श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
९ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५२ २९७
९ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५२ २९७
श्रीरामकृष्ण तथा कामिनी-कांचन
“यहाँ सींती का महेन्द्र पाल पाँच रुपये दे गया था, रामलाल के पास। उसके चले जाने के बाद रामलाल ने मुझसे कहा। मैंने पूछा, क्यों दिया? रामलाल ने कहा, यहाँ के खर्च के लिए दिया है। तब याद आया, दूधवाले को कुछ देना है; हो न हो, इन्हीं रुपयों से कुछ दे दिया जाय। परन्तु यह क्या आश्चर्य! मैं रात को सोया हुआ था, एकाएक उठ पड़ा। छाती के भीतर मानो कोई बिल्ली की तरह खरोंचने लगा। तब रामलाल के पास जाकर मैंने कहा, किसे दिया है? – तेरी चाची को? रामलाल ने कहा, नहीं, आपके लिए। तब मैंने कहा, नहीं, रुपये जाकर अभी वापस दे आ, नहीं तो मुझे शान्ति न होगी।
“रामलाल सुबह को उठकर जब रुपये वापस दे आया, तब तबीयत ठीक हुई!”
“उस देश की भगवतिया तेलिन कर्ताभजा दल की है। वे सब औरत लेकर साधना किया करते हैं। एक पुरुष के हुए बिना स्त्री की साधना होगी ही नहीं। उस पुरुष को ‘रागकृष्ण’ कहते हैं। तीन बार स्त्री से पूछा जाता है, तूने कृष्ण को पाया? वह स्त्री तीनों बार कहती है, पाया।
“भगवतिया शूद्र है, तेलिन है, परन्तु सब उसके पास जाकर उसके पैरों की धूल लेते थे, उसे नमस्कार करते थे। तब जमींदार को इस पर बड़ा क्रोध आ गया। मैंने उसे देखा है। जमींदार ने उसके पास एक बदमाश भेज दिया। उससे वह फँस गयी और उसके गर्भ रहा।”
“एक दिन एक बड़ा आदमी आया था। मुझसे कहा, ‘महाराज, इस मुकदमे में ऐसा कर दीजिये कि मैं जीत जाऊँ। आपका नाम सुनकर आया हूँ।’ मैंने कहा, ‘भाई, वह मैं नहीं हूँ। तुम्हारी भूल हुई। वह अचलानन्द है।’
“ईश्वर पर जिसकी सच्ची भक्ति है, वह शरीर, रुपया आदि की थोड़ी भी परवाह नहीं करता। वह सोचता है, देहसुख के लिए, लोकसम्मान के लिए, रुपयों के लिए, क्या जप और तप करूँ? ये सब अनित्य हैं, चार दिन के लिए हैं।”
आये हुए सब बाबू लोग उठे। उन्होंने नमस्कार करके कहा, ‘तो हम चलें।’ वे चले गए। श्रीरामकृष्ण मुस्करा रहे हैं और मास्टर से कह रहे हैं – “चोर धर्म की बात नहीं सुनते।” (सब हँसते हैं।
(४)
विश्वास चाहिए
श्रीरामकृष्ण (मणि से सहास्य) – अच्छा, नरेन्द्र कैसा है?
मणि – जी, बहुत अच्छा है।
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श्रीरामकृष्ण – देखो, उसकी जैसी विद्या है, वैसी ही बुद्धि भी है। और गाना-बजाना भी जानता है। इधर जितेन्द्रिय भी है; कहता है, विवाह न करूँगा।
मणि – आपने कहा है, जो पाप पाप सोचता रहता है, वह पापी हो जाता है, फिर वह उठ नहीं सकता। मैं ईश्वर की सन्तान हूँ, यह विश्वास यदि हुआ तो बहुत शीघ्रता से उन्नति होती है।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, विश्वास चाहिए।
“कृष्णकिशोर का कैसा विश्वास है। कहता था, ‘मैं एक बार उनका नाम ले चुका, अब मुझमें पाप कहाँ रह गया? मैं शुद्ध और निर्मल हो गया हूँ।’ हलधारी ने कहा था, ‘अजामिल फिर नारायण की तपस्या करने गया था; तपस्या न करने पर क्या उनकी कृपा होती है? – केवल एक बार नारायण कहने से क्या होगा?’ यह बात सुनकर कृष्णकिशोर को इतना क्रोध आया कि बगीचे में फूल तोड़ने आया था – उसने हलधारी की ओर फिर एक दृष्टि भी नहीं फेरी।
“हलधारी का बाप बड़ा भक्त था। स्नान करते हुए कमरभर पानी में जब वह मन्त्र पढ़ता था, – ‘रक्तवर्णं चतुर्मुखम्’ आदि कहते हुए ध्यान करता था, – तब उसकी आँखों से अनर्गल प्रेमाश्रु बह चलते थे।
“एक दिन ऐँड़ेदा के घाट पर एक साधु आया। बात हुई, हम लोग भी देखने जाएँगे। हलधारी ने कहा, ‘उस पंचभूतों के गिलाफ को देखकर क्या होगा?’ इसके बाद कृष्णकिशोर ने यह बात सुनकर कहा था, ‘क्या! साधु के दर्शन से क्या होगा ऐसी बात भी उसके मुँह से निकली! जो लोग कृष्ण का नाम लेते हैं या रामनाम का जप करते हैं, उनकी देह चिन्मय होती है और वे सब चिन्मय देखते हैं – चिन्मय शाम, चिन्मय धाम!’ उसने कहा था, ‘एक बार कृष्ण या राम का नाम लेने पर सौ बार के सन्ध्या करने का फल होता है।’ जब उसके एक लड़के की मृत्यु होने लगी तब मरते समय राम का नाम लेकर उसने देह छोड़ी थी। कृष्णकिशोर कहता था, ‘उसने राम का नाम लिया है, उसे अब क्या चिन्ता है?’ परन्तु कभी कभी रो पड़ता था। पुत्र का शोक!
“वृन्दावन में उसे प्यास लगी थी। मोची से उसने कहा, ‘तू शिव का नाम ले।’ उसने शिव का नाम लेकर पानी भर दिया – उस तरह का आचारी ब्राह्मण होकर भी उसने वह पानी पी लिया कितना बड़ा विश्वास है।
“विश्वास नहीं है, और पूजा, जप, सन्ध्यादि कर्म करता है, इससे कुछ नहीं होगा! क्यों जी?”
मास्टर – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – गंगा के घाट में नहाने के लिए लोग आते हैं। मैंने देखा है, उस समय दुनिया भर की बातें करते हैं। किसी की विधवा बुआ कह रही है – “बहू,
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मेरे बिना रहे दुर्गापूजा नहीं होती। मैं न रहूँ तो ‘श्री’मूर्ति भी सुडौल न हो! घर में शादी-ब्याह कुछ हुआ तो सब काम मुझे ही करना पड़ता है, नहीं तो अधूरा रह जाय। फूलशय्या का बन्दोबस्त, कत्थे के बगीचे की तैयारी सब मैं ही करती हूँ।”
मणि – जी, इनका भी क्या दोष – क्या लेकर रहें।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – छत पर ठाकुरजी के लिए घर बनाया है। नारायण की पूजा हो रही है। पूजा का नैवेद्य, चन्दन यह सब तैयार किया जा रहा है। परन्तु ईश्वर की बात कहीं एक भी नहीं होती। क्या पकाना चाहिए, – आज बाजार में कोई अच्छी चीज नहीं मिली, कल अमुक व्यंजन अच्छा बना था, – वह लड़का मेरा चचेरा भाई हैं, – क्यों रे, तेरी वह नौकरी है न? – और मैं अब कैसी हूँ! – मेरा हरि चल बसा!’ बस यही सब बातें होती हैं!
“देखो भला, ठाकुरजी की पूजा के समय ये सब दुनिया भर की बातें!”
मणि – जी, अधिक संख्या ऐसे ही लोगों की है। आप जैसा कहते हैं, ईश्वर पर जिसका अनुराग है, उसे अधिक दिनों तक पूजा और सन्ध्या थोड़े ही करनी पड़ती है!
(३)
चिन्मय रूप। ज्ञान और विज्ञान। ‘ईश्वर ही वस्तु हैं’
श्रीरामकृष्ण एकान्त में मणि के साथ बातचीत कर रहे हैं।
मणि – अच्छा, वही अगर सब कुछ हुए हैं, तो इस तरह के अनेक भाव क्यों दीख पड़ते हैं?
श्रीरामकृष्ण – विभु के स्वरूप से वे सर्वभूतों में हैं परन्तु शक्ति की विशेषता हैं। कहीं तो उनकी विद्याशक्ति है और कहीं अविद्याशक्ति, कहीं ज्यादा शक्ति है और कहीं कम। देखो न, आदमियों के भीतर ठग-चोर भी हैं और बाघ जैसे भयानक प्रकृतिवाले भी हैं। मैं कहता हूँ, ठगनारायण हैं, बाघनारायण हैं।
मणि – (सहास्य) – जी, उन्हें तो दूर ही से नमस्कार करना चाहिए। बाघनारायण के पास जाकर अगर कोई उन्हें भर बाँह भेंटने लगे, तब तो वे उसे कलेवा ही कर जाएँ।
श्रीरामकृष्ण – वे और उनकी शक्ति – ब्रह्म और शक्ति – इसके सिवाय और कुछ नहीं है। नारद ने रामचन्द्रजी से स्तव करते हुए कहा – हे राम, तुम्हीं शिव हो, सीता भगवती हैं; तुम ब्रह्मा हो, सीता ब्रह्माणी हैं; तुम इन्द्र हो, सीता इन्द्राणी हैं; तुम नारायण हो, सीता लक्ष्मी; पुरुषवाचक जो कुछ हैं, सब तुम्हीं हो, स्त्रीवाचक जो कुछ है, सब सीता।
मणि – और चिन्मय रूप?
श्रीरामकृष्ण कुछ देर बाद विचार करने लगे। फिर धीमे स्वर में कहा, “वह किस
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तरह है बताऊँ – जैसे पानी का...। ये सब बातें साधना करने पर समझ में आती हैं।
“रूप पर विश्वास करना। जब ब्रह्मज्ञान होता है, अभेदता तब होती है। ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं। जैसे अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति। अग्नि को सोचने पर साथ ही उसकी दाहिका शक्ति को भी सोचना पड़ता है; और दाहिका शक्ति को सोचने पर अग्नि को भी सोचना पड़ता है; जैसे दूध और दूध की धवलता, जल और उसकी हिमशक्ति।
“परन्तु ब्रह्मज्ञान के बाद भी अवस्था है। ज्ञान के बाद विज्ञान है। जिसे ज्ञान है, जिसे बोध हो गया, उसमें अज्ञान भी है। शत पुत्रों के शोक से वशिष्ठ को भी रोना पड़ा था। लक्ष्मण के पूछने पर राम ने कहा, भाई, ज्ञान और अज्ञान के पार जाओ; जिसे ज्ञान है, उसे अज्ञान भी है। पैर में अगर काँटा चुभ जाय, तो एक दूसरा काँटा लेकर वह निकाल दिया जाता है, फिर उसके साथ दूसरा काँटा भी फेंक दिया जाता है।”
मणि – क्या अज्ञान और ज्ञान दोनो फेंक दिये जाते हैं?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, इसीलिए विज्ञान की आवश्यकता है।
“देखो न, जिसे उजाले का ज्ञान है, उसे अँधेरे का भी है; जिसे सुख का बोध है, उसे दुःख का भी है; जिसे पुण्य का विचार है, उसे पाप का भी है; जिसे भले का स्मरण है, उसे बुरे का भी है; जिसे शुचिता का अनुभव है, उसे अशुचिता का भी है; जिसे ‘अहं’ का ध्यान है, उसे ‘तुम’ का भी है!”
“विज्ञान – अर्थात् उन्हें विशेष रूप से जानना। लकड़ी में आग है; इस बोध – इस विश्वास – का नाम है ज्ञान, और उस आग से खाना पकाना, खाना खाकर हृष्ट-पुष्ट होना, इसका नाम है विज्ञान। ईश्वर हैं, हृदय में यह बोध होना इसका नाम हैं ज्ञान और उनके साथ वार्तालाप, उन्हें लेकर आनन्द करना – चाहे जिस भाव से हो, दास्य या सख्य या वात्सल्य या मधुर से – इसका नाम है विज्ञान। जीव और यह प्रपंच वे ही हुए हैं, इसके दर्शन करने का नाम है विज्ञान। एक विशेष मत के अनुसार कहा जाता है कि दर्शन हो नहीं सकते, कौन किसके दर्शन करे? वह तो अपने ही स्वरूप के दर्शन करता है। कालेपानी में जहाज जब चला जाता है, तब लौट नहीं सकता, लौटकर खबर नहीं दे सकता।”
मणि – जैसा आप कहते हैं, मानूमेण्ट के ऊपर चढ़ जाने पर फिर नीचे की खबर नहीं रहती कि गाड़ी, घोड़े, मेम, साहब, घर-द्वार, दूकाने, आफिस कहाँ है।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, आजकल कालीमन्दिर मैं नहीं जाया करता, कुछ अपराध तो न होगा? नरेन्द्र कहता था, ये अब भी कालीमन्दिर जाया करते हैं?
मणि – जी, आपकी नयी नयी अवस्थाएँ हुआ करती हैं। आपका भला अपराध क्या है!
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, हृदय के लिए उन लोगों ने सेन से कहा था, ‘हृदय बहुत