श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
१५ नवम्बर १८८२ | परिच्छेद १५ | १११
१५ नवम्बर १८८२ | परिच्छेद १५ | १११
(भावार्थ) – “महामाया की विचित्र माया है, कैसा मोहजाल फैला रखा है! जिसके प्रभाव से ब्रह्मा विष्णु भी अचेतन्य हैं, फिर जीव की क्या बात? बिछे हुए जाल में मछली प्रवेश करती है, पर आने-जाने का रास्ता रहते हुए भी फिर उसमें से भाग नहीं सकती।”
श्रीरामकृष्ण फिर कह रहे हैं, “जीव मानो दाल है। चक्की में पड़े हैं, पिस जाएँगे। परन्तु जो थोड़ेसे दाल के दाने खूँटी को पकड़कर रहते हैं वे नहीं पिसते। इसलिए खूँटी अर्थात् ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। उन्हें पुकारो, उनका नाम लो, तब मुक्ति होगी। नहीं तो कालरूपी चक्की में पिस जाओगे।”
श्रीरामकृष्ण फिर गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) – “माँ, भवसागर में पड़कर शरीर-रूपी यह नौका डूब रही है। हे शंकरि, माया की आँधी और मोह का तूफान अधिकाधिक तेज हो रहा है। एक तो मनरूपी माझी अनाड़ी है, उस पर छः खेवैये गँवार हैं। आँधी में मँझधार में आकर डूबा जा रहा हूँ। भक्ति का डाँड़ टूट गया, श्रद्धा का पाल फट गया, नाव काबू से बाहर हो गयी, अब मैं उपाय क्या करूँ? और तो कोई उपाय नहीं दीखता, सोचकर लाचार हो रहा हूँ। तरंग में तैरकर श्रीदुर्गानामरूपी ‘भेले’ को पकड़ता हूँ।”
स्त्री-पुत्रों के प्रति कर्तव्य
विश्वास बाबू बहुत देर से बैठे थे, अब उठकर चले गए। उनके पास काफी धन था, परन्तु चरित्र भ्रष्ट हो जाने से सारा धन उड़ गया। अब स्त्री, कन्या आदि किसी को नहीं देखते हैं। बलराम के उनकी बात उठाने पर श्रीरामकृष्ण बोले, “वह अभागा दरिद्री है। गृहस्थ के कर्तव्य है, ऋण है; देवऋण, पितृऋण, ऋषिऋण – फिर परिवार का ऋण है। सती स्त्री होने पर उसका पालन-पोषण, सन्तान जब तक योग्य नहीं बन जाते हैं, तब तक उनका पालन-पोषण करना पड़ता है।
“साधु ही केवल संचय नहीं करेगा। ‘पंछी और दरवेश’ संचय नहीं करते हैं। परन्तु मादा पक्षी के बच्चा होने पर वह संचय करती है। बच्चे के लिए मुख से उठाकर खाना ले जाती है।”
बलराम – अब विश्वास बाबू की साधुसंग करने की इच्छा है।
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – साधु का कमण्डलु चार धाम घूमकर आता है, परन्तु वैसा ही कड़ुआ का कड़ुआ रहता है। मलय की हवा जिन पेड़ों को लगती है वे सब चन्दन हो जाते हैं, परन्तु सेमल, बड़ आदि चन्दन नहीं बनते! कोई कोई साधुसंग करते हैं गाँजा पीने के लिए! (हँसी) साधु लोग गाँजा पीते हैं, इसीलिए उनके पास आकर बैठते हैं, गाँजा तैयार कर देते हैं और प्रसाद पाते हैं! (सभी हँस पड़े।)