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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद २० | १३३

दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद २० | १३३

हुए मेरे मनरूपी गाय को वशीभूत कर मेरे हृदयरूपी चरागाह में निवास करो। मेरी इस कामना की पूर्ति करो, यही प्रार्थना है। इस समय मेरे प्रेमरूपी यमुना के तट पर आशारूपी वट के नीचे कृपा करके प्रकट होकर निवास करो। यदि कहो कि गोपालों के प्रेम में बन्दी होकर ब्रजधाम में रहता हूँ, तो यह अज्ञानी ‘दाशरथि’ तुम्हारा गोपाल, तुम्हारा दास बनेगा।”

(२) “हे मेरे प्राणरूपी पिंजरे के पक्षी, गाओ न। ब्रह्मरूपी कल्पतरु पर बैठकर, हे पक्षी, तुम प्रभु के गुण गाओ न। और साथ ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-रूपी पके फलों को खाओ न।”

नन्दनबागान के श्रीनाथ मित्र अपने मित्रों के साथ आये हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें देखकर कहते हैं, “यह देखो, इनकी आँखों में से भीतर का सब कुछ दिखायी पड़ रहा है, खिड़की के काँच में से जिस प्रकार कमरे के भीतर की सभी चीजें देखी जाती हैं।' श्रीनाथ, यज्ञनाथ ये लोग नन्दनबागान के ब्राह्मपरिवार के हैं। इनके मकान पर प्रतिवर्ष ब्राह्मसमाज का उत्सव होता था। बाद में श्रीरामकृष्ण उत्सव देखने गये थे।

सायंकाल को मन्दिर में आरती होने लगी। कमरे में छोटे तखत पर बैठकर श्रीरामकृष्ण ईश्वर-चिन्तन कर रहे हैं। धीरे धीरे भावमग्न हो गए। भाव शान्त होने पर कहते हैं, “माँ, उसे भी खींच लो। वह इतने दीन भाव से रहता है, तुम्हारे पास आना-जाना कर रहा है!”

श्रीरामकृष्ण भाव में क्या बाबूराम की बात कह रहे हैं?

बाबूराम, मास्टर, रामदयाल आदि बैठे हैं। रात के आठ-नौ बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण समाधि-तत्त्व समझा रहे हैं। जड़ समाधि, चेतन समाधि, स्थित समाधि, उन्मना समाधि।

विद्यासागर और चंगेजखान। क्या ईश्वर निष्ठुर हैं? श्रीरामकृष्ण का उत्तर

सुख-दुःख की बात चल रही है। ईश्वर ने इतना दुःख क्यों बनाया?

मास्टर – विद्यासागर प्रेमकोप से कहते हैं, “ईश्वर को पुकारने की क्या आवश्यकता है! देखो चंगेजखाँ ने जिस समय लूटमार करना आरम्भ किया उस समय उसने अनेक लोगों को बन्द कर दिया। धीरे धीरे करीब एक लाख कैदी इकट्ठे हो गए। तब सेनापतियों ने आकर कहा, 'हुजूर, इन्हें खिलाएगा कौन? इन्हें साथ रखने पर भी हमारे लिए विपत्ति है। क्या किया जाए? छोड़ने पर भी विपत्ति है।' उस समय चंगेजखाँ ने कहा, 'तो फिर क्या किया जाए? उनका वध कर डालो।' इसलिए कचाकच काट डालने का आदेश हो गया! इस हत्याकाण्ड को तो ईश्वर ने देखा। कहाँ, निवारण भी तो नहीं किया। वे हैं, तो रहें। मुझे उनकी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। मेरा तो कोई भला न हुआ!”

१३४श्रीरामकृष्णवचनामृतदिसम्बर १८८२

श्रीरामकृष्ण – क्या ईश्वर का काम, वे किस उद्देश्य से क्या करते हैं समझा जा सकता है? वे सृष्टि, पालन, संहार सभी कर रहे हैं। वे क्यों संहार कर रहे हैं, हम क्या समझ सकते हैं? मैं कहता हूँ, माँ, मुझे समझने की आवश्यकता भी नहीं है। बस, अपने चरणकमल में भक्ति दो। मनुष्य-जीवन का उद्देश्य है इसी भक्ति को प्राप्त करना। और सब माँ जानें। बगीचे में आम खाने को आया हूँ, कितने पेड़, कितनी शाखाएँ, कितने करोड़ पत्ते हैं – यह सब हिसाब करने से मुझे क्या मतलब? मैं आम खाता हूँ, पेड़ और पत्तों के हिसाब से मेरा क्या सम्बन्ध?

आज रात में बाबूराम, मास्टर और रामदयाल श्रीरामकृष्ण के कमरे में जमीन पर सोये।

आधी रात, दो-तीन बजे का समय होगा, श्रीरामकृष्ण के कमरे में बत्ती बुझ गयी है। वे स्वयं बिस्तर पर बैठे बीच बीच में भक्तों के साथ बातें कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण और बाबूराम, मास्टर प्रभृति भक्त – दया और माया – कठिन साधना और ईश्वर दर्शन

श्रीरामकृष्ण (मास्टर आदि भक्तों के प्रति) – देखो, दया और माया ये दो पृथक् पृथक् चीजें हैं। माया का अर्थ है, आत्मीयों के प्रति ममता – जैसे बाप, माँ, भाई, बहन, स्त्री, पुत्र इन पर प्रेम। दया का अर्थ है सर्व भूतों में प्रेम, समदृष्टि। किसी में यदि दया देखो, जैसे विद्यासागर में, तो उसे ईश्वर की दया जानो। दया से सर्वभूतों की सेवा होती है। माया भी ईश्वर की ही है। माया द्वारा वे आत्मीयों की सेवा करा लेते हैं। पर इसमें एक बात है। माया अज्ञानी बनाकर रखती है और बद्ध बनाती है। परन्तु दया से चित्तशुद्धि होती है और धीरे धीरे बन्धन-मुक्ति होती है।

चित्तशुद्धि हुए बिना भगवान् के दर्शन नहीं होते। काम, क्रोध, लोभ, इन सब पर विजय प्राप्त करने से उनकी कृपा होती है, तब उनके दर्शन होते हैं। तुम लोगों को बहुत ही गुप्त बातें बता रहा हूँ। काम पर विजय प्राप्त करने के लिए मैंने बहुतकुछ किया था। आनन्द-आसन के चारों ओर 'जय काली' जय काली' कहते हुए कई बार प्रदक्षिणा की थी।

“मेरी दस-ग्यारह वर्ष की उम्र में, जब उस देश में था, उस समय वह स्थिति-समाधि की स्थिति – प्राप्त हुई थी। मैदान में से जाते जाते जो कुछ देखा उससे मैं विह्वल हो पड़ा था। ईश्वरदर्शन के कुछ लक्षण हैं। ज्योति देखने में आती है, आनन्द होता है, हृदय के बीच में गुर-गुर करके महावायु उठती है।”

दूसरे दिन बाबूराम, रामदयाल घर लौट गए। मास्टर ने वह दिन व रात्रि श्रीरामकृष्ण के साथ बितायी। उस दिन उन्होंने मन्दिर मे ही प्रसाद पाया।

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