ी ऊँची बात है। महाराज बलि से वृन्धावलि ने कहा था, तुम ब्रह्मण्य देव को क्या धन दोगे?
“तुम जो कुछ कहते हो, उसी के लिए साधन-भजन तथा उनके नाम और गुणों का कीर्तन है।
“अपने भीतर अगर दर्शन हो जायँ तब तो सब हो गया। उसके देखने के लिए ही साधना की जाती है। और उसी साधना के लिए शरीर है। जब तक सोने की मूर्ति नहीं ढल जाती तब तक मिट्टी के साँचे की जरूरत रहती है। सोने की मूर्ति के बन जाने पर मिट्टी का साँचा फेंक दिया जाता है। ईश्वर के दर्शन हो जाने पर शरीर का त्याग किया जा सकता है।
“वे केवल अन्तर में ही नहीं हैं, बाहर भी हैं। काली-मन्दिर में माँ ने मुझे दिखाया, सब कुछ चिन्मय है। माँ स्वयं सब कुछ बनी हैं - प्रतिमा, मैं, पूजा की चीजें, पत्थर - सब चिन्मय हैं।
“इसका साक्षात्कार करने के लिए ही साधन-भजन, नाम-गुण-कीर्तन आदि सब हैं। इसके लिए ही उनकी भक्ति करना है। वे लोग (लाटू आदि) अभी साधारण भावों को लेकर हैं - अभी उतनी ऊँची अवस्था नहीं हुई। वे लोग भक्ति लेकर हैं। और उनसे ‘सोऽहम्’ आदि बातें मत कहना।”
अधर और निरंजन जलपान करने के लिए बरामदे में गये। मास्टर श्रीरामकृष्ण के पास जमीन पर बैठे हुए हैं।
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| ६०२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ७ सितम्बर, १८८४ |
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अधर – (सहास्य) – हम लोगों की इतनी बातें हो गयीं, ये (मास्टर) तो कुछ भी न बोले।
श्रीरामकृष्ण – केशव के दल का एक लड़का – वह चार परीक्षाएँ पास कर चुका था – सब को मेरे साथ तर्क करते हुए देखकर बस मुस्कराता था और कहता था, इनसे भी तर्क! मैंने केशव सेन के यहाँ एक बार और उसे देखा था, परन्तु तब उसका वह चेहरा न रह गया था।
विष्णुमन्दिर के पुजारी राम चक्रवर्ती श्रीरामकृष्ण के कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – “देखो राम! तुमने क्या दयाल से मिश्री की बात कही है? – नहीं-नहीं, इसके कहने की जरूरत नहीं है। बड़ी बड़ी बातें हो गयी हैं।”
रात में श्रीरामकृष्ण काली के प्रसाद की दो-एक पूड़ियाँ तथा सूजी की खीर खाते हैं। श्रीरामकृष्ण जमीन पर, आसन पर प्रसाद पाने के लिए बैठे। पास ही मास्टर बैठे हुए हैं, लाटू भी कमरे में हैं। भक्तगण सन्देश तथा कुछ मिठाइयाँ ले आये थे। एक सन्देश लेते ही श्रीरामकृष्ण ने कहा, यह किसका सन्देश है? इतना कहकर खीरवाले कटोरे से निकालकर उन्होंने वह नीचे डाल दिया। (मास्टर और लाटू से) – “यह मैं सब जानता हूँ। आनन्द चैटर्जी का लड़का ले आया है जो घोषपाड़ा-वाली औरत के पास जाता है।”
लाटू ने एक दूसरी बर्फी देने के लिए पूछा।
श्रीरामकृष्ण – किशोरी लाया है।
लाटू – क्या इसे दूँ?
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – हाँ।
मास्टर अंग्रेजी पढ़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे कहने लगे –
“सब लोगों की चीजें नहीं खा सकता। क्या यह सब तुम मानते हो?”
मास्टर – देखता हूँ, सब धीरे धीरे मानना पड़ेगा।
श्रीरामकृष्ण – हाँ।
श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले गोल बरामदे में हाथ धोने के लिए गये। मास्टर हाथ पर पानी छोड़ रहे हैं।
शरत्काल है। चाँद निकला हुआ है। आकाश निर्मल है। भागीरथी का हृदय स्वच्छ दर्पण के समान झलक रहा है; भांटे का समय है, भागीरथी दक्षिण की ओर बह रही हैं; मुँह धोते हुए श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं – ‘तो नारायण को रुपया दोगे न?’ मास्टर – ‘जी हाँ, जैसी आज्ञा, जरूर दूँगा।’
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar