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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
DevanagariHindipublished711 पृष्ठ
९ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५२ ३०१
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९ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५२ ३०१
बीमार है, उसके लिए आप दो धोतियाँ और दो कमीज लेते आइयेगा, हम लोग उसके गाँव में भेज देंगे।’' सेन बस दो ही रुपये लाया! यह भला क्या है? इतना धन है और यह दान! कहो जी!
मणि – जी, मेरी समझ में तो यह आता है कि जिसे ईश्वर की जिज्ञासा है, ज्ञानलाभ जिसका उद्देश्य है, वह कभी ऐसा नहीं कर सकता।
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर ही वस्तु है और सब अवस्तु।
<div align="center">□ □ □</div>CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar