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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | १२३

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१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | १२३

उसके साथ स्वाधीनता नहीं रह जाती। (विजय से) तुम लोग स्वयं यह देखते हो; दूसरों का काम करते हुए क्या हो रहे हो। और देखो, इतनी परीक्षाएँ पास करनेवाले, इतनी अंग्रेजी जाननेवाले पण्डित नौकरी करते हुए सुबह-शाम मालिकों के बूट की ठोकरें खाते हैं। इसका कारण केवल ‘कामिनी’ है। विवाह करके यह हरी-भरी दुनिया उजाड़ने की इच्छा नहीं होती। इसीलिए यह अपमान, दासता की यह इतनी मार!

ईश्वरलाभ के उपरान्त कामिनी की मातृभाव से पूजा

“यदि एक बार उस प्रकार के तीव्र वैराग्य से भगवान् मिल जाएँ तो फिर स्त्रियों के प्रति आसक्ति नहीं रह जाती। घर में रहने से भी स्त्री की लालसा नहीं होती, फिर उससे कोई भय नहीं रहता। यदि एक चुम्बक-पत्थर बड़ा हो और एक छोटा, तो लोहे को कौन खींच सकता है? बड़ा ही खींच सकता है। ईश्वर बड़ा चुम्बक-पत्थर है और कामिनी छोटा चुम्बक-पत्थर है। तो भला कामिनी क्या कर सकेगी?”

एक भक्त – महाराज, स्त्रियों से घृणा करें?

श्रीरामकृष्ण – जिन्होंने ईश्वरलाभ कर लिया है, वे स्त्रियों को ऐसी दृष्टि से नहीं देखते, जिससे भय हो। वे यथार्थ देखते हैं कि स्त्रियों में ब्रह्ममयी माता का अंश है; और उन्हें माता जानकर उनकी पूजा करते हैं। (विजय से) तुम कभी कभी आया करो, तुम्हें देखने की बड़ी इच्छा होती है।

(५)

ईश्वरादेश प्राप्त होने के बाद आचार्य-पद

विजय – ब्राह्म समाज का काम करना पड़ता है, इसलिए हर समय नहीं आ सकता। अवकाश मिलने पर आऊँगा।

श्रीरामकृष्ण – देखो, आचार्य का काम बड़ा कठिन है। ईश्वर का प्रत्यक्ष आदेश पाए बिना लोकशिक्षा नहीं दी जा सकती।

“यदि आदेश पाए बिना ही उपदेश दिया जाय तो लोग उस ओर ध्यान नहीं देते, उस उपदेश में कोई शक्ति नहीं रहती। पहले साधना करके या जिस तरह हो, ईश्वर को प्राप्त करना चाहिए। उनकी आज्ञा मिलने पर फिर लेक्चर दिया जा सकता है! उस देश में ‘हालदारपुकुर’ नाम का एक तालाब है। उसके बाँध पर लोग पाखाना किया करते थे। जो लोग घाट पर आते थे, वे उन्हें खूब गालियाँ देते थे, खूब गुल-गपाड़ा मचाते थे, परन्तु गालियों से कोई काम न होता था। दूसरे दिन फिर वही हालत होती थी। अन्त को कम्पनी के चपरासी नोटिस लटका गए कि यहाँ शौच के लिए जाने की सख्त मनाही है; न माननेवाले को सजा दी जाएगी। इस नोटिस के बाद फिर वहाँ कोई शौच के लिए नहीं


CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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१२४श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ दिसम्बर १८८२

जाता था।

“उनके आदेश के बाद कहीं भी आचार्य हुआ जा सकता है और लेक्चर भी दिया जा सकता है। जिसको उनका आदेश मिलता है, उसे उनकी शक्ति भी मिलती है; तब वह आचार्य का कठिन काम कर सकता है।

“एक बड़े जमींदार से उसकी एक प्रजा मुकदमा लड़ रही थी। तब लोग समझ गए कि उस प्रजा के पीछे कोई जोरदार आदमी है; सम्भव है कि कोई बड़ा जमींदार ही उसकी ओर से मुकदमा चला रहा हो। मनुष्य साधारण जीव है, ईश्वर की शक्ति के बिना आचार्य जैसा कठिन काम वह नहीं कर सकता।”

सच्चिदानन्द ही गुरु और मुक्तिदाता है

विजय – महाराज, ब्राह्मसमाज में जो उपदेश दिए जाते हैं, क्या उनसे लोगों का उद्धार नहीं होता?

श्रीरामकृष्ण – मनुष्य में वह शक्ति कहाँ कि वह दूसरे को संसारबन्धन से मुक्त कर सके? यह भुवनमोहिनी माया जिनकी है, वे ही इस माया से मुक्त कर सकते हैं। सच्चिदानन्द गुरु को छोड़ और दूसरी गति नहीं है। जिसको ईश्वर-दर्शन नहीं हुआ, उनका आदेश नहीं मिला, जो ईश्वर की शक्ति से शक्तिशाली नहीं है, उसकी क्या मजाल कि जीवों का भवबन्धन-मोचन कर सके?

“मैं एक दिन पंचवटी के निकट झाऊतल्ले की ओर जा रहा था। एक मेढ़क की आवाज सुनायी दी – जान पड़ा कि साँप ने पकड़ा है। काफी देर बाद जब लौटने लगा तब भी उस मेढ़क की पुकार शुरू ही थी। बढ़कर देखा तो दिखायी दिया की एक कौड़ियाला साँप उस मेढ़क को पकड़े हुए है – न छोड़ सकता है, न निगल सकता है उस मेढ़क की भी भवव्यथा दूर नहीं हो रही है। तब मैंने सोचा कि यदि कोई असल साँप पकड़ता तो तीन ही पुकार में इसको चुप हो जाना पड़ता। इस कौड़ियाले ने पकड़ा है, इसीलिए साँप की भी दुर्दशा है और मेढ़क की भी!

“यदि सद्गुरु हो तो जीव का अहंकार तीन ही पुकार में दूर होता है। गुरु कच्चा हुआ तो गुरु की भी दुर्दशा है और शिष्य की भी। शिष्य का अहंकार दूर नहीं होता, न उसके भवबन्धन की फाँस ही कटती है। कच्चे गुरु के पल्ले पड़ा तो शिष्य मुक्त नहीं होता।”

(६)

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते। (गीता, ३।२७)

माया या अहंबुद्धि का नाश और ईश्वर-दर्शन

विजय – महाराज, हम लोग इस तरह बद्ध क्यों हो रहे हैं? ईश्वर को क्यों नहीं देख पाते?

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